अग्नि महा पुराण

300- ग्रहबाधा एवं रोगोंको हरनेवाले मन्त्र तथा औषध आदिका कथन

अग्निदेव कहते हैं-

वसिष्ठ! अब मैं ग्रहोंके उपहार और मन्त्र आदिका वर्णन करूँगा, जो ग्रहोंको शान्त करनेवाले हैं। हर्ष, इच्छा, भय और शोकादिसे, प्रकृतिके विरुद्ध तथा अपवित्र भोजनसे और गुरु एवं देवताके कोपसे मनुष्यको पाँच प्रकारके उन्माद होते हैं। वे वातज, कफज, पित्तज, सन्निपातज और आगन्तुक कहे जाते हैं। भगवान् रुद्रके क्रोधसे अनेक प्रकारके देवादि ग्रह उत्पन्न हुए। वे ग्रह नदी, तालाब, पोखरे, पर्वत, उपवन, पुल, नदी-संगम, शून्य गृह, बिलद्वार और एकान्तवर्ती इकले वृक्षपर रहते और वहाँ जानेवाले पुरुषोंको पकड़ते हैं। इसके सिवा वे सोयी हुई गर्भवती स्त्रीको, जिसका ऋतुकाल निकट है उस नारीको, नंगी औरतको तथा जो ऋतुस्नान कर रही हो, ऐसी स्त्रीको भी पकड़ते हैं। मनुष्योंके अपमान, वैर, विघ्न, भाग्यमें उलट-फेर इन ग्रहोंसे ही होते हैं। जो मनुष्य देवता, गुरु, धर्मादि तथा सदाचार आदिका उल्लङ्घन करता है, पर्वत और वृक्ष आदिसे गिरता है, अपने केशोंको बार-बार नोचता है तथा लाल आँखें किये रुदन और नर्तन करता है, उसको 'रूप' ग्रहविशेषसे पीड़ित जानना चाहिये। जो मानव उद्वेगयुक्त, दाह और शूलसे पीड़ित, भूख-प्याससे व्याकुल और शिरोरोगसे आतुर होता और 'मुझे दो, मुझे दो'– यों कहकर याचना करता है, उसे 'बलिकामी' ग्रहसे पीड़ित जाने स्त्री, माला, स्नान और सम्भोगकी इच्छा से युक्त मनुष्यको 'रतिकामी' ग्रहसे गृहीत समझना चाहिये ॥ १-८॥

व्योमव्यापी, महासुदर्शनमन्त्र, विटपनासिक, पातालनारसिंहादि मन्त्र तथा चण्डीमन्त्र - ये ग्रहोंका

मर्दन ग्रहपीड़ाका निवारण करनेवाले हैं ('सहलार हुं फट्'- यह 'सुदर्शन' या 'महासुदर्शनमन्त्र' है। यह व्यापक प्रभावशाली होनेके कारण व्योमव्यापी' कहा गया है। 'विटपनासिक' शब्द नृसिंहरूपकी उग्रताका सूचक है। बड़े-बड़े वृक्ष उनकी नासिकाके अन्तर्गत आ जाते हैं। पृथ्वी और पाताललोकमें उनका प्रताप फैला हुआ है तथा पाताललोकमें उनका प्रादुर्भाव हुआ था, इसलिये भी उनको 'पातालनारसिंह' कहते हैं। 'पातालनारसिंहमन्त्र' इस प्रकार है-

'उग्रं वीरं महाविष्णुं ज्वलन्तं सर्वतोमुखम् । नृसिंहं भीषणं भद्रं मृत्युमृत्युं नमाम्यहम् ॥'

दुर्गासप्तशतीके सभी मन्त्र यहाँ 'चण्डीमन्त्र' के नामसे अभिहित हुए हैं। 'नारसिंहाद्या 'के आदि पदसे 'वीरनृसिंह' तथा 'सुदर्शन नृसिंहादि' मन्त्र समझने चाहिये। 'वीरनृसिंह मन्त्र' इस प्रकार है- 'ॐ नमो भगवते वीरनृसिंहाय ज्वालामालापिनद्धाङ्गायाग्निनेत्राय सर्वभूतविनाशनाय दह दह पच पच रक्ष रक्ष हीं हीं फट् स्वाहा।' इसका एक दूसरा रूप इस प्रकार भी है- ॐ नमो भगवते वीरनृसिंहाय ज्वालामालिने दीप्तदंष्ट्रायाग्निनेत्राय सर्वरक्षोघ्नाय सर्वभूतविनाशनाय सर्वज्वरं विनाशय हन हन दह दह पच पच बन्ध बन्ध रक्ष रक्ष हुं फट् स्वाहा।' 'सुदर्शन-नृसिंहमन्त्र इस प्रकार है- 'ॐ सहस्रारज्वालावर्तिने क्षीं हन हन हुं फट् स्वाहा।')॥ ९ ॥

(अब ग्रहपीडानाशन भगवान् सूर्यकी आराधना बतलाते हैं-) सूर्यदेव अपने दाहिने हाथों में पाश, अङ्कुश, अक्षमाला और कपाल तथा बायें हाथोंमें खट्वाङ्ग, कमल, चक्र और शक्ति धारण करते हैं। उनके चार मुख हैं। वे आठ भुजा और बारह नेत्र धारण करते हैं। सूर्यमण्डलके भीतर कमलके आसनपर विराजमान हैं और आदित्यादि देवगणोंसे घिरे हुए हैं। इस प्रकार उनका ध्यान और पूजन करके सूर्योदयकालमें उन्हें अर्घ्य दे। अर्घ्यदानका मन्त्र इस प्रकार है- श्वास (य), विष (ओं), अग्निमान् रण्डी (र्+ओं), हल्लेखा (ह्रीं) - ये संकेताक्षर हैं। इन सबको जोड़कर | शुद्ध मन्त्र हुआ-) 'याँ रौं ऐं ह्रीं कलशार्कायभूर्भुवः स्वरों ज्वालिनीकुलमुद्धर ॥ १० - १२३ ॥

ग्रहोंका ध्यान

सूर्यदेव कमलके आसनपर विराजमान हैं। उनकी अङ्गकान्ति अरुण है। वे रक्तवस्त्र धारण करते हैं। उनका मण्डल ज्योतिर्मय है। वे उदार स्वभावके हैं और दोनों हाथोंमें कमल धारण करते हैं। उनकी प्रकृति सौम्य है तथा सारे अङ्ग दिव्य आभूषणोंसे विभूषित हैं। सूर्य आदि सभी ग्रह सौम्य, बलदायक तथा कमलधारी हैं। उन सबका वस्त्र विद्युत् पुञ्जके समान प्रकाशमान है। चन्द्रमा श्वेत, मङ्गल और बुध लाल, बृहस्पति पीतवर्ण, शुक्र शुक्लवर्ण, शनैश्चर काले कोयले के समान कृष्ण तथा राहु और केतु धूमके समान वर्णवाले बताये गये हैं। इन सबके बायें हाथ बायीं जाँघपर स्थित हैं और दाहिने हाथमें अभयमुद्रा शोभा पाती है। ग्रहोंके अपने-अपने नामके आदि अक्षर बिन्दुयुक्त होकर बीजमन्त्र होते हैं। 'फट्' का उच्चारण करके दोनों हाथों का संशोधन करे। फिर अङ्गुष्ठसे लेकर करतलपर्यन्त करन्यास और नेत्ररहित हृदयादि पञ्चाङ्गन्यास करके भानुके मूल बीजस्वरूप तीन अक्षरों (ह्रां, ह्रीं, सः) (इनका उद्धार 'शारदातिलक' में इस प्रकार है आकाशमग्निदीर्धेन्दुसंयुक्तं भुवनेश्वरी सर्गान्वितो भृगुर्भानोस्त्र्यक्षरो मनुरीरितः ।। (१४।५८))द्वारा व्यापकन्यास करे। उसका क्रम इस प्रकार है - मूलाधारचक्रसे पादाग्रपर्यन्त प्रथम बीजका, कण्ठसे मूलाधारपर्यन्त द्वितीय बीजका और मूर्धासे लेकर कण्ठपर्यन्त तृतीय बीजका न्यास करे। (जैसा कि 'शारदातिलक' में निर्देश किया गया है आधारादि पदाग्रान्तं कण्ठादाधारकावधि मूर्धादि कण्ठपर्यन्तं क्रमाद् बीजत्रयं न्यसेत् ॥ (१४।५९))

इस प्रकार अङ्गन्याससहित व्यापकन्यासका सम्पादन करके अर्घ्यपात्रको अस्त्र मन्त्रसे प्रक्षालित करे और पूर्वोक्त मूलमन्त्रका उच्चारण करके उस पात्रको जलसे भर दे । फिर उसमें गन्ध, पुष्प, अक्षत और दूर्वा डालकर पुनः उसे अभिमन्त्रित करे। उस अभिमन्त्रित जलसे अपना और पूजाद्रव्यका अवश्य ही प्रोक्षण करे ॥ १३ - १९ ॥

तत्पश्चात् योगपीठकी कल्पना करके उस पीठके पायोंके रूपमें 'प्रभूत' आदिकी कल्पना करे। वे क्रमशः इस प्रकार हैं- प्रभूत, विमल, सार, आराध्य और परमसुख आग्नेयादि चार कोणोंमें और मध्यभागमें इनके नामके अन्तमें 'नमः' पद जोड़कर इनका आवाहन-पूजन करे ।

योगपीठके ऊपर हृदयकमलमें तथा दिशा विदिशाओं में दीप्ता आदि शक्तियोंकी स्थापना करे।(' 'श्रीविद्यार्णवतन्त्र' में 'प्रभूत' आदि पीठपादों और शक्तियों की स्थापना एवं पूजाके विषय में इस प्रकार उल्लेख मिलता है अग्रिकोणे प्रभूतक्ष दलमूलेषु पूर्वादि मध्ये विमलं नैऋते यजेत् । सारं वायव्यकोणे च समाराध्यं तथैशके ॥ सुखं परमपूर्वे च यजेन्मध्ये तु मन्त्रवित् । च विधिपूर्वकम् । दीप्तासूक्ष्मे जयाभद्रे विभूतिर्विमलान्विता ॥ विद्युता चान्या नवमी सर्वतोमुखी । पीठशक्तिः क्रमादेता निवर्णाः सुभूषिताः ॥ अमोघा विद्युता प्रभूत आदिके लिये पूजा-मन्त्र इस प्रकार है- 'प्रभूताय नमः आग्रेये । विमलाय नमः नैऋत्ये साराय नमः वायव्ये आराध्याय नमः ऐशान्याम् । परमसुखाय नमः मध्ये।' शक्तियोंके पूजामन्त्र मूलमें ही दिये गये हैं।)पीठके ऊपरी भागमें हृदयकमलको स्थापित करके उसके केसरोंमें आठ शक्तियोंकी पूजा करनी चाहिये । 'रां दीप्तायै नमः पूर्वस्याम् । रीं सूक्ष्मायै नमः आग्नेयकेसरे रूं जयायै नमः दक्षिणकेसरे। रें भद्रायै नमः नैर्ऋत्यकेसरे। रैं विभूत्यै नमः पश्चिमकेसरे। रौं विमलायै नमः वायव्यकेसरे। रौं अमोघायै नमः उत्तरकेसरे। रं विद्युतायै नमः ईशानकेसरे। रः सर्वतोमुख्यै नमः मध्ये। इस प्रकार शक्तियोंकी अर्चना करके - ॐ ब्रह्मविष्णुशिवात्मकाय सौराय योगपीठाय नमः । इस मन्त्रसे समस्त पीठकी पूजा करे । - सुव्रत ! तत्पश्चात् रवि आदि मूर्तियोंका आवाहन करके उन्हें पाद्यादि समर्पित करे और क्रमश: हृदादि षडङ्गन्यासपूर्वक पूजन करे। 'खं कान्तौ' इत्यादि संकेतसे 'खं खखोल्काय नमः' यह मन्त्र प्रकट होता है। (यथा 'खं' मन्त्रका स्वरूप है कान्त – 'ख' है, दण्डिनी– 'ख' है, चण्ड - 'उकार' है (संधि करनेपर 'खो' हुआ) मज्जादशनसंयुता मांसा 'ल' दीर्घा - दीर्घस्वर आकारसे युक्त जल 'क' अर्थात् 'का' तथा वायु – 'यकार'। इन सबके अन्तमें हृद् - नमः) इसके उच्चारणपूर्वक 'आदित्यमूर्ति परिकल्पयामि, रविमूर्ति परिकल्पयामि, भानुमूर्ति परिकल्पयामि, भास्करमूर्ति परिकल्पयामि, सूर्यमूर्ति परिकल्पयामि'– यों कहना चाहिये। इन मूर्तियोंके पूजनका मन्त्र इस प्रकार है – 'ॐ आदित्याय नमः। एं रवये - नमः। ॐ भानवे नमः। ई भास्कराय नमः । अं सूर्याय नमः ।' अग्निकोण, नैर्ऋत्यकोण, ईशान कोण और वायव्यकोण- इन चार कोणोंमें तथा मध्यमें हृदादि पाँच अङ्गोंकी उनके नाम मन्त्रोंसे पूजा करनी चाहिये । वे कर्णिकाके भीतर ही उक्त दिशाओंमें पूजनीय हैं। अस्त्रकी पूजा अपने सामनेकी दिशामें करनी चाहिये। पूर्वादि दिशाओं में क्रमशः चन्द्रमा, बुध, गुरु और शुक्र पूजनीय हैं तथा आग्नेय आदि कोणोंमें मङ्गल, शनैश्वर, राहु और केतुकी पूजा करनी चाहिये ॥ २० - २५३ ॥

पृश्निपर्णी, हींग, बच, चक्र (पित्तपापड़ा), शिरीष, लहसुन और आमय इन ओषधियोंको - बकरेके मूत्रमें पीसकर अञ्जन और नस्य तैयार कर ले । उस अञ्जन और नस्यके रूपमें उक्त औषधोंका उपयोग किया जाय तो वे ग्रहबाधाका निवारण करनेवाले होते हैं। पाठा, पथ्या (हरैं), वचा, शि (सहिजन), सिन्धु (सेंधा नमक), व्योष (त्रिकटु) - - इन औषधोंको पृथक्-पृथक् एक-एक पल लेकर उन्हें बकरीके एक आढ़क दूधमें पका ले और उस दूधसे घी निकाल ले। वह घी समस्त ग्रह - बाधाओंको हर लेता है। वृश्चिकाली (बिच्छू घास), फला, कूट, सभी तरहके नमक तथा शार्ङ्गक–इनको जलमें पका ले। उस जलका अपस्मार रोग (मिरगी) के विनाशके लिये उपयोग करे। विदारीकंद, कुश, काश तथा ईखके क्वाथसे सिद्ध किया हुआ दूध रोगीको पिलाये। जेठी मधु और भथएके एक दोन रसमें घीको पकाकर दे। अथवा पञ्चगव्य घीका उस रोगमें प्रयोग करे। अब ज्वर निवारक उपाय सुनो - ॥ २६ – ३० ॥

ज्वर गायत्री

ॐ भस्मास्त्राय विद्महे एकदंष्ट्राय धीमहि । तन्नो ज्वरः प्रचोदयात् ॥ ३१ ॥

(इस मन्त्रके जपसे ज्वर दूर होता है।) श्वास (दमा) का रोगी कृष्णोषण (काली मिर्च), हल्दी, रास्ना, द्राक्षा और तिलका तैल एवं गुड़का आस्वादन करे। अथवा वह रोगी जेठीमधु (मुलहठी) और घीके साथ भार्गीका सेवन करे या पाठा, तिक्ता (कुटकी), कर्णा (पिप्पली) तथा भार्गीको मधुके साथ चाटे। धात्री (आँवला), विश्वा (सोंठ), सिता (मिश्री), कृष्णा (पिप्पली), मुस्ता (नागरमोथा), खजूर मागधी (खजूर और पीपल (यहाँ पिप्पलीका नाम दुबारा आया है। जो द्रव्य दो बार आया हो, उसका दो भाग लिया जाता है।)) तथा पीवरा (शतावर) – ये औषध हिक्का (हिचकी) दूर करनेवाले हैं। उपर्युक्त तीनों योग मधुके साथ लेने चाहिये। कामल रोगसे ग्रस्त मनुष्यको जीरा, माण्डूकपर्णी, हल्दी और आँवलेका रस पिलाना चाहिये। त्रिकटु पद्मकाष्ठ, त्रिफला, वायविडङ्ग, देवदारु तथा रास्ना - इन सबको सममात्रामें लेकर चूर्ण बना ले और खाँड मिलाकर उसे खाये। इस औषध अवश्य ही खाँसी दूर हो जाती है ॥ ३२-३५॥

इस प्रकार आदि आग्रेय महापुराणमें 'ग्रहबाधाहारी मन्त्र तथा औषधका कथन' नामक तीन सौवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३०० ॥