भगवान् महेश्वर कहते हैं-
स्कन्द ! पूजनके पश्चात् अपने शरीरको वस्त्र आदिसे आवृत करके हाथमें अर्घ्यपात्र लिये उपासक अग्निशालामें जाय और दिव्यदृष्टिसे यज्ञके समस्त उपकरणोंकी कल्पना (संग्रह) करे। उत्तराभिमुख हो कुण्डको देखे। कुशोंद्वारा उसका प्रोक्षण एवं ताडन (मार्जन) करे ताडन तो अस्त्र मन्त्र ( फट् ) से करे; किंतु उसका अभ्युक्षण कवच मन्त्र (हुम्) से करना चाहिये। खड्गसे कुण्डका खात उद्धार, पूरण और समता करे। कवच (हुम्) से उसका - अभिषेक तथा शरमन्त्र ( फट्) से भूमिको कूटनेका कार्य करे। सम्मार्जन, उपलेपन, कलात्मक रूपकी कल्पना, त्रिसूत्री परिधान तथा अर्चन भी - सदा कवच मन्त्रसे ही करना चाहिये। कुण्ड उत्तरमें तीन रेखा करे। एक रेखा ऐसी खींचे, जो पूर्वाभिमुखी हो और ऊपरसे नीचेकी ओर गयी हो । कुश अथवा त्रिशूलसे रेखा करनी चाहिये। अथवा उन सभी रेखाओं में उलट-फेर भी किया जा सकता है ।। १-५॥
अस्त्र मन्त्र ( फट् ) का उच्चारण करके वज्रीकरणकी क्रिया करे। 'नमः' का उच्चारण करके कुशोंद्वारा चतुष्पथका न्यास करे। कवच मन्त्र (हुम्) बोलकर अक्षपात्रका और हृदय मन्त्र ( नमः) से विष्टरका स्थापन करे। 'वागीश्वर्यै नमः ।' 'ईशाय नमः'- ऐसा बोलकर वागीश्वरी देवी तथा ईशका आवाहन एवं पूजन करे। इसके बाद अच्छे स्थानसे शुद्धपात्रमें रखी हुई अग्निको ले आवे। उसमेंसे 'क्रव्यादमग्निं प्रहिणोमि दूरम्०' (शु० यजु० ३५ १९) इत्यादि मन्त्रके उच्चारणपूर्वक क्रव्यादके अंशभूत अग्निकणको निकाल दे। फिर निरीक्षण आदिसे शोधित
औदर्य, ऐन्दव तथा भौत - इन त्रिविध अग्नियोंको एकत्र करके, ॐ हूं वह्निचैतन्याय नमः । का उच्चारण करके अग्निबीज (रं) के साथ स्थापित करे ॥ ६-८॥
संहिता मन्त्रसे अभिमन्त्रित, धेनुमुद्राके प्रदर्शनपूर्वक अमृतीकरणकी क्रियासे संस्कृत, अस्त्र-मन्त्रसे सुरक्षित तथा कवच-मन्त्रसे अवगुण्ठित एवं पूजित अग्निको कुण्डके ऊपर प्रदक्षिणा क्रमसे तीन बार घुमाकर, 'यह भगवान् शिवका बीज है- ऐसा चिन्तन करके ध्यान करे कि वागीश्वरदेवने इस बीजको वागीश्वरीके गर्भ में स्थापित किया है। इस ध्यानके साथ मन्त्र साधक दोनों घुटने पृथ्वीपर टेककर नमस्कारपूर्वक उस अग्निको अपने सम्मुख कुण्डमें स्थापित कर दे। तत्पश्चात् जिसके भीतर बीजस्वरूप अग्निका आधान हो गया है, उस कुण्डके नाभिदेशमें कुशोंद्वारा परिसमूहन करे। परिधान सम्भार, शुद्धि, आचमन एवं नमस्कारपूर्वक गर्भाग्निका पूजन करके उस गर्भज अग्निकी रक्षाके लिये अस्त्र मन्त्रसे भावनाद्वारा ही वागीश्वरीदेवीके पाणिपल्लवमें कङ्कण (या रक्षासूत्र) बाँधे ॥ ९ - १३३ ॥
सद्योजात मन्त्रसे गर्भाधानके उद्देश्यसे अग्निका पूजन करके हृदय मन्त्रसे तीन आहुतियाँ दे। फिर भावनाद्वारा ही तृतीय मासमें होनेवाले पुंसवन संस्कारकी सिद्धिके लिये वामदेवमन्त्रद्वारा - अग्निकी पूजा करके, 'शिरसे स्वाहा।' बोलकर तीन आहुतियाँ दे। इसके बाद उस अग्निपर जलबिन्दुओंसे छींटा दे। तदनन्तर छठे मासमें होनेवाले सीमन्तोन्नयन संस्कारकी भावना करके,अघोर मन्त्रसे अग्निका पूजन करके 'शिखायै वषट् ।' का उच्चारण करते हुए तीन आहुतियाँ दे तथा शिखा मन्त्रसे ही मुख आदि अङ्गोंकी - कल्पना करे। मुखका उद्घाटन एवं प्रकटीकरण करे। तत्पश्चात् पूर्ववत् दसवें मासमें होनेवाले जातकर्म एवं नरकर्मकी भावनासे तत्पुरुष मन्त्रद्वारा दर्भ आदिसे अग्निका पूजन एवं प्रज्वलन करके गर्भमलको दूर करनेवाला स्नान करावे तथा ध्यानद्वारा देवीके हाथमें सुवर्ण बन्धन करके हृदय मन्त्रसे पूजन करे। फिर सूतककी तत्काल निवृत्तिके लिये अस्त्र-मन्त्रद्वारा अभिमन्त्रित जलसे अभिषेक करे ॥ १४-१९ ॥
कुण्डका बाहरकी ओरसे अस्त्र-मन्त्रके उच्चारणपूर्वक कुशोंद्वारा ताडन या मार्जन करे । फिर 'हुम्' का उच्चारण करके उसे जलसे सींचे। तत्पश्चात् कुण्डके बाहर मेखलाओंपर अस्त्र मन्त्रसे उत्तर और दक्षिण दिशाओं में पूर्वाग्र तथा पूर्व और पश्चिम दिशाओं में उत्तराग्र कुशाओं को बिछावे। उनपर हृदय मन्त्रसे परिधि विष्टर (आठों दिशाओंमें आसनविशेष) स्थापित करे। इसके बाद सद्योजातादि पाँच मुख सम्बन्धी मन्त्रोंसे तथा अस्त्र मन्त्रसे नालच्छेदनके उद्देश्यसे पाँच समिधाओंके मूलभागको घीमें डुबोकर उन पाँचोंकी आहुति दे। तदनन्तर ब्रह्मा, शंकर, विष्णु और अनन्तका दूर्वा और अक्षत आदिसे पूजन करे । पूजनके समय उनके नामके अन्तमें 'नमः' जोड़कर उच्चारण करे। यथा- 'ब्रह्मणे नमः । 'शंकराय नमः ।' 'विष्णवे नमः ।' 'अनन्ताय नमः ।' फिर कुण्डके चारों ओर बिछे हुए पूर्वोक्त आठ विष्टरोंपर पूर्वादि दिशाओं में क्रमशः इन्द्र, अग्नि, यम, निरृति, वरुण, वायु, कुबेर और ईशानका आवाहन और स्थापन करके यह भावना करे कि उन सबका मुख अग्निदेवकी ओर है। फिर उन सबकी अपनी-अपनी दिशामें पूजा करे। पूजाके समय उनके नाम मन्त्रके अन्तमें 'नमः' जोड़कर बोले। यथा- 'इन्द्राय नमः । इत्यादि ॥ २० - २३ ॥
इसके बाद उन सब देवताओंको भगवान् शिवकी यह आज्ञा सुनावे- 'देवताओ! तुम सब लोग विघ्नसमूहका निवारण करके इस बालक ( अग्नि) का पालन करो।' तदनन्तर ऊर्ध्वमुख स्रुक् और स्रुवको लेकर उन्हें बारी-बारीसे तीन बार अग्निमें तपावे। फिर कुशके मूल, मध्य और अग्रभागसे उनका स्पर्श करावे कुशसे स्पर्श कराये हुए स्थानों में क्रमशः आत्मतत्त्व, विद्यातत्त्व और शिवतत्त्व - इन तीनोंका न्यास करे। न्यास वाक्य इस प्रकार हैं- 'ॐ हां आत्मतत्त्वाय नमः । ॐ हीं विद्यातत्त्वाय नमः । ॐ हूँ शिवतत्त्वाय नमः । ॥ २४ – २६ ३ ॥
तत्पश्चात् स्रुक्में 'नमः' के साथ शक्तिका और स्रुवमें शिवका न्यास करे। यथा – 'शक्त्यै - नमः ।' 'शिवाय नमः । फिर तीन आवृत्ति में फैले हुए रक्षासूत्रसे स्रुक् और स्रुव दोनोंके ग्रीवाभागको आवेष्टित करे। इसके बाद पुष्पादिसे उनका पूजन करके अपने दाहिने भागमें कुशोंके ऊपर उन्हें रख दे। फिर गायका घी लेकर उसे अच्छी तरह देख-भालकर शुद्ध कर ले और अपने स्वरूपके ब्रह्ममय होनेकी भावना करके, उस घीके पात्रको हाथमें लेकर हृदय मन्त्रसे कुण्डके ऊपर अग्निकोणमें घुमाकर, पुनः अपने स्वरूपके विष्णुमय होनेकी भावना करे। तत्पश्चात् घृतको ईशानकोणमें रखकर कुशाग्रभागसे घी निकाले और 'शिरसे स्वाहा।' एवं 'विष्णवे स्वाहा।' बोलकर भगवान् विष्णुके लिये उस घृतबिन्दुकी आहुति दे। अपने स्वरूपके रुद्रमय होनेकी भावना करके, कुण्डके नाभिस्थानमें घृतको रखकर उसका आप्लावन करे ॥ २७ - ३१३ ॥ (फैलाये हुए अँगूठेसे लेकर तर्जनीतककी लंबाईको 'प्रादेश' कहते हैं।) प्रादेश बराबर लंबे दो कुशको अङ्गुष्ठ तथा अनामिका - इन दो अँगुलियोंसे पकड़कर उनके द्वारा अस्त्र ( फट् ) - के उच्चारणपूर्वक अग्निके सम्मुख घीको प्रवाहित करे। इसी प्रकार हृदय मन्त्र ( नमः) का उच्चारण करके अपने सम्मुख भी घृतका आप्लावन करे । 'नमः' के उच्चारणपूर्वक हाथमें लिये हुए कुशके दग्ध हो जानेपर उसे शस्त्र क्षेप (फट्के उच्चारण) - - के द्वारा पवित्र करे। एक जलते हुए कुशसे उसकी नीराजना (आरती) करके फिर दूसरे कुशसे उसे जलावे। उस जले हुए कुशको अस्त्र मन्त्रसे पुनः अग्निमें ही डाल दे। तत्पश्चात् घृतमें एक प्रादेश बराबर कुश छोड़े, जिसमें गाँठ लगायी गयी हो। फिर घीमें दो पक्षों तथा इडा आदि तीन नाड़ियोंकी भावना करे। इडा आदि तीनों भागोंसे क्रमशः स्रुवद्वारा घी लेकर उसका होम करे। 'स्वा' का उच्चारण करके स्रुवावस्थित घीको अग्निमें डाले और 'हा' का उच्चारण करके हुतशेष घीको उसे डालनेके लिये रखे हुए | पात्रविशेषमें छोड़ दे । अर्थात् 'स्वाहा' बोलकर क्रमशः दोनों कार्य (अग्निमें हवन और शेषका पात्रविशेषमें प्रक्षेप) करे ॥ ३२-३६ ॥
प्रथम इडाभागसे घी लेकर 'ॐ हामग्नये स्वाहा।' इस मन्त्रका उच्चारण करके घीका अग्निमें होम करे और हुतशेषका पात्रविशेषमें प्रक्षेप करे। इसी प्रकार दूसरे पिङ्गलाभागसे घी लेकर 'ॐ हां सोमाय स्वाहा।' बोलकर घीमें आहुति दे और शेषका पात्रविशेषमें प्रक्षेप करे। फिर 'सुषुम्णा' नामक तृतीय भागसे घी लेकर 'ॐ हामग्नीषोमाभ्यां स्वाहा।' बोलकर स्रुवाद्वारा घी अग्निमें डाले और शेषका पात्रविशेषमें प्रक्षेपण करे। तत्पश्चात् बालक अग्निके मुखमें नेत्रत्रयके स्थानविशेषमें तीनों नेत्रोंका उद्घाटन
करनेके लिये घृतपूर्ण स्रुवद्वारा निम्नाङ्कित मन्त्र बोलकर अग्निमें चौथी आहुति दे — 'ॐ हामग्नये स्विष्टकृते स्वाहा ॥ ३७ – ३९ ॥
तत्पश्चात् (पहले अध्यायमें बताये अनुसार) 'ॐ हां हृदयाय नमः स्वाहा।' इत्यादि छहों अङ्ग सम्बन्धी मन्त्रों द्वारा घीको अभिमन्त्रित करके धेनुमुद्राद्वारा जगावे। फिर कवच मन्त्र (हुम् ) से अवगुण्ठित करके शरमन्त्र (फट्) से उसकी रक्षा करे। इसके बाद हृदय मन्त्रसे घृतबिन्दुका उत्क्षेपण करके उसका अभ्युक्षण एवं शोधन करे। साथ ही शिवस्वरूप अग्निके पाँच मुखोंके लिये अभिघार होम, अनुसंधान- होम तथा मुखोंके एकीकरण सम्बन्धी होम करे। अभिघार होमकी - विधि यों है—'ॐ हां सद्योजाताय स्वाहा । ॐ - हां वामदेवाय स्वाहा । ॐ हां अघोराय स्वाहा । ॐ हां तत्पुरुषाय स्वाहा । ॐ हां ईशानाय स्वाहा।'– इन पाँच मन्त्रोंद्वारा सद्योजातादि पाँच मुखोंके लिये अलग-अलग क्रमशः घीकी एक-एक आहुति देकर उन मुखोंको अभिघारित घीसे आप्लावित करे। यही मुखाभिघार सम्बन्धी होम है। तत्पश्चात् दो-दो मुखोंके लिये एक साथ आहुति दे; यही मुखानुसंधान होम है। यह होम निम्नाङ्कित मन्त्रों से सम्पन्न करे - 'ॐ हां सद्योजातवामदेवाभ्यां स्वाहा । ॐ हां वामदेवाघोराभ्यां अघोरतत्पुरुषाभ्यां स्वाहा ।ॐ तत्पुरुषेशानाभ्यां स्वाहा।' ॥ ४०-४४ ३ ॥
तदनन्तर कुण्डमें अग्निकोणसे वायव्यकोणतक तथा नैर्ऋत्यकोणसे ईशानकोणतक घीकी अविच्छिन्न धाराद्वारा आहुति देकर उक्त पाँचों मुखोंकी एकता करे। यथा- 'ॐ हां सद्योजातवामदेवाघोर तत्पुरुषेशानेभ्यः स्वाहा।' - इस मन्त्रसे पाँचों मुखोंके लिये एक ही आहुति देनेसे उन सबका एकीकरण होता है। इस प्रकार इष्टमुखमें सभी मुखोंका अन्तर्भाव होता है, अतः वह एक ही मुख उन सभी मुखोंका आकार धारण करता है - उन सबके साथ उसकी एकता हो जाती है। इसके बाद कुण्डके ईशानकोणमें अग्निकी पूजा करके, अस्त्र-मन्त्रसे तीन आहुतियाँ देकर अग्निका नामकरण करे- “हे अग्निदेव ! तुम सब प्रकारसे शिव हो, तुम्हारा नाम 'शिव' है।" इस प्रकार नामकरण करके नमस्कारपूर्वक, पूजित हुए माता-पिता वागीश्वरी एवं वागीश्वर अथवा शक्ति एवं शिवका अग्निमें विसर्जन करके उनके लिये विधिपूरक पूर्णाहुति दे। मूल मन्त्रके अन्तमें 'वौषट्' पद जोड़कर (यथा - ॐ नमः शिवाय वौषट् । - ऐसा कहकर) शिव और शक्तिके लिये विधिपूर्वक पूर्णाहुति देनी चाहिये। तत्पश्चात् हृदय कमलमें अङ्ग और सेनासहित परम तेजस्वी शिवका पूर्ववत् आवाहन करके पूजन करे और उनकी आज्ञा लेकर उन्हें पूर्णतः तृप्त करे ॥ ४५-४९ ॥
यज्ञाग्नि तथा शिवका अपने साथ नाडीसंधान करके अपनी शक्तिके अनुसार मूल मन्त्रसे अङ्गसहित दशांश होम करे। घी, दूध और मधुका एक-एक 'कर्ष' (सोलह माशा) होम करना चाहिये। दहीकी आहुतिकी मात्रा एक 'सितुही' बतायी गयी है। दूधकी आहुतिका मान एक 'पसर' है। सभी भक्ष्य पदार्थों तथा लावाकी आहुतिकी मात्रा एक-एक 'मुट्ठी' है। मूलके तीन टुकड़ोंकी एक आहुति दी जाती है। फलकी आहुति उसके अपने ही प्रमाणके अनुसार दी जाती है, अर्थात् एक आहुतिमें छोटा हो या बड़ा एक फल देना चाहिये। उसे खण्डित नहीं करना चाहिये। अन्नकी आहुतिका मान आधा ग्रास है। जो सूक्ष्म किसमिस आदि वस्तुएँ हैं, उन्हें एक बार पाँचकी संख्या में लेकर होम करना चाहिये। ईखकी आहुतिका मान एक 'पोर' है। लताओंकी आहुतिका मान दो-दो अङ्गुलका टुकड़ा है। पुष्प और पत्रकी आहुति उनके अपने ही मानसे दी जाती है, अर्थात् एक आहुतिमें पूरा एक फूल और पूरा एक पत्र देना चाहिये। समिधाओंकी आहुतिका मान दस अङ्गुल है । ५०-५४ ।।
कपूर, चन्दन, केसर और कस्तूरीसे बने हुए दक्ष कर्दम (अनुलेपविशेष) की मात्रा एक - कलाय (मटर या केराव) के बराबर है। गुग्गुली - मात्रा बेरके बीजके बराबर होनी चाहिये। कंदोंके आठवें भागसे एक आहुति दी जाती है। इस प्रकार विचार करके विधिपूर्वक उत्तम होम करे । इस तरह प्रणव तथा बीज पदोंसे युक्त मन्त्रों द्वारा होम-कर्म सम्पन्न करना चाहिये । ५५-५६॥
तदनन्तर घीसे भरे हुए स्रुक्के ऊपर अधोमुख स्रुवको रखकर स्रुक्के अग्रभागमें फूल रख दे। फिर बायें और दायें हाथसे उन दोनोंको शङ्खकी मुद्रासे पकड़े। इसके बाद शरीरके ऊपरी भागको उन्नत रखते हुए उठकर खड़ा हो जाय। पैरोंको समभावसे रखे। स्रुक् और स्रुव दोनोंके मूलभागको अपनी नाभिमें टिका दे। नेत्रोंको स्रुक्के अग्र भागपर ही स्थिरतापूर्वक जमाये रखे। ब्रह्मा आदि कारणोंका त्याग करते हुए भावनाद्वारा सुषुम्णा नाड़ीके मार्गसे निकलकर ऊपर उठे नुक् खुवके मूलभागको नाभिसे ऊपर उठाकर बायें स्तनके पास ले आवे अपने तन-मनसे आलस्यको दूर रखे तथा (ॐ नमः शिवाय वौषट् । - इस प्रकार) मूल मन्त्रका वौषट् पर्यन्त अस्पष्ट - (मन्द स्वरसे) उच्चारण करे और उस घीको जौकी-सी पतली धाराके साथ अग्निमें होम दे ॥ ५७-६०३ ॥
इसके बाद आचमन, चन्दन और ताम्बूल आदि देकर भक्तिभावसे भगवान् शिवके ऐश्वर्यकी वन्दना करते हुए उनके चरणों में उत्तम (साष्टाङ्ग) प्रणाम करे। फिर अग्निकी पूजा करके 'ॐ ह अस्त्राय फट् ।' के उच्चारणपूर्वक संहारमुद्राके द्वारा शंवरोंका आहरण करके इष्टदेवसे 'भगवन् ! मेरे अपराधको क्षमा करें- ऐसा कहकर हृदय मन्त्रसे पूरक प्राणायामके द्वारा उन तेजस्वी परिधियों को बड़ी श्रद्धा के साथ अपने हृदयकमलमें स्थापित करे ॥ ६१-६३३ ॥ सम्पूर्ण पाक ( रसोई ) से अग्रभाग निकालकर कुण्डके समीप अग्निकोणमें दो मण्डल बनाकर एकमें अन्तर्बलि दे और दूसरेमें बाह्य बलि। प्रथम मण्डलके भीतर पूर्व दिशामें ॐ हां रुद्रेभ्यः स्वाहा।'– इस मन्त्रसे रुद्रोंके लिये बलि (उपहार) अर्पित करे। दक्षिण दिशामें ॐ हां मातृभ्यः स्वाहा।' कहकर मातृकाओंके लिये, पश्चिम दिशामें ॐ हां गणेभ्यः स्वाहा तेभ्योऽयं बलिरस्तु।' ऐसा कहकर गणोंके लिये, उत्तर दिशामें 'ॐ हां यक्षेभ्यः स्वाहा तेभ्योऽयं बलिरस्तु।' कहकर यक्षोंके लिये, ईशानकोणमें 'ॐ हां ग्रहेभ्यः स्वाहा तेभ्योऽयं बलिरस्तु।' ऐसा कहकर ग्रहोंके लिये, अग्निकोणमें ॐ हां असुरेभ्यः स्वाहा तेभ्योऽयं बलिरस्तु।' ऐसा कहकर असुरोंके लिये, नैर्ऋत्यकोणमें ॐ हां रक्षोभ्यः स्वाहा तेभ्योऽयं बलिरस्तु।' ऐसा कहकर राक्षसोंके लिये, वायव्यकोणमें ॐ हां नागेभ्यः स्वाहा तेभ्योऽयं बलिरस्तु।' ऐसा कहकर नागोंके लिये तथा मण्डलके मध्यभागमें ॐ हां नक्षत्रेभ्यः स्वाहा तेभ्योऽयं बलिरस्तु' ऐसा कहकर नक्षत्रों के लिये बलि अर्पित करे ॥ ६४-६७ ॥
इसी तरह ॐ हां राशिभ्यः स्वाहा तेभ्योऽयं बलिरस्तु।' ऐसा कहकर अग्निकोणमें राशियों के लिये, ॐ हां विश्वेभ्यो देवेभ्यः स्वाहा तेभ्योऽयं बलिरस्तु।' ऐसा कहकर नैर्ऋत्यकोणमें विश्वेदेवोंके लिये तथा 'ॐ हां क्षेत्रपालाय स्वाहा तस्मा अयं बलिरस्तु।' ऐसा कहकर पश्चिममें क्षेत्रपालको बलि दे ॥ ६८ ॥
तदनन्तर दूसरे बाह्य-मण्डलमें पूर्व आदि दिशाओंके क्रमसे इन्द्र, अग्नि, यम, निरृति, जलेश्वर वरुण, वायु, धनरक्षक कुबेर तथा ईशानके लिये बलि समर्पित करे। फिर ईशानकोणमें 'ॐ ब्रह्मणे नमः स्वाहा।' कहकर ब्रह्माके लिये तथा नैर्ऋत्यकोणमें 'ॐ विष्णवे नमः स्वाहा।' कहकर भगवान् विष्णुके लिये बलि दे। मण्डलसे बाहर काक आदिके लिये भी बलि देनी चाहिये। आन्तर और बाह्य-दोनों बलियोंमें उपयुक्त होनेवाले मन्त्रों को संहारमुद्राके द्वारा अपने-आपमें समेट ले ॥ ६९-७१ ॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'शिवपूजाके अङ्गभूत होमकी विधिका निरूपण' नामक पचहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७५ ॥
Summary of chapter 76 of the Agni Mahā Purana is as follows:
The seventy-sixth chapter describes the worship of Caṇḍeśvara (also known as Caṇḍa or Caṇḍeśa) — the great devotee of Śiva who was elevated to the status of Śiva's chief among the gaṇa-s (attendants). Caṇḍeśvara is worshipped at the end of the daily Śiva pūjā as the final act before the worshipper leaves the temple. His four-armed form holding the axe (ṭaṅka) and the crescent moon, standing on the half-moon shaped maṇḍala in the northwest corner of the temple, is described. The singular honor of offering Śiva's own nirmāḷya (the flowers, bilva leaves, and other materials used in the day's worship) to Caṇḍeśvara — who as Śiva's chief devotee has the right to receive what Śiva himself has accepted — is prescribed. The year-end completion prayer offered through Caṇḍeśvara to Śiva is given.