भगवान् स्कन्द कहते हैं-
नपुंसकलिङ्गमें 'किम्' शब्दके ये रूप होते हैं- (प्रथमा) किम्, के, कानि (द्वितीया) किम्, के, कानि। शेष रूप पुल्लिङ्गवत् हैं। जलम् (प्र० ए०), सर्वम् (प्र० ए०) । पूर्व, पर, अवर, दक्षिण, उत्तर, अपर, अधर, स्व और अन्तर- इन सब शब्दोंके रूप इसी प्रकार होते हैं। सोमपम् (प्र० द्वि० ए०), सोमपानि (प्र० द्वि० ब० ) - ये 'सोमप' शब्दके रूप हैं। 'ग्रामणी' शब्दके नपुंसकलिङ्गमें इस प्रकार रूप होते हैं ग्रामणि (प्र० द्वि० ए०), ग्रामणिनी (प्र० द्वि० द्वि०), ग्रामणीनि (प्र०, द्वि० ब० ) । इसी प्रकार 'वारि' शब्दके रूप होते हैं-- वारि (प्र० द्वि० ए०), वारिणी (प्र०, द्वि० द्वि०), वारीणि (प्र० द्वि० ब०), वारीणाम् (ष०-ब०), वारिणि ( स० ए०) । शुचये शुचिने (च० ए०) और मृदुने मृदवे (च० ए०) ये क्रमसे 'शुचि' और 'मृदु' शब्दके रूप हैं। त्रपु (प्र०, द्वि० ए०), त्रपुणी (प्र०, द्वि० द्वि०), त्रपूणाम् (ष० ब०) - ये 'त्रपु' शब्दके कतिपय रूप हैं। 'खलपुनि' तथा 'खलप्वि'— ये दोनों नपुंसक 'खलपू' शब्दके सप्तमी, एकवचनके रूप हैं। कर्त्री-कर्तॄणा (तृ० ए०), कर्तुणे-क (च० ए०) - ये 'कर्तृ' शब्दके रूप हैं। अतिरि (प्र० द्वि० ए०), अतिरिणी (प्र०, द्वि० द्वि० ) - ये 'अतिरि' शब्दके रूप हैं। अभिनि (प्र०, द्वि० ए०), अभिनिनी (प्र०, द्वि० द्वि०) - ये 'अभिनि' शब्दके रूप हैं। सुवचांसि (प्र०, द्वि० ब०), यह 'सुवचस्' शब्दका रूप है। सुवाक्षु ( स० ब०) यह 'सुवाच्' शब्दका रूप है। 'यत्' शब्दके ये दो यत् यद् (प्र० द्वि० ए०) हैं। 'तत्' शब्दके 'तत् तद् (प्र०, द्वि० ए०), 'कर्म' शब्दके कर्माणि (प्र० द्वि० ब०), 'इदम्' शब्दके इदम् (प्र०, द्वि० ए०), इमे (प्र० द्वि० द्वि०), इमानि (प्र०) द्वि० ब० ) – ये रूप हैं। ईदृक्-ईदृग् (प्र०, द्वि० ए० ) – यह 'ईदृश्' शब्दका रूप है। अदः (प्र०, द्वि० ए०), अमुनी (प्र०, द्वि० द्वि०), अमूनि (प्र०, द्वि० ब०) । अमुना (तृ ए०), अमीषु ( स० – ब० ) – 'अदस्' शब्दके ये रूप भी पूर्ववत् सिद्ध होते हैं। 'युष्मद्' और 'अस्मद् ' शब्दके रूप इस प्रकार होते हैं अहम् (प्र० ए०), आवाम् (प्र० द्वि०), वयम् (प्र०) ब०) । माम् (द्वि० ए०), आवाम् (द्वि० द्वि०), अस्मान् (द्वि० ब०) । मया (तृ० ए०), आवाभ्याम् (तृ०, च० द्वि०), अस्माभिः (तृ० ब०) । मह्यम् (च० ए०), अस्मभ्यम् (च० ब०) । मत् (प० ए०), आवाभ्याम् (प० द्वि०), अस्मत् (प० ब०) । मम (ष० ए०), आवयोः (ष०,स० द्वि०), अस्माकम् (ष० ब०) । अस्मासु ( स० ब०) - ये 'अस्मद्' शब्दके रूप हैं। त्वम् (प्र० ए०), युवाम् (प्र० द्वि०) यूयम् (प्र० ब०) । त्वाम् (द्वि० ए०), युवाम् (द्वि० द्वि०), युष्मान् (द्वि० ब०) । त्वया (तृ० ए०), युष्माभिः (तृ० ब०) । तुभ्यम् (च० ए०), युवाभ्याम् (तृ०, च० द्वि०), युष्मभ्यम् (च० ब०) । त्वत् (प० ए०) युवाभ्याम् (प० द्वि०) युष्मत् (प० | ब०) । तव (ष० ए०), युवयोः (ष० स० द्वि०), युष्माकम् (ष० ब०) । त्वयि ( स० ए०), युष्मासु ( स० ब०) - ये 'युष्मद्' शब्दके रूप हैं। यहाँ 'अजन्त' और 'हलन्त' शब्दोंका दिग्दर्शन मात्र कराया गया है ॥ १- ९ ॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'नपुंसकलिङ्ग शब्दोंके सिद्ध रूपोंका वर्णन' नामक तीन सौ तिरपनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३५३ ।।
Summary of chapter 355 of the Agni Mahā Purana is as follows:
The six types of Sanskrit compound word (samāsa) are expounded: tatpuruṣa (determinative), karmadhāraya (appositive), bahuvrīhi (possessive), dvandva (coordinative), dvīgu (numeral), and avyayībhāva (adverbial). Each type is illustrated with Purāṇic compound words — names of deities, places, and concepts — analyzed to reveal their internal structure. Twenty-eight subtypes of tatpuruṣa are enumerated, including the negative (nañ), the upamā (simile-based), and various kāraka-based forms. The distinction between nitya-samāsa (compounds that must be used in compound form) and anitya-samāsa (those that may be optionally split) is drawn, as well as luk-samāsa (compounds with elided case endings) versus aluk-samāsa (those with retained endings).