अग्निदेव कहते हैं-
मुनीश्वर ! निम्नाङ्कित मन्त्रका उच्चारण करते हुए साधक यागमण्डपमें प्रवेश करे और सजावटसे यज्ञके स्थानकी शोभा बढ़ावे (तथा निम्नाङ्कित श्लोक पढ़कर भगवान्को नमस्कार करे ) – 'वेदों तथा ब्राह्मणोंके हितका देवता अव्ययात्मा भगवान् श्रीधरको नमस्कार है।' ऋग्वेद, यजुर्वेद तथा सामवेद आपके स्वरूप हैं; शब्दमात्र आपके शरीर हैं; आप भगवान् विष्णुको नमस्कार है। सायंकाल सर्वतोभद्रादि मण्डलकी रचना करके यजन-पूजन सम्बन्धी द्रव्योंका संग्रह करे। हाथ-पैर धो ले। सब सामग्रीको यथास्थान जँचाकर हाथमें अर्घ्य लेकर मनुष्य उसके जलसे अपने मस्तकको सींचे। फिर द्वारदेश आदिमें भी जल छिड़के। तदनन्तर द्वारयाग (द्वारस्थ देवताओंका पूजन) आरम्भ करे। पहले तोरणेश्वरोंकी भलीभाँति पूजा करे । पूर्वादि दिशाओंके क्रमसे अश्वत्थ, उदुम्बर, वट तथा पाकर ये वृक्ष पूजनीय हैं। इनके सिवा पूर्व दिशामें ऋग्वेद, इन्द्र तथा शोभनकी, दक्षिणमें यजुर्वेद, यम तथा सुभद्रकी, पश्चिममें सामवेद, वरुण तथा सुधन्वाकी और उत्तरमें अथर्ववेद, सोम एवं सुहोत्रकी अर्चना करे ॥ १-५॥
तोरण (फाटक) के भीतर पताकाएँ फहरायी जायँ, दो-दो कलश स्थापित हों और कुमुद आदि दिग्गजोंका पूजन हो । प्रत्येक दरवाजेपर दो-दो द्वारपालोंकी उनके नाम मन्त्रसे ही पूजा की जाय। पूर्व दिशामें पूर्ण और पुष्करका, दक्षिण दिशामें आनन्द और नन्दनका, पश्चिममें वीरसेन और सुषेणका तथा उत्तर दिशामें सम्भव और प्रभव नामक द्वारपालोंका पूजन करना चाहिये। अस्त्र-मन्त्र (फट्) के उच्चारणपूर्वक फूल बिखेरकर विघ्नोंका अपसारण करनेके पश्चात् मण्डपके भीतर प्रवेश करे। भूतशुद्धि, न्यास और मुद्रा करके शिखा (वषट् ) के अन्तमें 'फट्' जोड़कर उसका जप करते हुए सम्पूर्ण दिशाओं में सरसों छींटे। इसके बाद वासुदेव मन्त्रसे गोमूत्र, संकर्षण मन्त्रसे गोमय, प्रद्युम्न मन्त्रसे गोदुग्ध, अनिरुद्ध मन्त्रसे दही और नारायण मन्त्रसे घृत लेकर सबको घृतपात्रमें एकत्र करे; अन्य वस्तुओंका भाग घीसे अधिक होना चाहिये।इन सबके मिलनेसे जो वस्तु तैयार होती है, उसे 'पञ्चगव्य' कहा गया है। पञ्चगव्य एक, दो या तीन बार अलग-अलग बनावे। इनमेंसे एक तो मण्डप (तथा वहाँकी वस्तुओं) का प्रोक्षण करनेके लिये है, दूसरा प्राशनके लिये और तीसरा स्नानके उपयोगमें आता है। दस कलशोंकी स्थापना करके उनमें इन्द्रादि लोकपालोंकी पूजा करे पूजन करके उन्हें श्रीहरिकी आज्ञा सुनावे 'लोकपालगण! आपको इस यज्ञकी रक्षा के लिये श्रीहरिकी आज्ञासे यहाँ सदा स्थित रहना चाहिये' ॥६- १२॥
याग-द्रव्य आदिकी रक्षाकी व्यवस्था करके विकिर' (विघ्न-निवारणके लिये सब ओर छींटे जानेवाले सर्षप आदि) द्रव्योंको बिखेरे। सात बार अस्त्र सम्बन्धी मूल मन्त्र (अस्त्राय फट्) का जप करते हुए ही उक्त वस्तुओंको सब ओर बिखेरना चाहिये। फिर उसी तरह अस्त्र मन्त्रका जप करके कुश कूर्च ले आवे। उन्हें ईशान कोणमें रखकर उन्हींके ऊपर कलश और वर्धनीको स्थापित करे। कलशमें श्रीहरिका साङ्ग पूजन करके वर्धनीमें अस्त्रकी अर्चना करे। वर्धनीकी छिन्न धारासे यागमण्डपको प्रदक्षिणाक्रमसे सींचते हुए कलशको उसके उपयुक्त स्थानपर ले जाय और स्थिर आसनपर स्थापित करके उसकी पूजा करे। कलशके भीतर पञ्चरत्न डाले। उसके ऊपर वस्त्र लपेटे। फिर उसपर गन्ध आदि उपचारों द्वारा श्रीहरिका पूजन करे। वर्धनीमें भी सोनेका टुकड़ा डाले। उसके बाद उसपर अस्त्रकी पूजा करके, उसके वाम भागमें पास ही, वास्तु लक्ष्मी तथा 'भूविनायक' की अर्चना करे। संक्रान्ति आदिके समय इसी प्रकार श्रीविष्णुके स्नान अभिषेककी व्यवस्था करे। मण्डपके कोणों और दिशाओं में कुल मिलाकर आठ और मध्यमें एक – इस प्रकार नौ पूर्ण कलशोंको, जिनमें छिद्र न हों, स्थापित करके उनमें पाद्य, अर्घ्य, आचमनीय तथा पञ्चगव्य डाले। पूर्व आदिके कलशोंमें उक्त वस्तुएँ डालनी चाहिये। अग्निकोण आदिके कलशोंमें उक्त वस्तुओंके अतिरिक्त पञ्चामृतयुक्त जल अधिक डालनेका विधान है। पाद्यकी अङ्गभूता चार वस्तुएँ हैं- दही, दूध, मधु और गरम जल ॥ १३ - १९ ॥
किन्हींके मतमें कमल, श्यामाक (तिन्त्रीका चावल), दूर्वादल और विष्णुक्रान्ता औषधि - इन चार वस्तुओंसे युक्त जल 'पाद्य' कहलाता है ( शारदातिलकमें भी यही बात कही गयी है
पाद्यं पादाम्बुजे दद्याद् देवस्य हृदयाणुना। एतच्छ्यामाकदूर्वाब्जविष्णुकान्ताभिरीरितम् ॥ (पटल ४९३)। इसी तरह अर्घ्यके भी आठ अङ्ग कहे गये हैं। जौ, गन्ध, फल, अक्षत, कुश, सरसों, फूल और तिल – इन आठ द्रव्योंका अर्घ्यके लिये संग्रह करना चाहिये (गन्धपुष्पाक्षतयणकुशाग्रतिलसर्पपैः । सदूर्वैः सर्वदेवानामेतदर्घ्यमुदीरितम् ॥ (शा०ति० ४। ९५-९६))। जाती (जायफल), लवङ्ग और कङ्कोलयुक्त जलका आचमन (सुधामन्त्रेण वदने दद्यादाचमनीयकम्। जातीलङ्गकङ्कोसैस्तदुक्तं तन्त्रवेदिभिः ॥ (शा०ति० ४। ९४)) देना चाहिये। इष्टदेवको मूलमन्त्रसे पञ्चामृतद्वारा स्नान करावे। बीचवाले कलशसे भगवान्के मस्तकपर शुद्ध
जलका छींटा दे। कलशसे निकले हुए जल एवं कूर्चाग्रका स्पर्श करे फिर शुद्ध जलसे पाद्य, अर्घ्य और आचमनीय निवेदन करे। तत्पश्चात् वस्त्रसे भगवान्के श्रीविग्रहको पोंछकर वस्त्र धारण करावे और वस्त्रके सहित उन्हें मण्डलमें ले जाय। वहाँ भलीभाँति पूजा करके प्राणायामपूर्वक कुण्ड आदिमें होम करे (हवनकी विधि -) दोनों हाथ धोकर कुण्डमें या वेदीपर तीन पूर्वाग्र रेखाएँ खींचे। ये रेखाएँ दक्षिणकी ओरसे आरम्भ करके क्रमशः उत्तरकी ओर खींची जायँ। फिर इन्हींके ऊपर तीन उत्तराग्र रेखाएँ खींचे। (ये भी दाहिनेसे आरम्भ करके क्रमशः बायें खींची जायँ) ॥ २०-२५ ॥
तत्पश्चात् अर्घ्यके जलसे इन रेखाओंका प्रोक्षण करे और योनिमुद्रा ( मन्त्र महार्णवमें योनिमुद्राका लक्षण इस प्रकार कहा गया है मिथः कनिष्ठिके बद्ध्वा तर्जनीभ्यामनामिके। अनामिकोर्ध्वसंश्लिष्टे दीर्घमध्यमवोरपि ॥ (पू० ख० १ तरं० २)) दिखावे। अग्निका आत्मरूपसे चिन्तन करके मनुष्य योनियुक्त कुण्डमें उसकी स्थापना करे। इसके बाद दर्भ, स्रुक्, स्रुवा आदिके साथ पात्रासादन करे। बाहुमात्रकी परिधियाँ, इध्मव्रश्चन, प्रणीतापात्र, प्रोक्षणीपात्र, आज्यस्थाली, घी, दो-दो सेर चावल तथा अधोमुख स्रुक् और स्रुवाकी जोड़ी प्रणीता एवं प्रोक्षणीमें पूर्वाग्र कुश रखे। प्रणीताको जलसे भरकर भगवान्का ध्यान पूजन करके उसको अग्निके पश्चिम अपने आगे और आसादित द्रव्योंके मध्यमें रखे। प्रोक्षणीको जलसे भरकर पूजनके पश्चात् दाहिने रखे। आगपर चरुको चढ़ाकर पकावे और अग्निसे दक्षिण दिशामें ब्रह्माजीकी स्थापना करे। कुण्ड या वेदीके चारों ओर पूर्वादि दिशामें कुश (बर्हिष्) बिछाकर परिधियों को स्थापित करे। तदनन्तर गर्भाधानादि संस्कारके द्वारा अग्निका वैष्णवीकरण करे। गर्भाधान, पुंसवन, सीमन्तोन्नयन, जातकर्म एवं नामकरणादि-समावर्तनान्त संस्कार करके प्रत्येक कर्मके लिये आठ-आठ आहुतियाँ दे तथा स्रुवायुक्त स्रुक्के द्वारा पूर्णाहुति प्रदान करे ॥ २६-३३ ॥
कुण्डके भीतर ऋतुस्राता लक्ष्मीका ध्यान करके हवन करे। कुण्डके भीतर जो लक्ष्मी हैं, उन्हें 'कुण्डलक्ष्मी' कहा गया है। वे ही त्रिगुणात्मिका प्रकृति हैं। 'वे सम्पूर्ण भूतोंकी तथा विद्या एवं मन्त्र समुदायकी योनि हैं। परमात्मस्वरूप अग्निदेव मोक्षके कारण एवं मुक्तिदाता हैं। पूर्व दिशाकी ओर कुण्डलक्ष्मीका सिर है, ईशान और अग्निकोणकी ओर उसकी भुजाएँ हैं, वायव्य तथा नैर्ऋत्यकोणमें जंघाएँ हैं, उदरको 'कुण्ड' कहा है तथा योनिके स्थानमें कुण्ड-योनिका विधान है। सत्त्व, रज और तम- ये तीन गुण ही तीन मेखलाएँ हैं।' इस प्रकार ध्यान करके प्रणवमन्त्रसे मुष्टिमुद्राद्वारा पंद्रह समिधाओंका होम करे। फिर वायुसे लेकर अग्निकोणतक 'आधार' नामक दो आहुतियाँ दे। इसी तरह आग्नेयसे ईशानान्ततक 'आज्य भाग' नामक आहुतियोंका हवन करे। आज्यस्थालीमेंसे उत्तर, दक्षिण और मध्यभागसे घृत लेकर द्वादशान्तसे, अर्थात् मूलको बारह बार जप कर अग्निमें भी उन्हीं दिशाओं में उसकी आहुति दे और वहीं उसका त्याग करे( प्रादेशमात्र ग्रन्थियुक्त दो कुशा लेकर, घीके बीचमें डालकर उसके भाग करके, उसे शुबल और कृष्ण दो पक्षोंके रूप में स्मरण करे। तदनन्तर वामभागमें इडानाडी, दक्षिणभागमें पिङ्गलानाडो और मध्यभागमें सुषुम्ना नाडीका ध्यान करके हवन करे। 'ॐ नमः।- इस मन्त्रद्वारा सुबसे दक्षिण भागकी ओरसे भी लेकर दाहिने नेत्रमें ॐ अग्नये स्वाहा इदमग्नये।' कहकर एक आहुति दें। फिर उत्तर भागसे भी लेकर 'ॐ सोमाय स्वाहा इदं सोमाय' बोलकर एक आहुति अग्निके वामनेत्रमें दे। इसके बाद बोचसे घी लेकर 'अग्रीषोमाभ्यां नमः।' इस मन्त्रसे एक आहुति अग्निके भालस्थ नेत्रमें दे फिर सुवद्वारा दक्षिण भागसे घी लेकर अग्निके मुखमें अग्रये स्विष्टकृते स्वाहा' बोलकर एक आहुति दे। इसके बाद व्याहृति होम करना चाहिये (मन्त्रमहार्णवसे) जिस भागसे आज्याहुति ली जाय, अग्निके उसी भागमें उसका सम्मात या त्याग करे। जैसा कि कहा है 'स्वाहान्तहोमं विधाय 'स्वाहा' इत्यस्यान्ते यस्माद् भागादाज्याहुतिगृहोता तस्मिन्नेव भागे तस्य सम्पातं कुर्यात् ।। (शा० ति० ५ पटल, श्लोक ५८ की टीका)) । इसके बाद 'भूः स्वाहा' इत्यादि रूपसे व्याहृति- होम करे। कमलके मध्यभागमें संस्कारसम्पन्न अग्निदेवका 'विष्णु' रूपमें ध्यान करे। 'वे सात जिह्वाओंसे युक्त हैं, करोड़ों सूर्योके समान उनकी प्रभा है, चन्द्रोपम मुख है और सूर्य-सदृश देदीप्यमान नेत्र हैं। इस तरह ध्यान करके उनके लिये एक सौ आठ आहुतियाँ दे। अथवा मूल मन्त्रसे उसकी आधी एवं आठ आहुतियाँ दे। अङ्गोंके लिये भी दस-दस आहुतियाँ दे ॥ ३४-४१॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'पवित्रारोपण सम्बन्धी पूजा होम-विधिका वर्णन' विषयक चौतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३४ ॥
Summary of chapter 35 of the Agni Mahā Purana is as follows:
This chapter addresses the dharma of the king (rājadharma) in comprehensive terms. Bhagavān's teaching reveals that the king is composed of particles of eight divine guardians of the directions and thus partakes of their divine nature, obligating him to govern with their combined virtues. The chapter describes the king's daily routine (dinacarya), his duties of protection toward all subjects regardless of varṇa, the conduct of justice, the proper collection of taxes (analogous to the sun drawing up water only to return it as rain), and his obligations toward his army. The seven limbs of the kingdom (saptāṅga — king, minister, treasury, fort, army, ally, territory) are enumerated. The chapter concludes with the warning that a king who abandons dharma, who is cruel or avaricious, destroys not only his kingdom but his accumulated merit across lifetimes.