अग्निदेव कहते हैं-
अब मैं अशोकपूर्णिमा के विषयमें कहता हूँ । फाल्गुनके शुक्लपक्षकी पूर्णिमाको भगवान् वराह और भूदेवीका पूजन करे। एक वर्ष ऐसा करनेसे मनुष्य भोग और मोक्ष― दोनोंको प्राप्त कर लेता है। कार्तिककी पूर्णिमाको वृषोत्सर्ग करके रात्रिव्रतका अनुष्ठान करे। इससे मनुष्य शिवलोकको प्राप्त होता है। यह उत्तम व्रत 'वृषोत्सर्गव्रत' के नामसे प्रसिद्ध है। आश्विन पितृपक्षकी अमावास्याको पितरोंके उद्देश्यसे जो कुछ दिया जाता है, वह अक्षय होता है। मनुष्य किसी वर्ष इस अमावास्याको उपवासपूर्वक पितरोंका पूजन करके पापरहित होकर स्वर्गको प्राप्त कर लेता है। माघ मासकी अमावास्याको (सावित्रीसहित) ब्रह्माका पूजन करके मनुष्य सम्पूर्ण अभीष्ट कामनाओंको प्राप्त कर लेता है। अब मैं 'वटसावित्री' सम्बन्धी अमावास्याके विषयमें कहता हूँ, जो पुण्यमयी एवं भोग और मोक्षकी प्राप्ति करानेवाली है। व्रत करनेवाली नारी (त्रयोदशीसे अमावास्यातक) त्रिरात्रव्रत' करे और ज्येष्ठकी अमावास्याको वटवृक्षके मूलभागमें महासती सावित्रीका सप्तधान्यसे पूजन करे। जब रात्रि कुछ शेष हो, उसी समय वटके कण्ठ सूत्र लपेटकर कुङ्कुमादिसे उसका पूजन करे ।
प्रभातकालमें वटके समीप नृत्य करे और गीत गाये। 'नमः सावित्र्यै सत्यवते।' (सत्यवान् सावित्रीको नमस्कार है) ऐसा कहकर सत्यवान् सावित्रीको नमस्कार करे और उनको समर्पित किया हुआ नैवेद्य ब्राह्मणको दे। फिर अपने घर आकर ब्राह्मणों को भोजन कराके स्वयं भी भोजन करे। 'सावित्रीदेवी प्रीयताम्।' (सावित्रीदेवी प्रसन्न हों ) - ऐसा कहकर व्रतका विसर्जन करे। इससे नारी सौभाग्य आदिको प्राप्त करती है ॥ १-८॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'तिथि व्रतका वर्णन' नामक एक सौ चौरानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १९४ ॥
Summary of chapter 196 of the Agni Mahā Purana is as follows:
Vratas organized around the twenty-seven nakṣatras and their correspondence to Viṣṇu's cosmic body are described. Agni maps the nakṣatras to Viṣṇu-as-nakṣatra-puruṣa: Mūla corresponds to the pāda, Rohiṇī to the jānu, Pūrvāṣāḍhā and Uttarāṣāḍhā to the ūru, and so forth through all twenty-seven, constituting a sequential body-worship of the cosmic Viṣṇu. The Śāmbhavāyanīya-vrata performed on Kārtika-kṛttikā and Mārgaśīrṣa-mṛgaśiras uses the twelve Keśavādi names of Viṣṇu in rotation; seven years of this practice bestows both bhukti and mukti. Within this nakṣatra framework, a variant Ananta-vrata on Mārgaśīrṣa-mṛgaśiras employs gomūtra-prāśana and seasonal homa materials adapted to the cold season.