अग्निदेव कहते हैं-
जम्बूद्वीपका विस्तार एक लाख योजन है। वह सब ओरसे एक लाख योजन विस्तृत खारे पानीके समुद्रसे घिरा है। उस क्षारसमुद्रको घेरकर प्लक्षद्वीप स्थित है। मेधातिथिके सात पुत्र प्लक्षद्वीपके स्वामी हैं। शान्तभय, शिशिर, सुखोदय, आनन्द, शिव, क्षेम तथा ध्रुव - ये सात ही मेधातिथिके पुत्र हैं; उन्हींके नामसे उक्त सात वर्ष हैं। गोमेध, चन्द्र, नारद, दुन्दुभि, सोमक, सुमना और शैल- ये उन वर्षोंके सुन्दर मर्यादापर्वत हैं। वहाँके सुन्दर निवासी 'वैभ्राज' नामसे विख्यात हैं। इस द्वीपमें सात प्रधान नदियाँ हैं। प्लक्षसे लेकर शाकद्वीपतकके लोगोंकी आयु पाँच हजार वर्ष है। वहाँ वर्णाश्रम धर्मका पालन किया जाता है ॥ १-५॥
आर्य, कुरु, विविंश तथा भावी - यही वहाँके - ब्राह्मण आदि वर्णोंकी संज्ञाएँ हैं। चन्द्रमा उनके आराध्यदेव हैं। प्लक्षद्वीपका विस्तार दो लाख योजन है। वह उतने ही बड़े इक्षुरसके समुद्रसे घिरा है। उसके बाद शाल्मलद्वीप है, जो प्लक्षद्वीपसे दुगुना बड़ा है। वपुष्मान्के सात पुत्र शाल्मलद्वीपके स्वामी हुए। उनके नाम हैं— श्वेत, हरित, जीमूत, लोहित, वैद्युत, मानस और सुप्रभ। इन्हीं नामोंसे वहाँके सात वर्ष हैं। वह प्लक्षद्वीपसे दुगुना है तथा उससे दुगुने परिमाणवाले 'सुरोद' नामक (मदिराके) समुद्रसे घिरा हुआ है। कुमुद, अनल, बलाहक, द्रोण, कङ्क, महिष और ककुद्मान्– ये मर्यादापर्वत हैं। सात ही वहाँ प्रधान नदियाँ हैं। कपिल, अरुण, पीत और कृष्ण- ये वहाँके ब्राह्मण आदि वर्ण हैं। वहाँके लोग वायु देवताकी पूजा करते हैं। वह मदिराके समुद्रसे घिरा है ॥ ६ - १०३ ॥
इसके बाद कुशद्वीप है। ज्योतिष्मान्के पुत्र उस द्वीपके अधीश्वर हैं। उद्भिद धेनुमान्, द्वैरथ, लम्बन, धैर्य, कपिल और प्रभाकर ये सात उनके नाम हैं। इन्हींके नामपर वहाँ सात वर्ष हैं। दमी(दमी, शुषुमी, स्नेह और मन्दे- ये क्रमशः वहाँके ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रोंको संज्ञाएँ हैं।) आदि वहाँके ब्राह्मण हैं, जो ब्रह्मरूपधारी भगवान् विष्णुका पूजन करते हैं। विद्रुम, हेमशैल, द्युतिमान्, पुष्पवान्, कुशेशय, हरि और मन्दराचल - ये सात वहाँ के वर्षपर्वत हैं। यह कुशद्वीप अपने ही बराबर विस्तारवाले घीके समुद्रसे घिरा हुआ है और वह घृतसमुद्र क्रौञ्चद्वीपसे परिवेष्टित है। राजा द्युतिमान्के पुत्र क्रौञ्चद्वीपके स्वामी हैं। उन्हींके नामपर वहाँके वर्ष प्रसिद्ध हैं ॥ ११-१४॥
कुशल, मनोनुग, उष्ण, प्रधान, अन्धकारक, मुनि और दुन्दुभि – ये सात द्युतिमान्के पुत्र हैं । - उस द्वीपके मर्यादापर्वत और नदियाँ भी सात ही हैं। पर्वतोंके नाम इस प्रकार हैं- क्रौञ्च, वामन, अन्धकारक, रत्नशैल,( यहाँ मूलमें छः नाम ही आये हैं, तथापि पुराणान्तरमें आये हुए 'चतुर्थी रत्नशैलच' के अनुसार अर्थमें रत्नशैल बढ़ा दिया गया है।) देवावृत, पुण्डरीक और दुन्दुभि । ये द्वीप परस्पर उत्तरोत्तर दुगुने विस्तारवाले हैं। उन द्वीपोंमें जो वर्ष पर्वत हैं, वे भी द्वीपोंके समान ही पूर्ववर्ती द्वीपके पर्वतोंसे दुगुने विस्तारवा हैं। वहाँके ब्राह्मण आदि वर्ण क्रमशः पुष्कर, पुष्कल, धन्य और तिथ्य इन नामोंसे प्रसिद्ध - हैं। वे वहाँ श्रीहरिकी आराधना करते हैं। क्रौञ्चद्वीप दधिमण्डोदक (मट्ठे) के समुद्रसे घिरा हुआ है और वह समुद्र शाकद्वीपसे परिवेष्टित है। वहाँके राजा भव्यके जो सात पुत्र हैं, वे ही शाकद्वीपके शासक हैं। उनके नाम इस प्रकार हैं- जलद, कुमार, सुकुमार, मणीवक, कुशोत्तर, मोदाकी और द्रुम इन्हींके नामसे वहाँके वर्ष प्रसिद्ध हैं ॥ १५- १९॥
उदयगिरि, जलधर, रैवत, श्याम, कोद्रक, आम्बिकेय और सुरम्य पर्वत केसरी- ये सात वहाँक मर्यादापर्वत हैं तथा सात ही वहाँकी प्रसिद्ध नदियाँ हैं (पुराणान्तरमें इन नदियाँके नाम इस प्रकार मिलते हैं- सुकुमारी, कुमारी, नलिनी, धेनुका, इक्षु, बेणुका और गभस्ति।)। मग, मगध, मानस्य और मन्दग- ये वहाँके ब्राह्मण आदि वर्ण हैं, जो सूर्यरूपधारी भगवान् नारायणकी आराधना कर हैं। शाकद्वीप क्षीरसागरसे घिरा हुआ है। क्षीरसागर पुष्करद्वीपसे परिवेष्टित है। वहाँके अधिकारी राजा सवनके दो पुत्र हुए, जिनके नाम थे महावीत और धातकि। उन्हींके नामसे वहाँके दो वर्ष प्रसिद्ध हैं ॥ २० - २२ ॥
वहाँ एक ही मानसोत्तर नामक वर्षपर्वत विद्यमान है, जो उस वर्षके मध्यभागमें वलयाकार स्थित है। उसका विस्तार कई सहस्त्र योजन है( विष्णुपुराणमें इसकी ऊँचाई और विस्तार दोनों ही पचास हजार योजन बताये गये हैं। देखिये विष्णुपुराण २।४ । ७६ ।)।ऊँचाई भी विस्तारके समान ही है। वहाँके लोग दस हजार वर्षोंतक जीवन धारण करते हैं। वहाँ देवता लोग ब्रह्माजीकी पूजा करते हैं। पुष्करद्वीप स्वादिष्ट जलवाले समुद्रसे घिरा हुआ है। उस समुद्रका विस्तार उस द्वीपके समान ही है। महामुने! समुद्रोंमें जो जल है, वह कभी घटता-बढ़ता नहीं है। शुक्ल और कृष्ण-दोनों पक्षों में चन्द्रमाके उदय और अस्तकालमें केवल पाँच सौ दस अङ्गुलतक समुद्रके जलका घटना और बढ़ना देखा जाता है (परंतु इससे जलमें न्यूनता या अधिकता नहीं होती है) ॥ २३ - २६ ॥
मीठे जलवाले समुद्रके चारों ओर उससे दुगुने परिमाणवाली भूमि सुवर्णमयी है, किंतु वहाँ कोई भी जीव-जन्तु नहीं रहते हैं। उसके बाद लोकालोकपर्वत है, जिसका विस्तार दस हजार योजन है। लोकालोकपर्वत एक ओरसे अन्धकारद्वारा आवृत है और वह अन्धकार अण्डकटाहसे आवृत है। अण्डकटाहसहित सारी भूमिका विस्तार पचास करोड़ योजन है ॥२७-२८ ॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'महाद्वीप आदिका वर्णन' नामक एक सौ उन्नीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ११९ ॥
Summary of chapter 120 of the Agni Mahā Purana is as follows:
The chapter systematizes the rules of ritual impurity (āśauca) arising from birth and death within the family. Agni defines the periods of āśauca according to the degree of sapiṇḍa relationship: ten days for the nearest kin, reducing to one day for distant relatives. Special provisions govern the āśauca of brāhmaṇas engaged in Vedic recitation, rulers in the midst of governance, and those undergoing initiation. The text clarifies how partial āśauca (tripad-āśauca, ardha-āśauca) applies to intermediate relationships and which ritual acts are permitted or forbidden during the impurity period.