अग्निदेव कहते हैं-
वसिष्ठ ! अब मैं चतुर्दशी तिथिको किये जानेवाले व्रतका वर्णन करूँगा। वह व्रत भोग और मोक्ष देनेवाला है। कार्तिककी चतुर्दशीको निराहार रहकर भगवान् शिवका पूजन करे और वहींसे आरम्भ करके प्रत्येक मासकी शिव चतुर्दशीको व्रत और शिवपूजनका क्रम चलाते हुए एक वर्षतक इस नियमको निभावे। ऐसा करनेवाला पुरुष भोग, धन और दीर्घायुसे सम्पन्न होता है ॥ १३ ॥
मार्गशीर्ष मासके शुक्लपक्षमें अष्टमी, तृतीया, द्वादशी अथवा चतुर्दशीको मौन धारण करके फलाहारपर रहे और देवताका पूजन करे तथा कुछ फलोंका सदाके लिये त्याग करके उन्हींका दान करे । इस प्रकार 'फलचतुर्दशी का व्रत करनेवाला पुरुष शुक्ल और कृष्ण दोनों पक्षोंकी चतुर्दशी एवं अष्टमीको उपवासपूर्वक भगवान् शिवकी पूजा करे । इस विधिसे दोनों पक्षोंकी चतुर्दशीका व्रत करनेवाला मनुष्य स्वर्गलोकका भागी होता है। कृष्णपक्षकी अष्टमी तथा चतुर्दशीको नक्तव्रत (केवल रातमें भोजन) करनेसे साधक इहलोकमें अभीष्ट भोग तथा परलोकमें शुभ गति पाता है। कार्तिककी कृष्णा चतुर्दशीको स्नान करके ध्वजके आकारवाले बाँसके डंडोंपर देवराज इन्द्रकी आराधना करनेसे मनुष्य सुखी होता है ॥ २-६ ॥
तदनन्तर प्रत्येक मासकी शुक्ल चतुर्दशीको श्रीहरिके कुशमय विग्रहका निर्माण करके उसे जलसे भरे पात्रके ऊपर पधरावे और उसका पूजन करे। उस दिन अगहनी धानके एक से चावलके आटेका पूआ बनवा ले। उसमेंसे आधा ब्राह्मणको दे दे और आधा अपने उपयोगमें लावे ॥ ७-८॥
नदियोंके तटपर इस व्रत और पूजनका आयोजन करके वहीं श्रीहरिके 'अनन्तव्रत' की कथाका भी श्रवण या कीर्तन करना चाहिये। उस समय चतुर्दश ग्रन्थियोंसे युक्त अनन्तसूत्रका निर्माण करके अनन्तकी भावनासे ही उसका पूजन करे। फिर निम्नाङ्कित मन्त्रसे अभिमन्त्रित करके उसे अपने हाथ या कण्ठमें बाँध ले मन्त्र इस प्रकार है
अनन्तसंसारमहासमुद्रे मग्नान् समभ्युद्धर वासुदेव ॥ अनन्तरूपे विनियोजयस्व ह्यनन्तरूपाय नमो नमस्ते ।
"हे वासुदेव ! संसाररूपी अपार पारावारमें डूबे हुए हम जैसे प्राणियोंका आप उद्धार करें। आपके स्वरूपका कहीं अन्त नहीं है। आप हमें अपने उसी 'अनन्त' स्वरूपमें मिला लें। आप अनन्तरूप परमेश्वरको बारंबार नमस्कार है।" इस प्रकार अनन्तव्रतका अनुष्ठान करनेवाला मनुष्य परमानन्दका भागी होता है ॥ ९-१०॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें अनेक प्रकारके चतुर्दशी व्रतोंका वर्णन' नामक एक सौ बानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १९२ ॥
Summary of chapter 194 of the Agni Mahā Purana is as follows:
Vratas associated with pūrṇimā (full moon) and amāvāsyā (new moon) tithis are described. On Phālguṇa-śukla-pūrṇimā, Varāha and Bhū-devī are worshipped for one year with a prayer for universal prosperity. Kārtika-pūrṇimā calls for a vṛṣotsarga (release of a bull) followed by a nakta-vrata leading to Śaiva-pada. The Āśvayuja-amāvāsyā is the most potent pitṛ-amāvāsyā: śrāddha performed then yields akṣaya phala and upavāsa with pitṛ-tarpaṇa removes accumulated sin. On Māgha-amāvāsyā, Brahmā is worshipped for the fulfilment of all wishes. The chapter describes in detail the Vata-Sāvitrī-vrata performed by women on Jyeṣṭha-amāvāsyā: a three-day fast, worship of Sāvitrī at the root of the vaṭa tree with saptadhānya and kaṇṭha-sūtra, nṛtya and gīta at dawn, the prayer "namaḥ sāvitryai satyavatī," and culminating in the worship of a brāhmaṇa couple as Satyavān-Sāvitrī.