अग्निदेव कहते हैं –
इस प्रकरणकी पूर्ति होनेतक 'पादः' पदका अधिकार (अनुवर्तन) है। जहाँ गायत्री आदि छन्दोंमें किसी पादकी अक्षर संख्या पूरी न हो, वहाँ 'इय्', 'उव्' - आदिके द्वारा उसकी पूर्ति की जाती है। (जैसे 'तत्सवितुर्वरेण्यम्' में आठ अक्षरकी पूर्तिके लिये 'वरेण्यम्' के स्थानमें 'वरेणियम्' समझ लिया जाता है। 'स्वः पते' के स्थानमें 'सुवःपते' माना जाता है।) गायत्री छन्दका एक पाद आठ अक्षरोंका होता है। अर्थात् जहाँ 'गायत्रीके पाद' का कथन हो, वहाँ आठ अक्षर ग्रहण करने चाहिये। [यही बात अन्य छन्दोंके पादोंके सम्बन्धमें भी है। ] 'जगती' छन्दका पाद बारह अक्षरोंका होता है। विराट्के पाद दस अक्षरों के बताये गये हैं। 'त्रिष्टुप् छन्दका चरण ग्यारह अक्षरोंका है। जिस छन्दका जैसा पाद बताया गया है, उसीके अनुसार कोई छन्द एक पादका, कोई दो पादका, कोई तीनका और कोई चार पादका माना गया है। [जैसे आठ अक्षरके तीन पादोंका 'गायत्री' छन्द और चार पादोंका 'अनुष्टुप्' होता है।] 'आदि छन्द' अर्थात् 'गायत्री' कहीं छः अक्षरके पादोंसे चार पादोंकी होती है। [ जैसे ऋग्वेदमें – 'इन्द्रः शचीपतिर्बलेन - वीलितः । दुश्च्यवनो वृषा लमत्सु सामहिः ॥'] कहीं-कहीं गायत्री सात अक्षरके पादोंसे तीन पादकी होती है। [जैसे ऋग्वेदमें– 'युवाकु हि शचीनां युवाकु सुमतीनाम् । भूयाम वाजदाम्नाम् ॥' ( १ । १७।४) ] वह सात अक्षरोंवाली गायत्री 'पाद निचृत्' संज्ञा धारण करती है। यदि गायत्रीका प्रथम पाद आठ अक्षरोंका, द्वितीय पाद सात अक्षरोंका तथा तृतीय पाद छः अक्षरोंका हो तो वह 'प्रतिष्ठा गायत्री' नामक छन्द होता है। [जैसे ऋग्वेदमें– 'आपः पृणीत भेषजं वरूथं तन्वे मम । ज्योक् च सूर्यं दृशे ॥' ( १ । २२ । २१)] इसके विपरीत यदि गायत्रीका प्रथम पाद छ, द्वितीय पाद सात और तृतीय पाद आठ अक्षरोंका हो तो उसे 'वर्धमाना' (उदाहरण ऋग्वेदमें-त्वमग्ने यज्ञानां होता विश्वेषां हितः । देवेभिर्मानुषे जने ॥ (६।१६।१)) गायत्री कहते हैं। यदि तीन पादोंवाली गायत्रीका प्रथम पाद छः द्वितीय पाद आठ और तीसरा पाद सात अक्षरोंका हो तो उसका नाम 'अतिपाद' (ऋग्वेदे यथा—प्रेष्ठं वो अतिथिं स्तुषे मित्रमिव प्रियम्। अग्नि रथं न वेद्यम् ॥ (८।८४९१))
निचृत्' होता है। यदि दो चरण नौ-नौ अक्षरोंके हों और तीसरा चरण छः अक्षरोंका हो तो वह 'नागी' नामकी गायत्री होती है। [ जैसे ऋग्वेदमें 'अग्ने तमद्याचं न स्तोमैः क्रतुं न भद्रं हृदिस्पृशम् । ऋध्यामां ओहैः ॥' (४ | १० | १) ] यदि प्रथम चरण छः अक्षरोंका और द्वितीय तृतीय नौ-नौ अक्षरोंके हों तो 'वाराही गायत्री' नामक छन्द होता है। [जैसे सामवेदमें– 'अग्ने मृड महाँ अस्यय आदेवयुं जनम् । इयेथ बर्हिरासदम् ॥' (२३)] अब तीसरे अर्थात् 'विराट्' नामक भेदको बतलाते हैं। जहाँ दो ही चरणोंका छन्द हो, वहाँ यदि प्रथम चरण बारह और द्वितीय चरण आठ अक्षरका हो तो वह 'द्विपाद् विराद्' नामक गायत्री छन्द है। [ जैसे ऋग्वेदमें– 'नृभिमानो हर्यतो विचक्षणो। राजा देवः समुद्रियः ॥' (९ । १०७ । १६)] ग्यारह अक्षरोंके तीन चरण होनेपर 'त्रिपाद् विराट्' नामक गायत्री होती है। [ उदाहरण ऋग्वेदमें - 'दुहीयन् मित्रधितये युवाकु राये च नो मिमीतं वाजवत्यै। इषे च नो मिमीतं धेनुमत्यै ॥' ( १ । १२० १९)] ॥ १-४॥
जब दो चरण आठ-आठ अक्षरोंके और एक चरण बारह अक्षरोंका हो तो वेदमें उसे 'उष्णिक्' नाम दिया गया है। प्रथम और तृतीय चरण आठ अक्षरोंके हों और बीचका द्वितीय चरण बारह अक्षरोंका हो तो वह तीन पादोंका 'ककुप् उष्णिक्' नामक छन्द होता है। [जैसे ऋग्वेदमें - 'सुदेवः समहासति सुवीरो नरो मरुतः स मर्त्यः । यं त्रायध्वेऽस्यासते॥ (इस मन्त्रमें 'मर्त्य के स्थानमें व्यूहकी रीतिसे 'मर्तिय' मानने तथा 'अस्यासते के स्थानमें 'अस्य आसते' इस प्रकार दीर्घ-व्यूह करनेसे पादकी पूर्ति होती है।)(५ । ५३ । १५)] जब प्रथम चरण बारह अक्षरोंका और द्वितीय तृतीय चरण आठ-आठ अक्षरोंके हों तो 'पुर उष्णिक्' नामक तीन पादोंवाला छन्द होता है। [जैसे ऋग्वेदमें– 'अप्स्वन्तरमृतमप्सु - भेषजमपामुत प्रशस्तये । देवा भवत वाजिनः ॥' (१ । २३ । १९ ) ] जब प्रथम और द्वितीय चरण आठ-आठ अक्षरोंके हों और तृतीय चरण बारह अक्षरोंका हो तो 'परोष्णिक्' छन्द होता है। [जैसे ऋग्वेदमें - 'अग्ने वाजस्य गोमत ईशानः सहसो यहो। अस्मे धेहि जातवेदो महि श्रवः (पाँचवें श्लोकमें 'उष्णिक छन्दका जो लक्षण दिया गया है, उसीसे यह भी गतार्थ हो जाता है। यहाँ 'परोष्णिकू' यह विशेष संज्ञा बतानेके लिये पुनः उल्लेख किया गया है।) ॥ (१ ७९ ४)] सात-सात अक्षरोंके चार चरण होनेपर भी 'उष्णिकू' नामक छन्द होता है। [जैसे ऋग्वेदमें 'नदं व ओदतीनां नदं यो युवतीनाम् । पतिं वो अध्न्यानां धेनूनामिषुध्यसि ।। ' ( ८ । ६९ । २) ]
आठ-आठ अक्षरके चार चरणोंका 'अनुष्टुप्' नामक छन्द होता है (पिङ्गलसूत्र में स्कन्धोग्रीवी' नाम आया है।)। [ जैसे यजुर्वेदमें—'सहस्त्रशीर्षा पुरुषः सहस्त्राक्षः सहस्रपात् । स भूमिं सर्वतः स्पृत्वा अत्यतिष्ठद्दशाङ्गुलम् ॥' (३१ । १)] अनुष्टुप् छन्द कहीं-कहीं तीन चरणोंका भी होता है। 'त्रिपाद अनुष्टुप्' दो तरहके होते हैं। एक तो वह है, जिसके प्रथम चरणमें आठ तथा द्वितीय और तृतीय चरणोंमें बारह बारह अक्षर होते हैं। दूसरा वह है, जिसका मध्यम अथवा अन्तिम पाद आठ अक्षरका हो तथा शेष दो चरण बारह बारह अक्षरके हों। आठ अक्षरके मध्यम पादवाले 'त्रिपाद् अनुष्टुप् ' का उदाहरण [जैसे ऋग्वेदमें – 'पर्यूपु प्र धन्व वाजसातय, परि वृत्राणि - सक्षणि: । द्विषस्तरध्या ऋणया न ईयसे ।' ( ९ ११० । १ ) ] तथा आठ अक्षरके अन्तिम चरणवाले 'त्रिपाद् अनुष्टुप्' का उदाहरण [ ऋग्वेदमें –'मा कस्मै धातमभ्यमित्रिणे नो मा कुत्रा नो गृहेभ्यो धेनवो गुः । स्तनाभुजो अशिश्वीः ॥' (१।१२०।८)]
यदि एक चरण 'जगती का ( अर्थात् बारह अक्षरका) हो और शेष तीन चरण गायत्रीके (अर्थात् आठ-आठ अक्षरके) हों तो यह चार चरणोंका 'बृहती छन्द' होता है। इसमें भी जब पहलेका स्थान तीसरा चरण ले ले अर्थात् वही जगतीका पाद हो और शेष तीन चरण गायत्रीके हों तो उसे 'पथ्या बृहती' कहते हैं। [जैसे सामवेदमें—'मा चिदन्यद् विशंसत सखायो मा रिषण्यत । इन्द्रमित् स्तोता वृषणं सचा सुते मुहुरुक्था च शंसत ॥' (२४२)] जब पहलेवाला 'जगती 'का चरण द्वितीय पाद हो जाय और शेष तीन गायत्रीके चरण हों तो 'न्यगुसारिणी बृहती' नामक छन्द होता है। [ जैसे ऋग्वेदमें – 'मत्स्यपायि - ते महः पात्रस्येव हरिवो मत्सरो मदः । वृषा ते वृष्णइन्दुर्वाजीसहस्त्रसातमः ॥' (१ । १७५ । १)] आचार्य क्रोष्टुकिके मतमें यह (न्यङ्कुसारिणी) 'स्कन्ध' या 'ग्रीवा' नामक छन्द है। यास्काचार्यने इसे ही 'उरोबृहती' नाम दिया है। जब अन्तिम (चतुर्थ) चरण 'जगती'का हो और आरम्भके तीन चरण गायत्रीके हों तो 'उपरिष्टाद् बृहती '(इसका उदाहरण सामवेदमें इस प्रकार है-'अग्ने जरितर्विश्पतिस्तपानो देव रखस आरोषिवान् गृहपते महाँ असि दिवस्पायुटुयेषयुः ॥' (३९)) नामक छन्द होता है। वही 'जगती 'का चरण जब पहले हो और शेष तीन चरण गायत्री छन्दके हों तो उसे 'पुरस्ताद् बृहती' छन्द कहते हैं। [जैसे ऋग्वेदमें – 'महो यस्पतिः शस्वसो असाम्या महो नृष्णस्य ततुजिः । मर्ता वज्रस्य धृष्णोः पिता पुत्रमिव प्रियम् (आठवें श्लोकके उत्तरार्धमें जो 'बृहती छन्द का लक्षण दिया गया है, उसीसे यह भी गतार्थ हो जाता है फिर भी विशेष संज्ञा देनेके लिये यहाँ पुनरुक्ति की गयी है।) ॥' (१०। २२ । ३)] वेदमें कहीं कहीं नौ-नौ अक्षरोंके चार चरण दिखायी देते हैं। वे भी 'बृहती' छन्दके ही अन्तर्गत हैं। [ उदाहरणके लिये ऋग्वेदमें – 'तं त्वा वयं पितो वचोभिर्गावो न हव्या सुषूदिम देवेभ्यस्त्वा सधमादमस्मभ्यं त्वा सधमादम् ॥' (१ । १८७ । ११)] जहाँ पहले दस अक्षरके दो चरण हों, फिर आठ अक्षरोंके दो चरण हों, उसे भी 'बृहती' छन्द कहते हैं। [जैसे सामवेदमें— 'अग्ने विवस्वदुषसश्चित्रं राधो अमर्त्य आ दाशुषे जातवेदो वहा त्वमद्या देवाँ उषर्बुधः ॥' (४०)] केवल 'जगती' छन्दके तीन चरण हों तो उसे 'महाबृहती' कहते हैं। [ जैसे ऋग्वेदमें– 'अजीजनो अमृत मर्त्येष्वाँ, ऋतस्य धर्मन्नमृतस्य चारुणः । सदा वाजमच्छासनिष्यदत्' (९ । ११०। ४)] ताण्डी नामक आचार्यके मतमें यही 'सतो बृहती' नामक छन्द है ॥५- १०॥
जहाँ दो पाद बारह बारह अक्षरोंके और दो आठ-आठ अक्षरोंके हों, वहाँ 'पङ्क्ति' नामक छन्द होता है। यदि विषम पाद अर्थात् प्रथम और तृतीय चरण पूर्वकथनानुसार बारह बारह अक्षरोंके हों और शेष दोनों आठ-आठ अक्षरोंके तो उसे 'सतः पङ्क्ति' नामक छन्द कहते हैं। [जैसे ऋग्वेदमें – 'यं त्वा देवासो मनवे दधुरिह यजिष्ठं हव्यवाहन यं कण्वो मेध्यातिथिर्धनस्पृतं यं वृषा यमुपस्तुतः ॥' (१।३६। १०) ] यदि वे ही चरण विपरीत अवस्थामें हों, अर्थात् प्रथम तृतीय चरण आठ-आठ अक्षरोंके और द्वितीय चतुर्थ बारह बारह अक्षरोंके तो भी वह छन्द 'सतः पङ्क्ति' ही कहलाता है। [जैसे ऋग्वेदमें–'य ऋष्ये श्रावयत्सखा - विश्वेत् स वेद जनिमा पुरुष्टुतः । तं विश्वे मानुषा युगे, इन्द्रं हवन्ते तविषं यतासुचः ॥' (८ । ४६ । १२) ]
जब पहलेके दोनों चरण बारह बारह अक्षरोंके - हों और शेष दोनों आठ-आठ अक्षरोंके, तो उसे 'प्रस्तारपङ्क्ति' कहते हैं। [ ग्यारहवें श्लोक बताये हुए 'पङ्क्ति' छन्दके लक्षणसे ही यह गतार्थ हो जाता है, तथापि विशेष संज्ञा देनेके लिये यहाँ पुनः उपादान किया गया है। मन्त्र ब्राह्मण में इसका उदाहरण इस प्रकार है- 'काम वेदते मदो नामासि समानया अमुं सुरा ते अभवत् । परमत्र जन्मा अग्ने तपसा निर्मितोऽसि ॥'] जब अन्तिम दो चरण बारह-बारह अक्षरोंके हों और आरम्भ दोनों आठ-आठ अक्षरोंके तो 'आस्तारपङ्क्ति नामक छन्द होता है। [ जैसे ऋग्वेदमें भद्रं नो - अपि वातय, मनो दक्षमुत क्रतुम् । अधा ते सख्य अन्धसो वि वो मदे रणन् गावो न यवसे विवक्षसे ।' (१०।२५ । १)] यदि बारह अक्षरोंवाले दो चरण बीचमें हों और प्रथम एवं चतुर्थ चरण आठ-आठ अक्षरोंके हों तो उसे 'विस्तारपङ्क्ति' कहते हैं। [जैसे ऋग्वेदमें- 'अग्ने तव श्रवो वयो, महि भ्राजन्ते अर्चयो विभावसो बृहद्धानो शवसा वाजमुक्थ्यं दधासि दाशुषे कवे॥' (१० | १४० | १) ] यदि बारह अक्षरोंवाले दो चरण बारह हों, अर्थात् प्रथम एवं चतुर्थ चरण के रूपमें हों और बीचके द्वितीय तृतीय चरण आठ-आठ अक्षरोंके हों तो वह 'संस्तारपङ्क्ति' नामक छन्द होता है। [ जैसे ऋग्वेदमें 'पितुभृतो न तन्तुमित् सुदानवः प्रतिदध्मो यजामसि । उषा अप स्वसुस्तमः संवर्तयति वर्तनि सुजातता ।' (१० | १७२ । ३)] पाँच-पाँच अक्षरोंके चार पाद होनेपर 'अक्षरपङ्क्ति' नामक छन्द होता है। [जैसे ऋग्वेदमें– 'प्र शुक्रैतु' देवी मनीषा। अस्मत् सुतष्ये रथो न वाजी ॥' (७ । ३४ । १)] पाँच अक्षरोंके दो ही चरण होनेपर 'अल्पशः पङ्क्ति' नामक छन्द कहलाता है। जहाँ पाँच-पाँच अक्षरोंके पाँच पाद हों, वहाँ 'पदपङ्क्ति' नामक छन्द जानना चाहिये। [जैसे ऋग्वेदमें—'घृतं न पूतं तनूररेपाः शुचि हिरण्यं तत्ते रुक्मो न रोचत स्वधावः ॥' १ (४ । १० । ६)] जब पहला चरण चार अक्षरोंका, दूसरा छः अक्षरोंका तथा शेष तीन पाद पाँच पाँच अक्षरोंके हों तो भी 'पद पङ्क्ति' छन्द ही होता है। आठ-आठ अक्षरोंके पाँच पादोंका 'पथ्यापङ्क्ति' नामक छन्द कहा गया है। [जैसे ऋग्वेदमें– 'अक्षन्नमीमदन्त व प्रिया अधूषत । अस्तोषत स्वभानवो विप्रा नविष्ठया यती योजान्विन्द्र ते हरी ॥' (१ । ८२ २)] आठ-आठ अक्षरों छः चरण होनेपर 'जगतीपङ्क्ति' नामक छन्द होता है। [ जैसे मन्त्रब्राह्मणमें– 'येन स्त्रियमकृणुतं येनापामृषतं सुराम्; येनाक्षामभ्यषिञ्चतम् । येनेमां पृथ्वीं महीं यद्वां तदश्विना यशस्तेन मामभिषिञ्चतम् ॥'] ॥ ११–१४ ॥
'त्रिष्टुप्' अर्थात् ग्यारह अक्षरोंका एक पाद हो और आठ-आठ अक्षरोंके चार पाद हों तो पाँच पादोंका 'त्रिष्टुब्योतिष्मती' नामक छन्द होता है। इसी प्रकार जब एक चरण 'जगती 'का अर्थात् बारह अक्षरोंका हो और चार चरण 'गायत्री ' के ( आठ-आठ अक्षरोंके) हों तो उस छन्दका नाम 'जगतीज्योतिष्मती' होता है। यदि पहला ही चरण ग्यारह अक्षरोंका हो और शेष चार चरण आठ-आठ अक्षरोंके हों तो पुरस्ताज्ज्योति २ नामक त्रिष्टुप् छन्द होता है १२ और यदि पहला ही चरण बारह अक्षरोंका तथा शेष चार चरण आठ-आठके हों तो 'पुरस्ता ज्योति' नामक जगती छन्द' होता है। जब मध्यम चरण ग्यारह अक्षरों और आगे-पीछेके दो-दो चरण आठ-आठके हों तो 'मध्ये ज्योति' नामक त्रिष्टुप् छन्द होता है; इसी प्रकार जब मध्यम चरण बारहका तथा आदि-अन्तके दो-दो चरण आठ-आठके हों तो 'मध्ये ज्योति'५ नामक - जगती छन्द होता है। जब आरम्भके चार चरण आठ-आठ अक्षरोंके हों तथा अन्तिम चरण ग्यारह अक्षरोंका हो तो उसे 'उपरिष्टाज्योसि ६ नामक त्रिष्टुप् छन्द कहते हैं। इसी प्रकार जब आदिके चार चरण पूर्ववत् आठ-आठके हों और अन्तिम पाद बारह अक्षरोंका हो तो उसका नाम 'उपरिष्टाज्योति" जगती छन्द होता है ॥ १५३ ॥
गायत्री आदि सभी छन्दोंके एक पादमें यदि पाँच अक्षर हों तथा अन्य पादोंमें पहले के अनुसार नियत अक्षर ही हों तो उस छन्दका नाम 'शङ्कुमती' होता है। [जैसे प्रथम पाद पाँच अक्षरका और तीन चरण छः छः अक्षरोंका होनेपर उसे 'शङ्कमती गायत्री' कह सकते हैं।] जब एक चरण छः अक्षरोंका हो और अन्य चरणोंमें पहले बताये अनुसार नियत अक्षर ही हों तो उसका नाम 'ककुदमती' होगा। जहाँ तीन पादवाले छन्दके पहले और दूसरे चरण में अधिक अक्षर हों और बीचवालेमें बहुत ही कम हों, वहाँ उस छन्दका नाम 'पिपीलिकमध्या' होगा। [जैसे त्रिपदा गायत्रीके आदि और अन्त चरण आठ-आठ अक्षरके हों तथा बीचवाला चरण तीन, चार या पाँच अक्षरका हो तो उसे 'पिपीलिकमध्या' कहेंगे।] इसके विपरीत जब आदि और अन्तवाले पादोंके अक्षर कम हों और बीचवाला पाद अधिक अक्षरोंका हो तो उस 'त्रिपाद् गायत्री' आदि छन्दको 'यवमध्या' कहते हैं। यदि 'गायत्री' या 'उष्णिकू' आदि छन्दोंमें केवल एक अक्षरकी कमी हो, उसकी 'निचृत्' यह विशेष संज्ञा होती है। एक अक्षरकी अधिकता होनेपर वह छन्द 'भूरिक्' नाम धारण करता है। इस प्रकार दो अक्षरोंकी कमी रहने पर 'विराट्' और दो अक्षर अधिक होनेपर 'स्वराट्' संज्ञा होती है। संदिग्ध अवस्थामें आदि पादके अनुसार छन्दका निर्णय करना चाहिये। [जैसे कोई मन्त्र छब्बीस अक्षरका है, उसमें गायत्रीसे दो अक्षर अधिक हैं और उष्णिक्से दो अक्षर कम - ऐसी दशामें वह 'स्वराड् गायत्री' छन्द है या 'विराड् उष्णिक्' ? – ऐसे संदेहयुक्त स्थलोंमें - यदि मन्त्रका पहला चरण 'गायत्री' से मिलता हो तो उसे 'स्वराड् गायत्री' कहेंगे और यदि प्रथम पाद 'उष्णिक्' से मिलता हो तो उसे 'विराड् उष्णिक्' कह सकते हैं। इसी तरह अन्यत्र भी समझना चाहिये। ] इसी प्रकार देवता, स्वर, वर्ण तथा गोत्र आदिके द्वारा संदिग्धस्थलमें छन्दका निर्णय हो सकता है। गायत्री आदि छन्दोंके देवता क्रमश: इस प्रकार हैं- अग्नि, सूर्य, चन्द्रमा, बृहस्पति, मित्रावरुण, इन्द्र तथा विश्वेदेव । उक्त छन्दोंके स्वर हैं- 'षड्ज' आदि। उनके नाम क्रमश: ये हैं- षड्ज, ऋषभ, गान्धार, मध्यम, पञ्चम, धैवत और निषाद। श्वेत, सारंग, पिशङ्ग, कृष्ण, नील, लोहित (लाल) तथा गौर—ये क्रमशः गायत्री आदि छन्दोंके वर्ण हैं। 'कृति' नामवाले छन्दोंका वर्ण गोरोचनके समान है और अतिच्छन्दोंका वर्ण श्यामल है। अग्निवेश्य, काश्यप, गौतम, अङ्गिरा, भार्गव, कौशिक तथा वसिष्ठ - ये क्रमशः उक्त सात छन्दोंके गोत्र बताये गये हैं ॥ १६ - २३ ॥
इस प्रकार आदि आग्रेय महापुराणमें 'छन्दस्सारका कथन' नामक तीन सौ तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३३० ॥
Summary of chapter 332 of the Agni Mahā Purana is as follows:
The science of giving (dāna) is enumerated, with emphasis on the mahādānas — the great gifts that carry extraordinary merit. Agni lists the canonical sixteen mahādānas: tula-puruṣa (gold equal to one's weight), hiraṇya-garbha (a golden cow), brahmaṇḍa (a golden globe), kalpavṛkṣa (a golden tree), and others. Each mahādāna is associated with a specific purāṇic narrative, a specific deity, and a specific fruit. The qualities required of the giver (śraddhā, purity, proper occasion, suitable recipient) and the disqualifications of the recipient are discussed, and the chapter closes with the principle that jñāna-dāna (gift of spiritual knowledge) surpasses all material gifts.