अग्निदेव कहते हैं -
वसिष्ठ ! अब मैं नक्षत्र-सम्बन्धी व्रतोंका वर्णन करता हूँ। नक्षत्र विशेष में पूजन करनेपर श्रीहरि अभीष्ट मनोरथकी पूर्ति करते हैं। सर्वप्रथम नक्षत्र पुरुष श्रीहरिका चैत्र मासमें पूजन करे। मूल नक्षत्र में श्रीहरिके चरण कमलोंकी और रोहिणी नक्षत्र में उनकी जङ्घाओंकी अर्चना करे। अश्विनी नक्षत्रके प्राप्त होनेपर जानुयुग्मका, पूर्वाषाढ़ा और उत्तराषाढ़ामें इनकी दोनों ऊरुओंका, पूर्वाफाल्गुनी और उत्तराफाल्गुनी में उपस्थका, कृत्तिका नक्षत्र में कटिप्रदेशका पूर्वाभाद्रपदा और उत्तराभाद्रपदामें पार्श्वभागका, रेवती नक्षत्र में कुक्षिदेशका, अनुराधामें स्तनयुगलका, धनिष्ठामें पृष्ठभागका, विशाखामें दोनों भुजाओंका एवं पुनर्वसु नक्षत्र में अँगुलियोंका पूजन करे। आश्लेषामें नखोंका पूजन करके ज्येष्ठामें कण्ठका यजन करे । श्रवण नक्षत्र में सर्वव्यापी श्रीहरिके कर्णद्वयका और पुष्य नक्षत्रमें वदन मण्डलका पूजन करे । स्वाती नक्षत्र में उनके दाँतोंके अग्रभागकी, शतभिषा नक्षत्रमें मुखकी अर्चना करे। मघा नक्षत्रमें नासिकाकी, मृगशिरा नक्षत्रमें नेत्रोंकी, चित्रा नक्षत्र में ललाटकी एवं आर्द्रा नक्षत्र में केशसमूहकी पूजा करे। वर्षके समाप्त होनेपर गुड़से परिपूर्ण कलशपर श्रीहरिकी स्वर्णमयी मूर्तिकी पूजा करके ब्राह्मणको दक्षिणासहित शय्या, गौ और धनादिका दान दे ॥ १-७॥
सबके पूजनीय नक्षत्रपुरुष श्रीविष्णु शिवसे अभिन्न हैं, इसलिये शाम्भवायनीय (शिव सम्बन्धी) व्रत करनेवालेको कृत्तिका नक्षत्र सम्बन्धी कार्तिक मासमें और मृगशिरा नक्षत्र सम्बन्धी मार्गशीर्ष - मासमें केशव आदि नामों एवं 'अच्युताय नमः ।' आदि मन्त्रों द्वारा श्रीहरिका पूजन करना चाहिये|
संकल्प-मन्त्र
कार्तिके कृत्तिकाभेऽह्नि मासनक्षत्रगं हरिम् ।
शाम्भवायनीयव्रतकं करिष्ये भुक्तिमुक्तिदम् ॥
'मैं कार्तिक मासकी कृत्तिकानक्षत्रसे युक्त पूर्णिमा तिथिको मास एवं नक्षत्र में स्थित श्रीहरिका पूजन करूँगा तथा भोग एवं मोक्ष प्रदान करनेवाले शाम्भवायनीय व्रतका अनुष्ठान करूँगा।'
आवाहन-मन्त्र
केशवादिमहामूर्तिमच्युतं सर्वदायकम् ।
आवाहयाम्यहं देवमायुरारोग्यवृद्धिदम् ॥
'जो केशव आदि महामूर्तियोंके रूपमें स्थित हैं और आयु एवं आरोग्यकी वृद्धि करनेवाले हैं, मैं उन सर्वप्रद भगवान् अच्युतका आवाहन करता हूँ।' व्रतकर्ता कार्तिकसे माघतक चार मासों में सदा अन्न-दान करे। फाल्गुनसे ज्येष्ठतक खिचड़ीका और आषाढ़से आश्विनतक खीरका दान करे। भगवान् श्रीहरि एवं ब्राह्मणोंको रात्रिके समय नैवेद्य समर्पित करे। पञ्चगव्यके जलसे स्नान एवं उसका आचमन करनेसे मनुष्य पवित्र हो जाता है। मूर्तिके विसर्जनके पूर्व भगवान्को समर्पित किये हुए समस्त पदार्थोंको 'नैवेद्य' कहा जाता है, परंतु जगदीश्वर श्रीहरिके विसर्जनके अनन्तर वह तत्काल ही 'निर्माल्य' हो जाता है। (तदनन्तर भगवान्से निम्नलिखित प्रार्थना करे-) अच्युत ! आपको नमस्कार है, नमस्कार है। मेरे पापोंका विनाश हो और पुण्योंकी वृद्धि हो। मेरे ऐश्वर्य और धनादि सदा अक्षय हों एवं मेरी संतान परम्परा कभी उच्छिन्न न हो। परात्परस्वरूप ! अप्रमेय परमेश्वर! जिस प्रकार आप परसे भी परे एवं ब्रह्मभावमें स्थित होकर अपनी मर्यादा से कभी च्युत नहीं होते हैं, उसी प्रकार आप मेरे मनोवाञ्छित कार्यको सिद्ध कीजिये। पापापहारी भगवन्! मेरे द्वारा किये गये पापोंका अपहरण कीजिये। अच्युत! अनन्त ! गोविन्द ! अप्रमेयस्वरूप पुरुषोत्तम ! मुझपर प्रसन्न होइये और मेरे मनोभिलषित पदार्थको अक्षय कीजिये।' इस प्रकार सात वर्षोंतक श्रीहरिका पूजन करके मनुष्य भोग और मोक्षको सिद्ध कर लेता है ॥ ८-१७३ ॥
अब मैं नक्षत्र सम्बन्धी व्रतोंके प्रकरणमें अभीष्ट वस्तुकी प्राप्ति करानेवाले 'अनन्तव्रत का वर्णन करूँगा मार्गशीर्ष मासमें जब मृगशिरा नक्षत्र प्राप्त हो, तब गोमूत्रका प्राशन करके श्रीहरिका यजन करे। वे भगवान् अनन्त समस्त कामनाओंका अनन्त फल प्रदान करते हैं। इतना ही नहीं, वे पुनर्जन्ममें भी व्रतकर्ताको अनन्त पुण्यफलसे संयुक्त करते हैं। यह महाव्रत अनन्त पुण्यका संचय करनेवाला है। यह अभिलषित वस्तुकी प्राप्ति कराके उसे अक्षय बनाता है। भगवान् अनन्तके चरणकमल आदिका पूजन करके रात्रिके समय तैलरहित भोजन करे। भगवान् अनन्तके उद्देश्यसे मार्गशीर्ष से फाल्गुनतक घृतका, चैत्रसे आषाढ़तक अगहनी चावलका और श्रावणसे कार्तिकतक दुग्धका हवन करे। इस 'अनन्त' व्रतके प्रभाव से ही युवनाश्वको मान्धाता पुत्ररूपमें प्राप्त हुए थे ॥ १८- २३ ॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'नक्षत्र-व्रतोंका वर्णन' नामक एक सौ छियानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १९६ ॥
Summary of chapter 198 of the Agni Mahā Purana is as follows:
Monthly vratas extending over one or more months are described. The Āṣāḍhādi-cāturmāsya (four-month discipline from Āṣāḍha) prescribes abstention from oil-bath (abhyaṅga). Vaiśākha-month purity with abstention from flowers and salt combined with go-dāna yields rājya-phala. The Bhīma-vrata of one complete month's upavāsa followed by go-dāna leads to Viṣṇu-sāyujya. Prātaḥ-snāna daily during the four months from Āṣāḍha rewards the performer with Viṣṇu-loka. The Guḍa-vrata performed on tṛtīyā in Māgha or Caitra with a guḍa-dhenu (jaggery-cow) gift transforms the giver into a Śiva-svarūpa. The Cāturmāsya-vrata procedure is given: beginning on Āṣāḍha-śukla-ekādaśī with a prayer invoking Janārdana's grace to complete the vrata even in the event of the performer's death.