अग्नि महा पुराण

163- श्राद्धकल्पका वर्णन

पुष्कर कहते हैं-

परशुराम ! अब मैं भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाले श्राद्धकल्पका वर्णन करता हूँ, सावधान होकर श्रवण कीजिये।श्राद्धकर्ता पुरुष मन और इन्द्रियोंको वश में रखकर, पवित्र हो, श्राद्धसे एक दिन पहले ब्राह्मणोंको निमन्त्रित करे। उन ब्राह्मणोंको भी उसी समयसे मन, वाणी, शरीर तथा क्रियाद्वारा पूर्ण संयमशील रहना चाहिये। श्राद्धके दिन अपराह्नकालमें आये हुए ब्राह्मणोंका स्वागतपूर्वक पूजन करे। स्वयं हाथमें कुशकी पवित्री धारण किये रहे। जब ब्राह्मणलोग आचमन कर लें, तब उन्हें आसनपर बिठाये। देवकार्यमें अपनी शक्तिके अनुसार युग्म (दो, चार छः आदि संख्यावाले) और श्राद्धमें अयुग्म (एक, तीन, पाँच आदि संख्यावाले) ब्राह्मणोंको निमन्त्रित करे। सब ओरसे घिरे हुए गोबर आदिसे लिपे पुते पवित्र - स्थानमें, जहाँ दक्षिण दिशाकी ओर भूमि कुछ नीची हो, श्राद्ध करना चाहिये। वैश्वदेव श्राद्धमें दो ब्राह्मणों को पूर्वाभिमुख बिठाये और पितृकार्यमें तीन ब्राह्मणोंको उत्तराभिमुख अथवा दोनों में एक-एक ब्राह्मणको ही सम्मिलित करे। मातामहोंके श्राद्धमें भी ऐसा ही करना चाहिये। अर्थात् दो वैश्वदेव श्राद्धमें और तीन मातामहादि-श्राद्धमें अथवा उभय पक्षमें एक ही एक ब्राह्मण रखे। वैश्वदेव-श्राद्धके लिये ब्राह्मणका हाथ धुलानेके निमित्त उसके हाथमें जल दे और आसनके लिये कुश दे। फिर ब्राह्मणसे पूछे– 'मैं विश्वेदेवोंका आवाहन करना चाहता हूँ।' तब ब्राह्मण आज्ञा दें-'आवाहन करो।' इस प्रकार उनकी आज्ञा पाकर 'विश्वेदेवास आगत०' (यजु० ७।३४) इत्यादि ऋचा पढ़कर विश्वेदेवोंका आवाहन करे। तब ब्राह्मणके समीपकी भूमिपर जौ बिखेरे। फिर पवित्रीयुक्त अर्घ्यपात्रमें 'शं नो देवी०' (यजु० ३६ १२) – इस मन्त्रसे जल छोड़े। 'यवोऽसि०' - इत्यादिसे जौ डाले। फिर बिना मन्त्रके ही गन्ध और पुष्प भी छोड़ दे। तत्पश्चात् 'या दिव्या आपः ०'– इस मन्त्रसे अर्घ्यको अभिमन्त्रित करके ब्राह्मणके हाथमें संकल्पपूर्वक अर्घ्य दे और कहे- 'अमुक श्राद्धे विश्वेदेवाः इदं वो हस्ताय नमः ।' यों कहकर वह अर्घ्यजल

कुशयुक्त ब्राह्मणके हाथमें या कुशापर गिरा दे तत्पश्चात् हाथ धोनेके लिये जल देकर क्रमशः गन्ध, पुष्प, धूप, दीप तथा आच्छादन वस्त्र अर्पण करे। पुनः हस्त शुद्धिके लिये जल दे । - (विश्वेदेवोंको जो कुछ भी देना हो, वह सव्यभाव से उत्तराभिमुख होकर दे और पितरोंको प्रत्येक वस्तु अपसव्यभावसे दक्षिणाभिमुख होकर देनी चाहिये। ) ॥ १-५३॥

वैश्वदेव-काण्डके अनन्तर यज्ञोपवीत अपसव्य करके पिता आदि तीनों पितरोंके लिये तीन द्विगुणभुग्न कुशोंको उनके आसनके लिये अप्रदक्षिण-क्रमसे दे। फिर पूर्ववत् ब्राह्मणों की आज्ञा लेकर 'उशन्तस्त्वा०' (यजु० १९।७०) इत्यादि मन्त्रसे पितरोंका आवाहन करके, 'आयन्तु नः०' (यजु० १९।५८) इत्यादिका जप करे। 'अपहता असुरा रक्षाःसि वेदिषदः ० '(यजु० २।२।८)– यह मन्त्र पढ़कर सब ओर तिल बिखेरे। वैश्वदेवश्राद्धमें जो कार्य जौसे किया जाता है, वही पितृ श्राद्धमें तिलसे करना चाहिये । अर्घ्य आदि पूर्ववत् करे। संस्रव (ब्राह्मणके हाथसे चूये हुए जल) पितृपात्र में ग्रहण करके, भूमिपर दक्षिणाग्र कुश रखकर, उसके ऊपर उस पात्रको अधोमुख करके ढुलका दे और कहे – 'पितृभ्यः - स्थानमसि।' फिर उसके ऊपर अर्घ्यपात्र और पवित्र आदि रखकर गन्ध, पुष्प, धूप, दीप आदि पितरोंको निवेदित करे। इसके बाद 'अग्नौकरण' कर्म करे। घीसे तर किया हुआ अन्न लेकर ब्राह्मणोंसे पूछे–'अग्नौ करिष्ये।' (मैं अग्निमें इसकी आहुति दूँगा।) तब ब्राह्मण इसके लिये आज्ञा दें। इस प्रकार आज्ञा लेकर पितृ यज्ञकी भाँति उस अन्नकी दो आहुति दे [उस समय ये दो मन्त्र क्रमशः पढ़े - 'अग्नये कव्यवाहनाय स्वाहा नमः । सोमाय पितृमते स्वाहा नमः ।' (यजु० २। २९) ] फिर होमशेष अन्नको एकाग्रचित्त होकर यथाप्राप्त पात्रोंमें - विशेषतः चाँदीके पात्रों में परोसे। इस प्रकार अन्न परोसकर, 'पृथिवी ते पात्रं द्यौरपिधानं ब्राह्मणस्य मुखे० ' इत्यादि मन्त्र पढ़कर पात्रको अभिमन्त्रित करे। फिर 'इदं विष्णु:०' (यजु० ५। १५) इत्यादि मन्त्रका उच्चारण करके अन्नमें ब्राह्मणके अँगूठेका स्पर्श कराये। तदनन्तर तीनों व्याहृतियोंसहित गायत्री मन्त्र तथा 'मधुवाता०' (यजु० १३ । २७ – २९)– इत्यादि तीन ऋचाओंका जप करे और ब्राह्मणोंसे कहे 'आप सुखपूर्वक अन्न ग्रहण करें। फिर वे ब्राह्मण भी मौन होकर प्रसन्नतापूर्वक भोजन करें (उस समय यजमान क्रोध और उतावलीको त्याग दे और) जबतक ब्राह्मणलोग पूर्णतया तृप्त न हो जायँ, तबतक पूछ-पूछकर प्रिय अन्न और हविष्य उन्हें परोसता रहे। उस समय पूर्वोक्त मन्त्रोंका तथा 'पावमानी' आदि ऋचाओंका जप या पाठ करते रहना चाहिये। तत्पश्चात् अन्न लेकर ब्राह्मणोंसे पूछे– 'क्या आप पूर्ण तृप्त हो गये ?' ब्राह्मण कहें– 'हाँ, हम तृप्त हो गये।' यजमान फिर पूछे 'शेष अन्नका क्या किया जाय?' ब्राह्मण कहें- 'इष्टजनोंके साथ भोजन करो।' उनकी इस आज्ञाको 'बहुत अच्छा' कहकर स्वीकार करे। फिर हाथमें लिये हुए अन्नको ब्राह्मणोंके आगे उनकी जूठनके पास ही दक्षिणाग्र कुश भूमिपर रखकर उन कुशोंपर - तिल-जल छोड़कर रख दे। उस समय 'अग्निदग्धाश्च ये०' इत्यादि मन्त्रका पाठ करे । फिर ब्राह्मणोंके हाथमें कुल्ला करनेके लिये एक एक बार जल दे। फिर पिण्डके लिये तैयार किया हुआ सारा अन्न लेकर, दक्षिणाभिमुख हो, पितृयज्ञ-कल्पके अनुसार तिलसहित पिण्डदान करे। इसी प्रकार मातामह आदिके लिये पिण्ड दे। फिर ब्राह्मणोंके आचमनार्थ जल दे। तदनन्तर ब्राह्मणोंसे स्वस्तिवाचन कराये और उनके हाथमें जल देकर उनसे प्रार्थनापूर्वक कहे – “आपलोग 'अक्षय्यमस्तु' कहें।" तब ब्राह्मण 'अक्षय्यम् अस्तु' बोलें। इसके बाद उन्हें यथाशक्ति दक्षिणा देकर कहे- 'अब मैं स्वधा वाचन कराऊँगा।' ब्राह्मण कहें—'स्वधा वाचन कराओ।' इस प्रकार उनकी आज्ञा पाकर 'पितरों और मातामहादिके लिये आप यह स्वधा वाचन करें' ऐसा कहे।तब ब्राह्मण बोलें- 'अस्तु स्वधा।' इसके अनन्तर पृथ्वीपर जल सींचे और 'विश्वेदेवाः प्रीयन्ताम् ।' यों कहे। ब्राह्मण भी इस वाक्यको दुहरायें– 'प्रीयन्तां विश्वेदेवाः'। तदनन्तर ब्राह्मणों की आज्ञासे श्राद्धकर्ता निम्नाङ्कित मन्त्रका जप करे ―

दातारो नोऽभिवर्धन्तां वेदाः संततिरेव च ।

श्रद्धा च नो मा व्यगमद् बहुदेयं च नोऽस्त्विति ॥ 'मेरे दाता बढ़ें। वेद और संतति बढ़े। हमारी श्रद्धा कम न हो और हमारे पास दानके लिये बहुत धन हो।'

- यह कहकर ब्राह्मणोंसे नम्रतापूर्वक प्रियवचन बोले और उन्हें प्रणाम करके विसर्जन करे 'वाजे वाजे०' (यजु० ९ १८) इत्यादि ऋचाओंको पढ़कर प्रसन्नतापूर्वक पितरोंका विसर्जन करे । पहले पितरोंका, फिर विश्वेदेवोंका विसर्जन करना चाहिये। पहले जिस अपात्रमें संस्रवका जल डाला गया था, उस पितृ पात्रको उतान करके ब्राह्मणोंको बिदा करना चाहिये। ग्रामकी सीमातक ब्राह्मणोंके पीछे-पीछे जाकर उनके कहनेपर उनकी परिक्रमा करके लौटे और पितृसेवित श्राद्धान्नको इष्टजनोंके साथ भोजन करे। उस रात्रिमें यजमान और ब्राह्मण-दोनों को ब्रह्मचारी रहना चाहिये ॥ ६ - २२ ॥

इसी प्रकार पुत्रजन्म और विवाहादि वृद्धिके  अवसरोंपर प्रदक्षिणावृत्तिसे नान्दीमुख-पितरोंका  यजन करे। दही और बेर मिले हुए अन्नका पिण्ड दे और तिलसे किये जानेवाले सब कार्य जौसे करे । एकोद्दिष्टश्राद्ध बिना वैश्वदेवके होता है। उसमें एक ही अर्घ्यपात्र तथा एक ही पवित्रक दिया जाता है। इसमें आवाहन और अग्नौकरणकी क्रिया नहीं होती। सब कार्य जनेऊको अपसव्य रखकर किये जाते हैं। 'अक्षय्यमस्तु' के स्थानमें 'उपतिष्ठताम्' का प्रयोग करे। 'वाजे वाजे०' इस मन्त्रसे ब्राह्मणका विसर्जन करते समय 'अभिरम्यताम्।' कहे और ब्राह्मणलोग 'अभिरताः स्मः ।' ऐसा उत्तर दें। सपिण्डीकरण श्राद्धमें पूर्वोक्त विधिसे अर्घ्यसिद्धि - लिये गन्ध, जल और तिलसे युक्त चार अर्घ्यपात्र तैयार करे। ( इनमें से तीन तो पितरोंके पात्र हैं और एक प्रेतका पात्र होता है।) इनमें प्रेतके पात्रका जल पितरोंके पात्रों में डाले। उस समय 'ये समाना०' इत्यादि दो मन्त्रोंका उच्चारण करे। शेष क्रिया पूर्ववत् करे। यह सपिण्डीकरण और एकोद्दिष्टश्राद्ध माताके लिये भी करना चाहिये। जिसका सपिण्डीकरण श्राद्ध वर्ष पूर्ण होनेसे - पहले हो जाता है, उसके लिये एक वर्षतक ब्राह्मणको सानोदक कुम्भदान देते रहना चाहिये । एक वर्षतक प्रतिमास मृत्यु तिथिको एकोद्दिष्ट - करना चाहिये। फिर प्रत्येक वर्षमें एक बार क्षयाहतिथिको एकोद्दिष्ट करना उचित है। प्रथम एकोद्दिष्ट तो मरनेके बाद ग्यारहवें दिन किया जाता है। सभी श्राद्धोंमें पिण्डोंको गाय, बकरे अथवा लेनेकी इच्छावाले ब्राह्मणको दे देना चाहिये। अथवा उन्हें अग्निमें या अगाध जलमें डाल देना चाहिये। जबतक ब्राह्मणलोग भोजन करके वहाँसे उठ न जायँ, तबतक उच्छिष्ट स्थानपर झाड़ न लगाये। श्राद्धमें हविष्यान्नके दानसे एक मासतक और खीर देनेसे एक वर्षतक पितरोंकी तृप्ति बनी रहती है। भाद्रपद कृष्णा त्रयोदशीको, विशेषतः मघा नक्षत्रका योग होनेपर जो कुछ पितरोंके निमित्त दिया जाता है, वह अक्षय होता है। एक चतुर्दशीको छोड़कर प्रतिपदासे अमावास्यातककी चौदह तिथियों में श्राद्धदान करनेवाला पुरुष क्रमश: इन चौदह फलोंको पाता है— रूपशीलयुक्त कन्या, बुद्धिमान् तथा रूपवान् दामाद, पशु, श्रेष्ठ पुत्र, द्यूत विजय, - खेतीमें लाभ, व्यापारमें लाभ, दो खुर और एक खुरवाले पशु, ब्रह्मतेजसे सम्पन्न पुत्र, सुवर्ण, रजत, कुप्यक (त्रपु सीसा आदि), जातियों में - श्रेष्ठता और सम्पूर्ण मनोरथ जो लोग शस्त्रद्वारा मारे गये हों, उन्हींके लिये उस चतुर्दशी तिथिको श्राद्ध प्रदान किया जाता है। स्वर्ग, संतान, ओज, शौर्य, क्षेत्र, बल, पुत्र, श्रेष्ठता, सौभाग्य, समृद्धि, प्रधानता, शुभ, प्रवृत्त-चक्रता (अप्रतिहत शासन), वाणिज्य आदि, नीरोगता, यश, शोकहीनता, परम गति, धन, विद्या, चिकित्सामें सफलता, कुप्य (त्रपु सीसा आदि), गौ, बकरी, भेड़, अश्व तथा आयु- इन सत्ताईस प्रकारके काम्य पदार्थोंको क्रमशः वही पाता है, जो कृत्तिकासे लेकर भरणीपर्यन्त प्रत्येक नक्षत्र में विधिपूर्वक श्राद्ध करता है तथा आस्तिक, श्रद्धालु एवं मद मात्सर्य आदि दोषोंसे रहित होता है। वसु, रुद्र और आदित्य — ये तीन प्रकारके पितर श्राद्ध के - देवता हैं। ये श्राद्धसे संतुष्ट किये जानेपर मनुष्योंके पितरोंको तृप्त करते हैं। जब पितर तृप्त होते हैं, तब वे मनुष्योंको आयु, प्रजा, धन, विद्या, स्वर्ग, | मोक्ष, सुख तथा राज्य प्रदान करते हैं ॥ २३ - ४२ ॥

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'श्राद्धकल्पका वर्णन' नामक एक सौ तिरसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १६३ ॥