अग्निदेव कहते हैं –
ब्रह्मन्! भ्रान्त, उद्भ्रान्त, - आविद्ध, आप्लुत, विप्लुत, प्लुत (या सृत), सम्पात, समुदीर्ण, श्येनपात, आकुल, उद्भूत, अवधूत, सव्य, दक्षिण, अनालक्षित, विस्फोट, करालेन्द्र, महासख, विकराल, निपात, विभीषण, भयानक, समग्र, अर्ध, तृतीयांश, पाद, पादार्थ, वारिज, प्रत्यालीढ़, आलीढ़, वराह और लुलित – ये रणभूमिमें दिखाये जानेवाले ढाल-तलवारके बत्तीस हाथ (या चलानेके ढंग) हैं; इन्हें जानना चाहिये ॥ १-४ ॥
परावृत्त, अपावृत्त, गृहीत, लघु, ऊर्ध्वक्षिप्त, अधःक्षिप्त, संधारित, विधारित, श्येनपात, गजपात और ग्राह-ग्राह्य- ये युद्धमें 'पाश' फेंकनेके ग्यारह प्रकार हैं ॥ ५-६ ॥
ऋजु, आयत, विशाल, तिर्यक् और भ्रामित ये पाँच कर्म 'व्यस्तपाश' के लिये ममहात्माओंने बताये हैं ॥ ७ ॥
छेदन, भेदन, पात, भ्रमण, शमन, विकर्तन तथा कर्तन - ये सात कर्म 'चक्र 'के हैं ॥ ८ ॥ आस्फोट, क्ष्वेडन, भेद, त्रास, आन्दोलितकbऔर आघात – ये छः 'शूल 'के कर्म जानो ॥ ९ ॥
द्विजोत्तम! दृष्टिघात, भुजाघात, पार्श्वघात, ऋजुपात, पक्षपात और इषुपात – ये 'तोमर के कार्य कहे गये हैं ॥ १० ॥
विप्रवर! आहत, विहत, प्रभूत, कमलासन, ततोर्ध्वगात्र, नमित, वामदक्षिण, आवृत्त, परावृत्त, पादोद्भूत, अवप्लुत, हंसमर्द (या हंसमार्ग) तथा विमर्द - ये 'गदा-सम्बन्धी' कर्म कहे गये हैं ॥ ११-१२॥
कराल, अवघात, दंशोपप्लुत, क्षिप्तहस्त, स्थित और शून्य- ये 'फरसे के कर्म समझने चाहिये ॥ १३ ॥
विप्रवर! ताड़न, छेदन, चूर्णन, प्लवन तथा घातन – ये 'मुद्गर 'के कर्म हैं ॥ १४ ॥
संश्रान्त, विश्रान्त, गोविसर्ग तथा सुदुर्धर - ये 'भिन्दिपाल के कर्म हैं और 'लगुड 'के भी वे ही कर्म बताये गये हैं ॥ १५ ॥ द्विजोत्तम! अन्त्य, मध्य, परावृत्त तथा निदेशान्त – ये 'वज्र' और 'पट्टिश 'के कर्म हैं ॥ १६ ॥
हरण, छेदन, घात, भेदन, रक्षण, पातन तथा स्फोटन – ये 'कृपाण 'के कर्म कहे गये हैं ॥ १७ ॥
त्रासन, रक्षण, घात, बलोद्धरण और आयत ये 'क्षेपणी' (गोफन) के कार्य कहे गये हैं। ये ही यन्त्र के भी कर्म हैं ॥ १८ ॥संत्याग, अवदंश, वराहोद्भूतक, हस्तावहस्त, आलीन, एकहस्त, अवहस्तक, द्विहस्त, बाहुपाश, कटिरेचितक, उद्गत, उरोघात, ललाटघात, भुजाविधमन, करोद्धूत, विमान, पादाहति, विपादिक, गात्रसंश्लेषण, शान्त, गात्रविपर्यय, ऊर्ध्वप्रहार, घात, गोमूत्र, सव्य, दक्षिण, पारक, तारक, दण्ड (गण्ड), कबरीबन्ध, आकुल, तिर्यग्बन्ध, अपामार्ग, भीमवेग, सुदर्शन, सिंहाक्रान्त, गजाक्रान्त और गर्दभाक्रान्त - ये 'गदायुद्ध 'के हाथ जानने चाहिये। अब 'मल्लयुद्ध के दाव-पेंच बताये जाते हैं ॥ १९ - २३३ ॥
आकर्षण, विकर्षण, बाहुमूल, ग्रीवाविपरिवर्त, सुदारुण, पृष्ठभङ्ग, पर्यासन, विपर्यास, पशुमार, अजाविक, पादप्रहार, आस्फोट, कटिरेचितक, गात्राश्लेष, स्कन्धगत, महीव्याजन, उरोललाटघात, विस्पष्टकरण, उद्धृत, अवधूत, तिर्यड्मार्गगत, गजस्कन्ध, अवक्षेप, अपराङ्मुख, देवमार्ग, अधोमार्ग, अमार्गगमनाकुल, यष्टिघात, अवक्षेप, वसुधादारण, जानुबन्ध, भुजाबन्ध, सुदारुण, गात्रबन्ध, विपृष्ठ, सोदक, श्वभ्र तथा भुजावेष्टित ॥ २४- २९ ।।
युद्धमें कवच धारण करके, अस्त्र-शस्त्र सम्पन्न हो, हाथी आदि वाहनोंपर चढ़कर उपस्थित होना चाहिये। हाथीपर उत्तम अङ्कुश धारण किये दो महावत या चालक रहने चाहिये। उनमें से एक तो हाथीकी गर्दनपर सवार हो और दूसरा उसके कंधेपर। इनके अतिरिक्त सवारों में दो धनुर्धर होने चाहिये और दो खड्गधारी ॥ ३०-३१ ।।
प्रत्येक रथ और हाथीकी रक्षाके लिये तीन-तीन घुड़सवार सैनिक रहें तथा घोड़ेकी रक्षाके लिये तीन-तीन धनुर्धर पैदल सैनिक रहने चाहिये। धनुर्धरकी रक्षाके लिये चर्म या ढाल लिये रहनेवाले | योद्धाकी नियुक्ति करनी चाहिये ॥ ३२ ॥
जो प्रत्येक शस्त्रका उसके अपने मन्त्रोंसे पूजन करके ' त्रैलोक्यमोहन-कवच 'का पाठ करनेके अनन्तर युद्धमें जाता है, वह शत्रुओंपर विजय पाता और भूतलकी रक्षा करता है। (पाठान्तरके अनुसार शत्रुओंपर विजय पाता और उन्हें निश्चय ही मार गिराता है ) ।। ३३ ।।
इस प्रकार आदि आग्रेय महापुराणमें 'धनुर्वेदका कथन' नामक दो सौ बावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २५२ ।।
Summary of chapter 254 of the Agni Mahā Purana is as follows:
The science of auspicious timing (muhūrta) is expounded in detail. Agni explains the thirty muhūrtas that divide the day, identifies the inauspicious rāhu-kāla and yama-gaṇḍa periods, and describes the composition of a fully auspicious muhūrta based on the confluence of favorable tithi, vāra, nakṣatra, yoga, and karaṇa — the five elements of the Pañcāṅga. Specific muhūrtas for marriage (vivāha), upanayana, journey, and agricultural operations are prescribed.