अग्नि महा पुराण

171- गुप्त पापोंके प्रायश्चित्तका वर्णन

पुष्कर कहते हैं-

अब मैं गुप्त पापोंके प्रायश्चित्तोंका वर्णन करता हूँ, जो परम शुद्धिप्रद हैं। एक मासतक पुरुषसूक्तका जप पापोंका नाश करनेवाला है। अघमर्षण मन्त्रका तीन बार जप करनेसे मनुष्य सभी प्रकारके पापोंसे मुक्त हो जाता है। वेदमन्त्र, वायुसूक्त और यमसूक्तके जप एवं गायत्रीका जप करनेसे मनुष्य अपने सब पापोंको नष्ट कर डालता है। समस्त कृच्छ्रों में मुण्डन, स्नान, हवन और श्रीहरिका पूजन विहित है। 'कृच्छ्रव्रत' करनेवाला दिनमें खड़ा रहे और रातमें बैठा रहे, इसे 'वीरासन' कहा गया है। इससे मनुष्य निष्पाप हो जाता है। एक महीनेतक प्रतिदिन आठ ग्रास भोजन करे, इसे 'यतिचान्द्रायण' कहते हैं। एक मासतक नित्य प्रातः काल चार ग्रास और सायंकाल चार ग्रास भोजन करनेसे 'शिशुचान्द्रायण' होता है। एक मासमें किसी भी प्रकार दो सौ चालीस पिण्ड भोजन करे, यह 'सुरचान्द्रायण' की विधि है। तीन दिन गरम जल, तीन दिन गरम दूध, तीन दिन गरम घी और तीन दिन वायु पीकर रहे, इसे 'तप्तकृच्छ्र' कहा गया है और इसी क्रम तीन दिन ठंढा जल, तीन दिन ठंढा दूध, तीन दिन ठंढा घी और तीन दिन वायु पीनेपर 'शीतकृच्छ्र' होता है। इक्कीस दिनतक केवल दूध पीकर रहनेसे 'कृच्छ्रातिकृच्छ्र' होता है। एक दिन गोमूत्र, गोबर, दूध, दही, घी और कुश जलका भक्षण करके रहे तथा एक दिन उपवास करे, इसे 'कृच्छ्रसांतपन व्रत' माना गया है। - 'सांतपनकृच्छ्र की वस्तुओंको एक-एक दिनके क्रमसे लेनेपर 'महासांतपन' व्रत माना जाता है। इन्हीं वस्तुओंको तीन-तीन दिनके क्रमसे ग्रहण करनेपर 'अतिसांतपन' माना जाता है। बारह दिन निराहार रहनेसे 'पराककृच्छ्र' होता है। तीन दिन प्रातःकाल, तीन दिन सायंकाल और तीन दिन बिना माँगे मिली हुई वस्तुका भोजन करे और अन्तमें तीन दिन उपवास रखे, इसे 'प्राजापत्यव्रत' कहा गया है। इसीके एक चरणका अनुष्ठान 'कृच्छ्रपाद' कहलाता है। एक मासतक फल खाकर रहनेसे 'फलकृच्छ्र' और बेल खाकर रहनेसे 'श्रीकृच्छ्र' होता है। इसी प्रकार पद्माक्ष (कमलगट्टा) खाकर रहनेसे 'पद्माक्षकृच्छ्र', आँवले खाकर रहनेसे 'आमलककृच्छ्र' और पुष्प खाकर रहनेसे पुष्पकृच्छ्र होता है। पूर्वोक्त क्रमसे केवल पत्ते खाकर रहनेसे 'पत्रकृच्छु', जल पीकर रहनेसे 'जलकृच्छ्र', केवल मूलका भोजन करनेसे 'मूलकृच्छ्र' और दधि, दुग्ध अथवा तक्रपर निर्भर रहनेसे क्रमश: 'दधिकृच्छ्र', 'दुग्धकृच्छ्र' और 'तक्रकृच्छ्र' होते हैं। एक मासतक अञ्जलिभर अन्नके भोजनसे 'वायव्यकृच्छ्र' होता है। बारह दिन केवल तिलका भोजन करके रहनेसे 'आग्नेयकृच्छ्र' माना जाता है, जो दुःखोंका विनाश करनेवाला है। एक पक्षतक एक पसर लाज (खील) का भोजन करे। - चतुर्दशी एवं पञ्चदशी (अमावास्या एवं पूर्णिमा)― को उपवास रखे। फिर पञ्चगव्यपान करके हविष्यानका भोजन करे। यह 'ब्रह्मकूर्च-व्रत' होता है। इस व्रतको एक मासमें दो बार करनेसे मनुष्य समस्त पापोंसे मुक्त हो जाता है।

जो मनुष्य धन, पुष्टि, स्वर्ग एवं पापनाशक कामनासे देवताओंका आराधन और कृच्छ्रव्रत करता है, वह सब कुछ प्राप्त कर लेता है ॥ १-१७ ॥

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'गुप्त पापोंके प्रायश्चित्तका वर्णन' नामक एक सौ इकहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १७१ ॥