अग्निदेव कहते हैं-
वसिष्ठ ! अब मैं वेदके मूलमन्त्रों के अनुसार पिङ्गलोक्त छन्दोंका क्रमशः वर्णन करूँगा। मगण, नगण, भगण, यगण, जगण, रगण, सगण और तगण—ये आठ गण होते हैं। सभी गण तीन-तीन अक्षरोंके हैं। इनमें मगणके सभी अक्षर गुरु और नगणके सब अक्षर लघु (III) होते हैं। आदि गुरु होनेसे 'भगण' तथा आदि लघु होनेसे 'यगण' होता है। इसी प्रकार अन्त्य गुरु होनेसे 'सगण' तथा अन्त्य लघु होनेसे 'तगण' होता है। पादके अन्तमें वर्तमान ह्रस्व अक्षर विकल्पसे गुरु माना जाता है। विसर्ग, अनुस्वार, संयुक्त अक्षर (व्यञ्जन), जिह्वामूलीय तथा उपध्मानीयसे अव्यवहित पूर्वमें स्थित होनेपर 'ह्रस्व' भी 'गुरु' माना जाता है, दीर्घ तो गुरु है ही। गुरुका संकेत 'ग' और लघुका संकेत 'ल' है। ये 'ग' और 'ल' गण नहीं हैं। 'वसु' शब्द आठकी और 'वेद' चारकी संज्ञा हैं, इत्यादि बातें लोकके अनुसार जाननी चाहिये ॥ १-३॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'छन्दस्सारका कथन' नामक तीन सौ अट्ठाईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३२८ ॥
Summary of chapter 330 of the Agni Mahā Purana is as follows:
The greatness of sacred pilgrimage sites (tīrthas) is narrated. Agni declares that tīrthas are manifestations of divine grace upon earth, capable of purifying all sin when approached with śraddhā. The hierarchy of tīrthas is established: jñānatīrthas (sacred persons like gurus and saints) surpass kṣetratīrthas (sacred places), which in turn surpass dehatīrthas (sacred times). The major tīrthas — Gaṅgā, Yamunā, Narmadā, Godāvarī, Kāverī, Kṛṣṇā, Puṣkara, Prabhāsa, Dvārakā, Mathurā, Ayodhyā, Kāśī, Kanchi, Ujjayin, Haridvāra — are listed with their presiding deities and the specific sins each is said to dissolve.