अग्निदेव कहते हैं -
महर्षि कात्यायन मुनियोंसे जिस प्रकार श्राद्धका वर्णन किया था, उसे बतलाता हूँ। गया आदि तीर्थोंमें, विशेषतः संक्रान्ति आदिके अवसरपर श्राद्ध करना चाहिये। अपराह्नकालमें, अपरपक्ष (कृष्णपक्ष) में, चतुर्थी तिथिको अथवा उसके बादकी तिथियों में श्राद्धोपयोगी सामग्री एकत्रित कर उत्तम नक्षत्र में श्राद्ध करे। श्राद्धके एक दिन पहले ही ब्राह्मणोंको निमन्त्रित करे। संन्यासी, गृहस्थ, साधु अथवा स्नातक तथा श्रोत्रिय ब्राह्मणोंको, जो निन्दाके पात्र न हों, अपने कर्मोंमें लगे रहते हों और शिष्ट एवं सदाचारी हों – निमन्त्रित करना चाहिये। जिनके शरीरमें सफेद दाग हों, जो कोढ़ आदिके रोगोंसे ग्रस्त हों, ऐसे ब्राह्मणोंको छोड़ दे; उन्हें श्राद्धमें सम्मिलित न करे। निमन्त्रित ब्राह्मण जब स्नान और आचमन करके पवित्र हो जायँ तो उन्हें देवकर्ममें पूर्वाभिमुख बिठावे देव-श्राद्ध, पितृ श्राद्धमें तीन-तीन ब्राह्मण रहें अथवा दोनों में एक-एक ही ब्राह्मण हों। इस प्रकार मातामह आदिके श्राद्धमें भी समझना चाहिये। शाक आदिसे भी श्राद्ध कर्म करावे ॥ १-५॥
श्राद्धके दिन ब्रह्मचारी रहे, क्रोध और उतावली न करे। नम्र, सत्यवादी और सावधान रहे। उस दिन अधिक मार्ग न चले, स्वाध्याय भी न करे, मौन रहे। सम्पूर्ण पंक्तिमूर्धन्य (पंक्ति में सर्वश्रेष्ठ अथवा पंक्तिपावन) ब्राह्मणोंसे प्रत्येक कर्मके विषयमें पूछे आसनपर कुश बिछावे । पितृकर्ममें कुशोंको दुहरा मोड़ देना चाहिये । पहले देव-कर्म, फिर पितृ कर्म करे।(श्राद्ध आरम्भ करनेसे पूर्व रक्षा-दीप जला लेना चाहिये।) देव धर्ममें स्थित ब्राह्मणोंसे पूछे– 'मैं विश्वेदेवोंका - आवाहन करूँगा।' ब्राह्मण आज्ञा दें- 'आवाहन करो', तब 'विश्वेदेवास आगत शृणुताम इम हवम्, एदं बर्हिर्निषीदत' (यजु० ७।३४) – इस मन्त्रके द्वारा विश्वेदेवोंका आवाहन करके आसनपर जौ छोड़े तथा 'विश्वेदेवाः शृणुतेमः हवं मे ये अन्तरिक्षे य उपद्यविष्ठ। ये अग्निजिह्वा उत वा यजत्रा आसद्यास्मिन् बर्हिषि मादयध्वम् ॥' (यजु० ३३।५३ ) - इस मन्त्रका जप करे। तत्पश्चात् पितृकर्ममें नियुक्त ब्राह्मणोंसे पूछे–'मैं पितरोंका - आवाहन करूँगा।' ब्राह्मण कहें- 'आवाहन करो।' तब 'उशन्तस्त्वा०' ( ॐ उशन्तस्त्वा निधीमयुशन्तः समिधीमहि उशत्रुशत आवह पितॄन् हविये अत्तवे ॥ (यजु० १९।७०)) इस मन्त्रका पाठ करते हुए आवाहन करे। फिर 'अपहता असुरा रक्षा सि वेदिषदः ॥ ' ( यजु० २।२९ ) – इस मन्त्रसे तिल बिखेरकर 'आयन्तु नः०' (ॐ आयन्तु नः पितरः सोम्यासोऽग्निध्वात्ताः पथिभिर्देवयानैः । अस्मिन् यज्ञे स्वधया मदन्तोऽधिब्रुवन्तु तेऽवन्त्वस्मान् ॥ (यजु० १९५८) इत्यादि मन्त्रका जप करे। इसके बाद पवित्रकसहित अर्घ्यपात्र में शं नो देवी० (ॐ शं नो देवीरभिष्टय आपो भवन्तु पीतये शँप्योरभिसवन्तु नः ॥ (अथर्व० १।६) इस मन्त्रसे जल डाले ॥ ६ - १०॥
तदनन्तर 'यवोऽसि' (ॐ यवोऽसि यवयास्मद्वेषो यवयाराती (यजु० ५। २६ )) इस मन्त्रसे जौ देकर पितरोंके निमित्त सर्वत्र तिलका उपयोग करे। (पितरोंके अर्घ्यपात्रमें भी 'शं नो देवी०' इस मन्त्रसे जल डालकर) 'तिलोऽसि सोमदेवत्यो
गोसवे देवनिर्मितः । प्रनवद्भिः प्रत्तः स्वधया पितँल्लोकान् पृणीहि नः स्वधा ।' यह मन्त्र पढ़कर तिल डाले। फिर 'श्रीश्च ते लक्ष्मीश्च पल्याव होरात्रे पार्श्वे नक्षत्राणि रूपमश्विनौ व्यात्तम्। इष्णन्त्रि षाणामुं म इषाण सर्वलोकं म इषाण ॥' (यजु० ३१ २२) इस मन्त्रसे अर्घ्यपात्रमें फूल छोड़े। अर्घ्यपात्र सोना, चाँदी, गूलर अथवा पत्तेका होना चाहिये। उसीमें देवताओंके लिये सव्यभावसे और पितरोंके लिये अपसव्यभावसे उक्त वस्तुएँ रखनी चाहिये। एक-एकको एक-एक अर्घ्यपात्र पृथक्-पृथक् देना उचित है। पितरोंके हाथों में पहले पवित्री रखकर ही उन्हें अर्घ्य देना चाहिये ॥ ११-१३ ॥
तत्पश्चात् (देवताओंके अर्घ्यपात्रको बायें हाथ में लेकर उसमें रखी हुई पवित्रीको दाहिने हाथसे निकालकर देव-भोजन-पात्रपर पूर्वाग्र करके रख दे। उसके ऊपर दूसरा जल देकर अर्घ्यपात्रको ढककर) निम्नाङ्कित मन्त्र पढ़े – 'ॐ या दिव्या आपः पयसा सम्बभूवुर्या अन्तरिक्षा उत पार्थिवीर्याः । हिरण्यवर्णा यज्ञियास्ता न आपः शिवाः शः स्योनाः सुहवा भवन्तु ॥' फिर (जौ, कुश और जल हाथमें लेकर संकल्प पढ़े – ) ॐ अद्यामुकगोत्राणां पितृपितामह प्रपितामहानाम् अमुकामुकशर्मणाम् अमुकश्राद्धसम्बन्धिनो विश्वेदेवाः एष वो हस्ताः स्वाहा।'— यों कहकर देवताओंको अर्घ्य देकर पात्रको दक्षिण भागमें सीधे रख दे। इसी प्रकार पिता आदिके लिये भी अर्घ्य दे। उसका संकल्प इस प्रकार है- 'ओमद्य अमुकगोत्र पितः अमुकशर्मन् अमुकश्राद्धे एष हस्ताः ते स्वधा ।' इसी तरह पितामह आदिको भी दे फिर सब अर्घ्यका अवशेष पहले पात्रमें डाल दे अर्थात् प्रपितामहके अर्घ्यमें जो जल आदि हो, उसे पितामहके पात्रमें डाल दे। इसके बाद वह सब पिताके अर्घ्यपात्रमें रख दे। पिताके अर्घ्यपात्रको पितामहके अर्घ्यपात्रके ऊपर रखे। फिर उन दोनोंको प्रपितामहके अर्घ्यपात्रके ऊपर रख दे। तत्पश्चात् तीनोंको पिताके आसनके वामभागमें 'पितृभ्यः स्थानमसि ।' ऐसा कहकर उलट दे। तदनन्तर वहाँ देवताओं और पितरोंके लिये गन्ध, पुष्प, धूप, दीप तथा वस्त्र आदिका दान किया जाता है ॥ १४–१६ ॥
उसके बाद श्राद्धकर्ता पुरुष पात्रमेंसे घृतयुक्त अन्न निकालकर ब्राह्मणोंसे पूछे – 'मैं अग्निमें - इस अन्नका हवन करूँगा।' ब्राह्मण आज्ञा दें - 'करो'। तब साग्निक पुरुष तो अग्निमें हवन करे और निरग्निक पुरुष पवित्रीयुक्त पितरके हाथ (अथवा जल) में मन्त्रसे आहुति दे। पहली आहुति में 'अग्नये कव्यवाहनाय स्वाहा।' (यजु० २।२९ ) कहकर दे। दूसरी आहुति 'सोमाय पितृम स्वाहा।' (यजु० २।२९) इस मन्त्रसे दे। दूसरे विद्वानोंका मत है कि 'यम' एवं 'अङ्गिरा' के उद्देश्यसे आहुति दे (यदि दूसरेकी भूमिमें श्राद्ध करते हो तो थोड़ा अन्न और जल कुशापर अपसव्यभावसे रखकर कहें- 'इदमत्रमेतद्भूस्वामिपितृभ्यो नमः ।) । हवनसे शेष बचे हुए अन्नमेंसे क्रमशः देवताओं और पितरोंके पात्रों में परोसे और पात्रको हाथसे ढक दे। उस समय निम्नाङ्कित मन्त्रका जप करे – ॐ पृथिवी ते पात्रं द्यौरपिधानं ब्राह्मणस्य मुखेऽमृतेऽमृतं जुहोमि स्वाहा । इदं विष्णुर्विचक्रमे त्रेधा निदधे पदम् समूढमस्य पारसुरे स्वाहा ॥ कृष्ण हव्यमिदं रक्ष मदीयम्।' (यजु० ५ । १५ ) ऐसा पढ़कर अन्त में ब्राह्मणके अँगूठेका स्पर्श करावे (देवपात्रोंपर 'यवोऽसि यवयास्मद्वेषो यवयारातीः ।' इस मन्त्रसे जौ छींटे) और पितरोंके पात्रोंपर 'अपहता असुरा रक्षासि वेदिषदः।' इस मन्त्रसे तिल छींटकर संकल्पपूर्वक अन्न अर्पण करे। तदनन्तर 'जुषध्वम् ।' (आपलोग अन्न ग्रहण करें) ऐसा कहकर गायत्री मन्त्र आदिका जप करे ॥ १७ - २१ ॥
देवताभ्यः पितृभ्यश्च महायोगिभ्य एव च ।
नमः स्वधायै स्वाहायै नित्यमेव नमो नमः ॥ (देवताओं, पितरों, महायोगियों, स्वधा और स्वाहाको मेरा सर्वदा नमस्कार है, नमस्कार है।)
'इस मन्त्रका भी जप करे। पितरोंको तृप्त जानकर पात्रमें अन्न बिखेरे। फिर एक-एक बार सबको जल दे। पूर्ववत् सव्यभावसे गायत्री जप - करके 'मधु वाता' (यह मन्त्र तीन ऋचाओं में है पूरा मन्त्र इस प्रकार है-ॐ मधु वाता ऋतायते मधु क्षरन्ति सिन्धवः माध्वीनः सन्त्वोषधीः ॥ १ ॥ ॐ मधु नक्तमुतोवसो मधुमत् पार्थिवद रजः । मधु चौरस्तु नः पिता ॥ २ ॥ ॐ मधुमानो वनस्पतिर्मधुमाँऽस्तु सूर्यः। माध्वोगांवो भवन्तु नः ॥ ३ ॥ (यजु० १३२७ २९) ॐ मधु मधु मधु ॥) इस ऋचाका जप करे।( उक्त ऋचाके अतिरिक्त भी 'उदीरतामवर०' (यजु० १९४९) इत्यादि पितृमन्त्रोंका 'ॐ कृणुष्व पाजः०' (यजु० १३।९) इत्यादि रक्षोच्न मन्त्रोंका, 'सहस्रशीर्षा:०' (यजु० ३१) इत्यादि पुरुषसूक्तका तथा ॐ आशुः शिशानः०' (यजु० १७।३३) इत्यादि मन्त्रोंका एवं शतरुद्रयका पाठ भी किया जाता है।
'नमस्तुभ्यं विरूपाक्ष नमस्तेऽनेकचक्षुपे नमः पिनाकहस्ताय वज्रहस्ताय वै नमः ॥' इस श्लोकको भी पढ़ना चाहिये।) इसके बाद ब्राह्मणोंसे पूछे- 'आपलोग तृप्त हो गये ?' ब्राह्मण कहें– 'हाँ, हम तृप्त हो गये।' तदनन्तर शेष अन्नको ब्राह्मणोंकी आज्ञा लेकर एकमें मिला दे और पिण्ड बनानेके लिये पात्रसे बाहर निकाले और पितरोंके उच्छिष्ट अन्नके पास ही अवनेजन करके कुशोंपर संकल्पपूर्वक तीन पिण्डदान करे। ( इसके पहले कुछ दूरपर दक्षिणाग्र कुश बिछाकर भूमिको सींच दे और तिल घृतसहित अत्र एवं जल लेकर ॐ अग्निदग्धाश्च ये जीवा येऽप्यदग्धाः कुले मम भूमौ दत्तेन तृप्यन्तु तृप्ता यान्तु परां गतिम् ॥'
यह पढ़कर पूर्वोक्त कुशोंपर वह अन्न-जल बिखेर दे। तदनन्तर आचमन करके भगवान्का स्मरण कर तीन बार गायत्री मन्त्रका जप करे। इसके बाद अपसव्यभावसे बालूकी चौकोर वेदी बनाकर उसके ऊपर कुशके मूलसे प्रादेशमात्र तीन रेखा खींचे; उस समय ॐ अपहता०' इत्यादि मन्त्र पढ़े। फिर रेखाके चारों ओर उल्कसे अङ्गार भ्रमण करावे इसका मन्त्र इस प्रकार है- 'ॐ ये रूपाणि प्रतिमुञ्चमाना असुराः सन्तः स्वधया चरन्ति परापुरो निपुरो ये भरन्त्यग्निष्टाल्लोकात्प्रणुदात्यस्मात् ॥' (यजु० २ । ३०) तत्पश्चात् रेखापर तीन कुश बिछाकर सव्यभावसे गायत्री जप करके फिर अपसव्यभावसे दोनेमें जल, तिल, गन्ध पुष्प लेकर 'ॐ अद्यामुकगोत्र पितः अमुकशर्मन् अमुकश्राद्धे पिण्डस्थानेऽत्रावनेनिश्व ते स्वधा' ऐसा कहकर कुशपर जल गिरावे यह 'अवनेजन' है। पिण्ड देनेके बाद पिण्डके ऊपर उसी पात्रसे जल गिराकर उसी प्रकार संकल्प पढ़कर प्रत्यवनेजन किया जाता है। उसमें 'प्रत्यवनेनिश्व' कहना चाहिये। पिण्डदानका संकल्प इस प्रकार है- ओमधामुकगोत्र पितः अमुकशर्मन् अमुकश्राद्धे एष पिण्डस्ते स्वधा।' इसी प्रकार पितामह आदिको भी देना चाहिये। पिण्डदानके अनन्तर पिण्डके आधारभूत कुशोंमें अपने हाथ पोंछकर कहे- 'ॐ लेपभागभुजः पितरस्तृप्यन्तु।' फिर सव्यभावसे तीन बा आचमन करके श्रीहरिका स्मरण करे। तदनन्तर अपसव्यभावसे दक्षिणकी ओर मुँह करके कहे- 'अत्र पितरो मादयध्वं यथाभागमावृषायध्वम्।' (यजु० २।३१) फिर वामावर्तसे उत्तरकी ओर मुँहकर श्वास रोककर प्रसन्नचित्त हो प्रकाशमान मूर्तिवाले पितरोंका ध्यान करते हुए फिर उसी मार्गसे लौटकर दक्षिणाभिमुख हो जाय और कहे-'अमोमदन्त पितरो यथाभागमावृषायिषत।' (यजु० २ ३१) इसके बाद पहलेके अवनेजनपात्रमें जो शेष जल हो, उसे पिण्डपर गिराकर प्रत्यवनेजन दें। उसका संकल्प अवनेजनकी ही भाँति है। 'अवनेनिक्ष्व को 'प्रत्यवनेनिश्र्व' कहना चाहिये। बहुवचनमें 'प्रत्यवनेनिग्ध्वम्' का उच्चारण करना उचित है।)
दूसरोंका मत है कि ब्राह्मण जब भोजनके पश्चात् हाथ-मुँह धोकर आचमन कर लें, तब पिण्डदान देना चाहिये। आचमनके पश्चात् जल, फूल और अक्षत दे ॥ २२-२५३ ॥ फिर अक्षय्योदक देकर मनुष्य आशीर्वादकी प्रार्थना करे (प्रत्यवनेजनके बाद नीवी-विस्रंसन करके सव्यभावसे आचमन करे। फिर अपसव्य हो बायें हाथसे दाहिने हाथमें सूत्र लेकर 'ॐ नमो वः पितरो रसाय नमो वः पितरः शोषाय नमो वः पितरो जीवाय नमो वः पितरः स्वधायै नमो वः पितरो घोराय नमो वः पितरो मन्यवे नमो वः पितरः पितरो नमो वो गृहात्रः पितरो दत्तसतो वः पितरो देष्म' (यजु० २।३२ ) – इस मन्त्रका पाठ करके 'एतद् वः पितरो वासः ' (यजु० २ ३२) - ऐसा कहते हुए छहों पिण्डोंपर सूत्र रखकर संकल्प करे- 'अद्यामुकगोत्र पितः (पितामह, प्रपितामह आदि) अमुकशर्मन् अमुकश्राद्धे पिण्डे एतत्ते वासः स्वधा ।' तत्पश्चात् ॐ शिवा आपः सन्तु।' कहकर जल, ॐ सौमनस्यम् अस्तु।' इस वाक्यका उच्चारण करके फूल, ॐ अक्षतं चारिष्टमस्तु ।' कहकर अक्षत अन्नपात्रोंपर डाले। फिर मोटक, तिल और जल लेकर 'ॐ अद्यामुकगोत्रस्य पितुः अमुकशर्मणः अमुकश्राद्धे दत्तान्येतान्यन्नपानादिकानि अक्षय्याणि सन्तु।' इस प्रकार संकल्प पढ़कर छोड़ दे। तत्पश्चात् सव्य हो दक्षिण दिशाकी ओर देखते हुए पिण्डोंके ऊपर पूर्वाग्र जलधारा गिरावे और पढ़े- -ॐ अघोराः पितरः सन्तु।' इसके - बाद हाथ जोड़ पूर्वाभिमुख हो मूलमें कहे अनुसार आशी प्रार्थना करे।) । 'ॐ अघोराः पितरः सन्तु ।' (मेरे पितर सौम्य हों) ऐसा कहकर जल गिरावे, फिर प्रार्थना करे– 'हमारा गोत्र सदा ही बढ़ता रहे, हमारे दाता भी निरन्तर अभ्युदयशील हों, वेदोंकी पठन-पाठन प्रणाली बढ़े। संतानोंकी भी वृद्धि हो हमारी श्रद्धामें कमी न आवे हमारे पास देने योग्य बहुत सामान संचित रहे; हमारे यहाँ अन्न भी अधिक हो हम अतिथियों को प्राप्त करते रहें अर्थात् हमारे घरपर अतिथियों का शुभागमन होता रहे हमारे पास माँगनेवाले आवें, किंतु हम किसीसे न माँगें।' फिर स्वधा वाचनके लिये पिण्डोंपर पवित्रकसहित कुश बिछावे और ब्राह्मणोंसे पूछे- 'मैं स्वधा वाचन कराऊँगा।' ब्राह्मण आज्ञा दें- 'स्वधा-वाचन कराओ। तब श्राद्धकर्ता पुरुष इस प्रकार कहे 'ब्राह्मणो! आपलोग मेरे पिता, पितामह और प्रपितामहके लिये स्वधा वाचन करें।' ब्राह्मण कहें– 'अस्तु स्वधा ।' तदनन्तर 'ऊर्जं वहन्तीरमृतं घृतं पयः कीलालं परिश्रुतम् स्वधा स्थ तर्पयत मे पितॄन्' (यजु० २ ३४) - इस मन्त्रसे कुशोंपर दुग्ध मिश्रित जलकी दक्षिणाग्रधारा गिरावे,( इसके बाद स्वयं झुककर सब पिण्डोंको नाकसे सूँघ ले और उठा दे। पिण्डोंके आधारभूत कुशको तथा उल्मुक (जिससे) अङ्गार भ्रमण कराया गया था) को अग्निमें डाल दे।)फिर (सव्य होकर देवार्घ्यपात्रको हिला दें और पितरोंके) अर्घ्यपात्रको उत्तान करके देवश्राद्ध
तथा पितृश्राद्धकी प्रतिष्ठा के लिये यथाशक्ति क्रमशः सुवर्ण और रजतकी दक्षिणा दे। ( दक्षिणाका संकल्प इस प्रकार है- त्रिकुशा, जौ और जल हाथमें लेकर-ॐ अद्यामुकगोत्राणां पितृपितामहप्रपितामहानाम् (मातामहप्रमातामहवृद्धप्रमातामहानां च अमुकामुकशर्मणाम् अमुकश्राद्धसम्बन्धिनां विश्वेषां देवानां कृतैतदमुकश्राद्धप्रतिष्ठार्थं हिरण्यमग्निदैवत्यं तन्मूल्योपकल्पितं द्रव्यं वा यथानामगोत्राय ब्राह्मणाय दक्षिणात्वेन दातुमहमुत्सृजे।' तुरंत दिया जाता हो तो 'सम्प्रददे' कहना चाहिये। मोटक, तिल, जल लेकर 'ओमधामुकगोत्रस्य पितुः अमुकशर्मणः कृतैतच्छ्राद्धप्रतिष्ठार्थं रजतं चन्द्रदैवत्यं तन्मूल्योपकल्पितं द्रव्यं यथानाम' इत्यादि कहकर पिता आदिके लिये दक्षिणा दें।)इसके बाद 'विश्वेदेवाः प्रीयन्ताम् ।'— ऐसा कहकर देवताओंका विसर्जन करे और 'वाजेवाजेऽबत वाजिनो नो धनेषु विप्रा अमृता ऋतज्ञाः । अस्य मध्वः पिबत मादयध्वं तृप्ता यात पथिभिर्देवयानैः ॥' (यजु० २१ । ११ ) - इस मन्त्रसे पिता आदिका विसर्जन करे ॥ २६- ३२ ॥
(तत्पश्चात् सव्यभावसे 'देवताभ्यश्च०' इत्यादि पढ़कर भगवान्का स्मरण करे। फिर अपसव्यभावसे रक्षादीपको बुझा दे। उसके बाद सव्यभावसे भगवान्से प्रार्थना करे- 'प्रमादात्कुर्वतां कर्म प्रच्यवेताध्वरेषु यत् । स्मरणादेव तद् विष्णोः सम्पूर्णं स्यादिति श्रुतिः ॥ यस्य स्मृत्या च नामोक्त्या तपोयज्ञक्रियादिषु । न्यूनं सम्पूर्णतां याति स वन्दे तमच्युतम् ॥' इत्यादि) तदनन्तर 'आ मा वाजस्य०' (यजु० ९ १९) इत्यादि मन्त्र पढ़कर ब्राह्मणके पीछे-पीछे जाय और ब्राह्मणकी परिक्रमा करके अपने घरमें जाय। प्रत्येक मासकी अमावस्याको इसी प्रकार पार्वण श्राद्ध करना - चाहिये ॥ ३३ ॥
अब मैं एकोद्दिष्ट श्राद्धका वर्णन करूँगा। यह श्राद्ध पूर्ववत् ही करे। इसमें इतनी ही विशेषता है कि एक ही पवित्रक, एक ही अर्घ्य और एक ही पिण्ड देना चाहिये। इसमें आवाहन, अग्निकरण और विश्वेदेव पूजन नहीं होता। जहाँ तृप्ति पूछनी हो, वहाँ 'स्वदितम् ?' ऐसा प्रश्न करे। ब्राह्मण उत्तर दे– 'सुस्वदितम् ।', 'उपतिष्ठताम्' कहकर - अर्पण करे। अक्षय्योदक भी दे विसर्जनके समय 'अभिरम्यताम्' का उच्चारण करे। ब्राह्मण कहें. - 'अभिरताः स्मः।' शेष सभी बातें पूर्ववत् करनी चाहिये ॥ ३४-३६ ॥
अब सपिण्डीकरणका वर्णन करूँगा। यह वर्षके अन्तमें और मध्यमें भी होता है। इसमें पितरोंके लिये तीन पात्र होते हैं और प्रेतके लिये एक पात्र अलग होता है। चारों अर्घ्यपात्रों में पवित्री, तिल, फूल, चन्दन और जल डालकर भर दिया जाता है। फिर उन्हींसे श्राद्धकर्ता पुरुष अर्घ्य देता है। ये समाना:०' (यजु० १९४५-४६) इत्यादि दो मन्त्रोंसे प्रेतके अर्घ्यपात्रको क्रमशः तीनों पितरोंके अर्घ्यपात्रमें मिलाया जाता है। इसी प्रकार पिण्डदान, दान आदि पूर्ववत् करके प्रेतके पिण्डको पितरोंके पिण्डमें मिलाया जाता है। इससे प्रेतको 'पितृ' पदवी प्राप्त होती है ॥ ३७ - ३९ ॥
अब 'आभ्युदयिक' श्राद्ध बतलाता हूँ । इसकी सब विधि पूर्ववत् है। इसमें पितृसम्बन्धी मन्त्र के अतिरिक्त अन्य मन्त्रोंका जप करना चाहिये। पूर्वाह्नकालमें आभ्युदयिक श्राद्ध और उसकी प्रदक्षिणा करनी चाहिये। इसमें कोमल कुश ही उपचार है। यहाँ तिलके स्थानपर जौका ही उपयोग होता है। ब्राह्मणोंसे पितरोंकी तृप्तिके लिये प्रश्न करते समय सम्पन्नम् ?' का प्रयोग करना चाहिये। ब्राह्मण उत्तर दे 'सुसम्पन्नम्'। इसमें दही, अक्षत और बेर आदिके ही पिण्ड होते हैं। आवाहनके समय पूछे– 'मैं 'नान्दीमुख' नामवाले पितरोंका आवाहन करूँगा।' इसी प्रकार अक्षय्य तृप्तिके लिये 'प्रीयताम्' ऐसा कहे। फिर पूछे. - 'मैं नान्दीमुख पितरोंका तृप्ति वाचन कराऊँगा।' - ब्राह्मणोंकी आज्ञा लेकर कहे- 'नान्दीमुखाः पितरः प्रीयन्ताम् ।' ( नान्दीमुख पितर तृप्त एवं प्रसन्न हों।) (माता, पितामही, प्रपितामही) पिता, पितामह, प्रपितामह और (सपत्नीक) मातामह, प्रमातामह तथा वृद्धप्रमातामह ये नान्दीमुख पितर हैं ॥ ४०-४४॥
आभ्युदयिक श्राद्धमें 'स्वधा' का प्रयोग न करे और युग्म ब्राह्मणोंको भोजन करावे। अब मैं पितरोंकी तृप्ति बतलाता हूँ। ग्राम्य अन्नसे तथा जंगली कन्द, मूल, फल आदिसे एक मासतक पितरोंकी तृप्ति बनी रहती है और गायके दूध एवं खीरसे एक वर्षतक पितरोंकी तृप्ति रहती है तथा वर्षा ऋतुमें त्रयोदशीको विशेषतः मघा नक्षत्र में किया हुआ श्राद्ध अक्षय होता है।( कुछ लोग श्राद्धमें मांसका भी विधान मानते हैं, परंतु श्राद्धकर्ममें मांस कितना निन्दनीय है, यह श्रीमद्भागवत सप्तम स्कन्ध अध्याय १५ के इन श्लोकोंसे स्पष्ट हो जाता है ―
न दद्यादामिषं श्राद्धे न चाद्याद्धर्मतत्त्ववित् । मुन्यन्नैः स्यात्परा प्रीतिर्यथा न पशुहिंसया ॥ नैतादृशः परो धर्मो नृणां सद्धर्ममिच्छताम् । न्यासो दण्डस्य भूतेषु मनोवाक्कायजस्य यः ॥ द्रव्ययज्ञैर्यक्ष्यमाणं दृष्टा भूतानि बिभ्यति । एष माकरुणो हन्यादतज्ज्ञो ह्यसुतृब् ध्रुवम् ॥ (७-८, १०)
"धर्मके मर्मको समझनेवाला पुरुष श्राद्धमें (खानेके लिये) मांस न दे और न स्वयं ही खाय; क्योंकि पितृगणकी तृप्ति जैसी मुनिजनोचित आहारसे होती है, वैसी पशुहिंसासे नहीं होती। सद्धर्मको इच्छावाले पुरुषोंके लिये सम्पूर्ण प्राणियोंके प्रति मन, वाणी और शरीरसे दण्डका त्याग कर देना इसके समान और कोई श्रेष्ठ धर्म नहीं है। पुरुषको द्रव्ययज्ञसे यजन करते देखकर जीव डरते हैं कि 'यह अपने ही प्राणोंका पोषण करनेवाला निर्दय अज्ञानी मुझे अवश्य मार डालेगा।" अतएव श्राद्धकर्ममें मांसका उपयोग कभी नहीं करना चाहिये।) मन्त्रका पाठ करनेवाला, अग्निहोत्री, शाखाका अध्ययन करने वाला, छहों अङ्गोंका विद्वान्, त्रिणाचिकेत,(द्वितीय कठके अन्तर्गत 'अयं वाव यः पवते' इत्यादि 'त्रिणाचिकेत' नामक तीन अनुवाकोंको पढ़ने या उसका अनुष्ठान करनेवाला।) त्रिमधु,('मधुवाता०' इत्यादि तीन ऋचाओंका अध्ययन और मधुव्रतका आचरण करनेवाला।) धर्मद्रोणका(धर्मव्याधा दशार्णेषु' इत्यादि प्रसंगका नाम यहाँ 'धर्मद्रोण' कहा गया है।) पाठ करनेवाला, त्रिसुपर्ण ( 'ब्रह्म मेतु माम्' इत्यादि तीन अनुवाकोंका अध्ययन और तत्सम्बन्धी व्रत करनेवाला।) तथा बृहत् सामका ज्ञाता- ये ब्राह्मण पंक्तिपावन (पंक्तिको पवित्र करनेवाले) माने गये हैं। ४५-४७॥
अब काम्य श्राद्धकल्पका वर्णन करूँगा। प्रतिपदाको श्राद्ध करनेसे बहुत धन प्राप्त होता है। द्वितीयाको श्राद्ध करनेसे श्रेष्ठ स्त्री मिलती है। चतुर्थीको किया हुआ श्राद्ध धर्म और कामको देनेवाला है। पुत्रकी इच्छावाला पुरुष पञ्चमीको श्राद्ध करे। षष्ठीके श्राद्धसे मनुष्य श्रेष्ठ होता है। सप्तमीके श्राद्धसे खेतीमें लाभ होता और अष्टमी के श्राद्धसे अर्थकी प्राप्ति होती है। नवमीको श्राद्धका अनुष्ठान करनेसे एक खुरवाले घोड़े आदि पशु प्राप्त होते हैं। दशमीके श्राद्धसे गो समुदायकी उपलब्धि होती है। एकादशीके श्राद्धसे परिवार और द्वादशीके श्राद्धसे धन-धान्य बढ़ता है। त्रयोदशीको श्राद्ध करनेसे अपनी जातिमें श्रेष्ठता प्राप्त होती है। चतुर्दशीको उसीका श्राद्ध किया जाता है, जिसका शस्त्रद्वारा वध हुआ है। अमावास्याको सम्पूर्ण मृत व्यक्तियोंके लिये श्राद्ध करनेका विधान है ॥ ४८- ५१ ॥
'जो दशार्णदेशके वनमें सात व्याध थे, वे कालंजर गिरिपर मृग हुए, शरद्वीपमें चक्रवाक हुए तथा मानस सरोवरमें हंस हुए। वे ही अब कुरुक्षेत्रमें वेदोंके पारंगत विद्वान् ब्राह्मण हुए हैं। अब उन्होंने दूरतकका मार्ग तय कर लिया है; तुमलोग उनसे बहुत पीछे रहकर कष्ट पा रहे हो।(सप्तव्याधा दशारण्ये मृगाः कालअरे गिरौ । चक्रवाका शरद्वीपे हंसाः सरसि मानसे ॥ तेऽपि जाताः कुरुक्षेत्रे ब्राह्मणा वेदपारगाः । प्रस्थिता दूरमध्वानं यूयं तेभ्योऽवसीदत ॥ (अग्नि पु० ११७।५६-५७)) श्राद्ध आदिके अवसरपर इसका पाठ करनेसे श्राद्ध पूर्ण एवं ब्रह्मलोक देनेवाला होता है। यदि पितामह जीवित हो तो पुत्र आदि अपने पिताका तथा पितामहके पिता और उनके भी पिताका श्राद्ध करे। यदि प्रपितामह जीवित हो तो पिता, पितामह एवं वृद्धप्रपितामहका श्राद्ध करे। इसी प्रकार माता आदि तथा मातामह आदिके श्राद्धमें भी करना चाहिये। जो इस श्राद्धकल्पका पाठ करता है, उसे श्राद्ध करनेका फल मिलता है ॥ ५२-५६ ॥ उत्तम तीर्थमें, युगादि और मन्वादि तिथिमें किया हुआ श्राद्ध अक्षय होता है। आश्विन शुक्ला नवमी, कार्तिककी द्वादशी, माघ तथा भाद्रपदकी तृतीया, फाल्गुनकी अमावास्या, पौष शुक्ला एकादशी, आषाढ़की दशमी, माघमासकी सप्तमी, श्रावण कृष्णपक्षकी अष्टमी, आषाढ़, कार्तिक, फाल्गुन तथा ज्येष्ठकी पूर्णिमा – ये तिथियाँ स्वायम्भुव आदि मनुसे सम्बन्ध रखनेवाली हैं। इनके आदिभागमें किया हुआ श्राद्ध अक्षय होता है। गया, प्रयाग, गङ्गा, कुरुक्षेत्र, नर्मदा, श्रीपर्वत, प्रभास, शालग्रामतीर्थ (गण्डकी), काशी, गोदावरी तथा श्रीपुरुषोत्तम आदि तीर्थोंमें श्राद्ध उत्तम होता है ॥ ५७-६२ ॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें श्राद्ध कल्पका वर्णन' नामक एक सौ सत्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ११७ ॥
Summary of chapter 118 of the Agni Mahā Purana is as follows:
The final saṃskāra, the funeral rite, is described from the moment of death through the cremation and post-cremation observances. Agni prescribes the śava-śauca procedures, the carrying of the body to the śmaśāna, the preparation of the funeral pyre with śamī and palāśa wood, and the eldest son's role as chief mourner in performing the dāhana. The collection of ashes, asthī-sañcayana on the third day, and immersion in a sacred river complete the immediate rites. The ten-day śava-daśāha period, with its daily piṇḍodaka and preta-tarpana, enables the departed soul's passage from the preta state.