शंकरजी कहते हैं-
अब मैं 'सेवाचक्र' का प्रतिपादन कर रहा हूँ, जिससे सेवकको सेव्यसे लाभ तथा हानिका ज्ञान होता है। पिता, माता तथा भाई एवं स्त्री पुरुष - इन लोगोंके लिये - इसका विचार विशेषरूपसे करना चाहिये। कोई भी व्यक्ति पूर्वोक्त व्यक्तियोंमेंसे किससे लाभ प्राप्त कर सकेगा - इसका ज्ञान वह उस 'सेवाचक्र' से कर सकता है ॥ १-२ ॥
(सेवाचक्रका स्वरूप वर्णन करते हैं-) पूर्वसे पश्चिमको छः रेखाएँ और उत्तरसे दक्षिणको आठ तिरछी रेखाएँ खींचे। इस तरह लिखनेपर पैंतीस कोष्ठका 'सेवाचक्र' बन जायगा। उसमें ऊपरके कोष्ठोंमें पाँच स्वरोंको लिखकर पुनः स्पर्श-वर्णोंको लिखे । अर्थात् 'क' से लेकर 'ह' तकके वर्णोंका न्यास करे। उसमें तीन वर्णों (ङ, ञ, ण) को छोड़कर लिखे। नीचेवाले कोष्ठोंमें क्रमसे सिद्ध, साध्य, सुसिद्ध, शत्रु तथा मृत्यु - इनको लिखे। इस तरह लिखनेपर सेवाचक्र सर्वाङ्गसम्पन्न हो जाता है। इस चक्रमें शत्रु तथा मृत्यु नामके कोष्ठमें जो स्वर तथा अक्षर हैं, उनका प्रत्येक कार्यमें त्याग कर देना चाहिये। किंतु सिद्ध, साध्य, सुसिद्ध, शत्रु तथा मृत्यु नामवाले कोष्ठों में से किसी एक ही कोष्ठमें यदि सेव्य तथा सेवकके नामका आदि-अक्षर पड़े तो वह सर्वथा शुभ है। इसमें द्वितीय कोष्ठ पोषक है, तृतीय कोष्ठ धनदायक है, चौथा कोष्ठ आत्मनाशक है, पाँचवाँ कोष्ठ मृत्यु देनेवाला है। इस चक्र से मित्र, नौकर एवं बान्धवसे लाभकी प्राप्तिके लिये विचार करना चाहिये । अर्थात् हम किससे मित्रताका व्यवहार करें कि मुझे उससे लाभ हो तथा किसको नौकर रखें, जिससे लाभ हो एवं परिवारके किस व्यक्तिसे मुझे लाभ होगा- इसका विचार इस -
चक्रसे करे। जैसे- अपने नामका आदि-अक्षर तथा विचारणीय व्यक्तिके नामका आदि-अक्षर सेवाचक्रके किसी एक ही कोष्ठमें पड़ जाय तो वह शुभ है, अर्थात् उस व्यक्तिसे लाभ होगा- यह जाने। यदि पहलेवाले तीन कोष्ठों में से किसी एकमें अपने नामका आदि-वर्ण पहलेवाले तीन कोष्ठों (सि०, सा०, सु०) मेंसे किसी एकमें पड़े और विचारणीय व्यक्तिके नामका आदि-अक्षर चौथे तथा पाँचवें पड़े तो अशुभ होता है। चौथे तथा पाँचवें कोष्ठोंमें किसी एकमें सेव्यके तथा दूसरेमें सेवकके नामका आदि-वर्ण पड़े तो अशुभ ही होता है ॥ ३-८३॥
सेवाचक्रका स्वरूप―
अब अकारादि वर्गों तथा ताराओंके द्वारा सेव्य-सेवकका विचार कर रहे हैं - अवर्ग (अ इ उ ए ओ) का स्वामी देवता है, कवर्ग (क ख ग घ ङ) का स्वामी दैत्य है, चवर्ग (च छ ज झ ञ) का स्वामी नाग है, टवर्ग (ट ठ ड ढ (ण) का स्वामी गन्धर्व है, तवर्ग (त थ द ध न) का स्वामी ऋषि है, पवर्ग (पफ ब भ म) - का स्वामी राक्षस है, यवर्ग (य र ल व) का स्वामी पिशाच है, शवर्ग (श ष स ह) का स्वामी मनुष्य है। इनमें देवतासे बली दैत्य है, दैत्यसे बली सर्प है, सर्पसे बली गन्धर्व है, गन्धर्वसे बली ऋषि है, ऋषिसे बली राक्षस है, राक्षससे बली पिशाच है और पिशाचसे बली मनुष्य होता है। इसमें बली दुर्बलका त्याग करे अर्थात् सेव्य सेवक- इन दोनोंके नामोंके आदि अक्षरके द्वारा बली वर्ग तथा दुर्बल वर्गका ज्ञान करके बली वर्गवाले दुर्बल वर्गवालेसे व्यवहार न करें। एक ही वर्गके सेव्य तथा सेवकके नामका आदि वर्ण रहना उत्तम होता है । ९-१३ ॥ -
अब मैत्री-विभाग सम्बन्धी 'ताराचक्र' को सुनो पहले नामके प्रथम अक्षरके द्वारा नक्षत्र जान ले, फिर नौ ताराओंकी तीन बार आवृत्ति करनेपर सत्ताईस नक्षत्रोंकी ताराओंका ज्ञान हो जायगा। इस तरह अपने नामके नक्षत्रका तारा जान लें। १ जन्म, २ सम्पत्, ३ विपत् ४ क्षेम, ५ प्रत्यरि, ६ साधक, ७ वध, ८ मैत्र, ९ अतिमैत्र ये नौ ताराएँ हैं। इनमें 'जन्म' तारा अशुभ, 'सम्पत्' तारा अति उत्तम और 'विपत्' तारा निष्फल होती है। 'क्षेम' ताराको प्रत्येक कार्यमें लेना चाहिये। 'प्रत्यरि' तारासे धन-क्षति होती है। 'साधक' तारासे राज्य-लाभ होता है। 'वध' तारासे कार्यका विनाश होता है। 'मैत्र' तारा मैत्रीकारक है और 'अतिमैत्र' तारा हितकारक होती है।
विशेष प्रयोजन - जैसे सेव्य रामचन्द्र, सेवक हनुमान्– इन दोनोंमें भाव कैसा रहेगा, इसे जाननेके लिये हनुमान्के नामके आदि वर्ण (ह) के अनुसार पुनर्वसु नक्षत्र हुआ तथा रामके नामके आदि वर्ण (रा) के अनुसार नक्षत्र चित्रा हुआ। पुनर्वसुसे चित्राकी संख्या आठवीं हुई। इस संख्या के अनुसार 'मैत्र' नामक तारा हुई । अतः इन दोनोंकी मैत्री परस्पर कल्याणकर होगी-यों जानना चाहिये । १४–१८ ॥
(अब ताराचक्र कहते हैं-) प्रिये ! नामाक्षरोंके स्वरोंकी संख्या में वर्णोंकी संख्या जोड़ दे। उसमें बीसका भाग दे। शेषसे फलको जाने। अर्थात् स्वल्प शेषवाला व्यक्ति अधिक शेषवाले व्यक्तिसे लाभ उठाता है। जैसे सेव्य राम तथा सेवक हनुमान्। इनमें सेव्य रामके नामका र् २ आ-२ म् ५ । अ १ । सबका योग १० हुआ। इसमें २० से भाग दिया तो शेष १० सेव्यका हुआ तथा सेवक हनुमान्के नामका ह् ४ अ १ । न्-५ । उ=५ । म्-५ । आ= २ । न्५ । सबका योग २७ हुआ। इसमें २० का भाग दिया तो शेष ७ सेवकका हुआ । यहाँपर सेवकके शेषसे सेव्यका शेष अधिक हो रहा है, अतः हनुमान्जी रामजीसे पूर्ण लाभ उठायेंगे ऐसा ज्ञान होता है ॥ १९ ॥
अब नामाक्षरों में स्वरोंकी संख्याके अनुसार लाभ-हानिका विचार करते हैं। सेव्य सेवक दोनोंके बीच जिसके नामाक्षरों में अधिक स्वर हों, वह धनी है तथा जिसके नामाक्षरों में अल्प स्वर हों, वह ऋणी है। 'धन' स्वर मित्रताके लिये तथा 'ऋण' स्वर दासताके लिये होता है। इस प्रकार लाभ तथा हानिकी जानकारीके लिये 'सेवाचक्र' कहा गया। मेष मिथुन राशिवालों में प्रीति, मिथुन सिंह राशिवालोंमें मैत्री तथा तुला सिंह राशिवालों में महामैत्री होती है; किंतु धनु कुम्भ राशिवालों में मैत्री नहीं होती। अतः इन दोनोंको परस्पर सेवा नहीं करनी चाहिये। मीन वृष, वृष-कर्क, कर्क-कुम्भ, कन्या-वृश्चिक, मकर वृश्चिक, मीन - मकर राशिवालोंमें मैत्री तथा मिथुन कुम्भ, तुला मेष राशिवालोंकी परस्पर महामैत्री होती है। वृष-वृश्चिकमें परस्पर वैर होता है; मिथुन-धनु, कर्क- मकर, मकर कुम्भ, कन्या - मीन राशिवालों में परस्पर प्रीति रहती है। अर्थात् उपर्युक्त दोनों राशिवालों में सेव्य-सेवक भाव तथा मैत्री व्यवहार एवं कन्या वरका सम्बन्ध - सुन्दर तथा शुभप्रद होता है ॥ २० - २६ ॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'सेवा-चक्र आदिका वर्णन' नामक एक सौ बत्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १३२ ॥
Summary of chapter 134 of the Agni Mahā Purana is as follows:
Agni describes the mantra-prayogas intended for comprehensive mastery over all three worlds (trailokya-vijaya). The specific mantra of Trailokya-vijaya Viṣṇu is given along with its ṛṣi, chandas, and devatā-nyāsa. The worshipper performs a sequence of one lakh japa followed by daśāṃśa homa with white lotus and ghṛta; the practice installs in the sādhaka an aura of invincibility and divine authority. The chapter warns that these prayogas must be performed only with pure motivation and that their misuse for personal aggrandizement generates severe karmic retribution.