अग्निदेव कहते हैं-
अब मैं आपसे प्रतिपद् आदि तिथियोंके व्रतोंका वर्णन करूँगा, जो सम्पूर्ण मनोरथोंको देनेवाले हैं। कार्तिक, आश्विन और चैत्र मासमें कृष्णपक्षकी प्रतिपद् ब्रह्माजीकी तिथि है। पूर्णिमाको उपवास करके प्रतिपद्को ब्रह्माजीका पूजन करे। पूजा ॐ तत्सद्ब्रह्मणे नमः। – इस मन्त्रसे अथवा गायत्री मन्त्रसे करनी चाहिये। यह व्रत एक वर्षतक करे। ब्रह्माजीके सुवर्णमय विग्रहका पूजन करे, जिसके दाहिने हाथों में स्फटिकाक्षी माला और स्रुवा हों तथा बायें हाथोंमें स्रुक् एवं कमण्डलु हों। साथ ही लंबी दाढ़ी और सिरपर जटा भी हो। यथाशक्ति दूध चढ़ावे और मनमें यह उद्देश्य रखे कि 'ब्रह्माजी मुझपर प्रसन्न हों।' यों करनेवाला मनुष्य निष्पाप होकर स्वर्गमें उत्तम भोग भोगता है और पृथ्वीपर धनवान् ब्राह्मणके रूपमें जन्म लेता है ॥ १-४॥
अब 'धन्यव्रत का वर्णन करता हूँ। इसका अनुष्ठान करनेसे अधन्य भी धन्य हो जाता है। पहले मार्गशीर्ष मासकी प्रतिपद्को उपवास करके रातमें 'अग्नये नमः। इस मन्त्रसे होम और अग्निकी पूजा करे। इसी प्रकार एक वर्षतक प्रत्येक मासकी प्रतिपद्को अग्निकी आराधना करनेसे मनुष्य सब सुखोंका भागी होता है।
प्रत्येक प्रतिपदाको एकभुक्त (दिनमें एक समय भोजन करके) रहे। सालभरमें व्रतकी समाप्ति होनेपर ब्राह्मण कपिला गौ दान करे। ऐसा करनेवाला मनुष्य 'वैश्वानर' पदको प्राप्त होता है। यह 'शिखिव्रत' कहलाता है ॥ ५-७॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'प्रतिपद् व्रतोंका वर्णन' नामक एक सौ छिहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १७६ ॥
Summary of chapter 178 of the Agni Mahā Purana is as follows:
Vratas on the third tithi, primarily associated with Gaurī and Śiva's union, are described. The Mūla-Gaurī vrata performed on Caitra-śukla-tṛtīyā commemorates Śiva and Pārvatī's wedding day; it involves a tila-mixed bath, and the aṅga-pūjā of the divine couple maps specific mantras to each body part from pāda to śiras. Twelve monthly flowers from mallika to sindhuvāra form the seasonal offering cycle, and the Saubhāgya-aṣṭaka (eight auspicious items) is presented to Pārvatī. The Saubhāgya-śayana-vrata requires sleeping before Pārvatī's image and then worshipping a brāhmaṇa couple as Śiva-Pārvatī. Additional tṛtīyā forms—Damana-tṛtīyā, Ātma-tṛtīyā—are described, each with a different presiding form of Gaurī in the twelve-month cycle.