अग्निदेव कहते हैं-
मुनिश्रेष्ठ ! अब मैं मास व्रतोंका वर्णन करूँगा, जो भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाले हैं। आषाढ़से प्रारम्भ होनेवाले चातुर्मास्यमें अभ्यङ्ग (मालिश और उबटन) का त्याग करे। इससे मनुष्य उत्तम बुद्धि प्राप्त करता है। वैशाखमें पुष्परेणुतकका परित्याग करके गोदान करनेवाला राज्य प्राप्त करता है। एक मास उपवास रखकर गोदान करनेवाला इस भीमव्रतके प्रभावसे श्रीहरिस्वरूप हो जाता है। आषाढ़से प्रारम्भ होनेवाले चातुर्मास्यमें नियमपूर्वक प्रातः स्नान करनेवाला विष्णुलोकको जाता है। माघ अथवा चैत्र मासकी तृतीयाको गुड़ धेनुका दान दे, इसे - 'गुड़व्रत' कहा गया है। इस महान् व्रतका अनुष्ठान करनेवाला शिवस्वरूप हो जाता है। मार्गशीर्ष आदि मासोंमें 'नक्तव्रत' (रात्रिमें एक बार भोजन) करनेवाला विष्णुलोकका अधिकारी होता है। 'एकभुक्त व्रत का पालन करनेवाला उसी प्रकार पृथक् रूपसे द्वादशीव्रतका भी पालन करे। 'फलव्रत' करनेवाला चातुर्मास्यमें फलोंका त्याग करके उनका दान करे ॥ १-५ ॥
श्रावणसे प्रारम्भ होनेवाले चातुर्मास्यमें व्रतों के अनुष्ठानसे व्रतकर्ता सब कुछ प्राप्त कर लेता है। चातुर्मास्य व्रतोंका इस प्रकार विधान करे आषाढ़के शुक्लपक्षकी एकादशीको उपवास रखे। प्रायः आषाढ़में प्राप्त होनेवाली कर्क-संक्रान्ति में श्रीहरिका पूजन करे और कहे- 'भगवन् ! मैंने आपके सम्मुख यह व्रत ग्रहण किया है। केशव!आपकी प्रसन्नतासे इसकी निर्विघ्न सिद्धि हो । देवाधिदेव जनार्दन! यदि इस व्रतके ग्रहणके अनन्तर इसकी अपूर्णतामें ही मेरी मृत्यु हो जाय, तो आपके कृपा प्रसादसे यह व्रत सम्पूर्ण हो।' व्रत करनेवाला द्विज मांस आदि निषिद्ध वस्तुओं और तेलका त्याग करके श्रीहरिका यजन करे। एक दिनके अन्तरसे उपवास रखकर त्रिरात्रव्रत करनेवाला विष्णुलोकको प्राप्त होता है। 'चान्द्रायण व्रत' करनेवाला विष्णुलोकका और 'मौन व्रत' करनेवाला मोक्षका अधिकारी होता है। 'प्राजापत्य व्रत' करनेवाला स्वर्गलोकको जाता है। सत्तू और यवका भक्षण करके, दुग्ध आदिका आहार करके, अथवा पञ्चगव्य एवं जल पीकर कृच्छ्रव्रतोंका अनुष्ठान करनेवाला स्वर्गको प्राप्त होता है। शाक, मूल और फलके आहारपूर्वक कृच्छ्रव्रत करनेवाला मनुष्य वैकुण्ठको जाता है। मांस और रसका परित्याग करके जौका भोजन करनेवाला श्रीहरिके सांनिध्यको प्राप्त करता है ॥ ६ - १२३ ॥
अब मैं 'कौमुदव्रत' का वर्णन करूँगा। आश्विनके शुक्लपक्षकी एकादशीको उपवास रखे। द्वादशीको श्रीविष्णुके अङ्गोंमें चन्दनादिका अनुलेपन करके कमल और उत्पल आदि पुष्पोंसे उनका पूजन करे। तदनन्तर तिल-तैलसे परिपूर्ण दीपक और घृतसिद्ध पक्वान्नका नैवेद्य समर्पित करे। श्रीविष्णुको मालतीपुष्पोंकी माला भी निवेदन करे। 'ॐ नमो वासुदेवाय' – इस मन्त्रसे व्रतका विसर्जन - करे। इस प्रकार 'कौमुदव्रत' का अनुष्ठान करनेवाला धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष- चारों पुरुषार्थीको हस्तगत कर लेता है। मासोपवास व्रत करनेवाला श्रीविष्णुका पूजन करके सब कुछ प्राप्त कर लेता है ॥ १३-१६ ॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'मास सम्बन्धी व्रतका वर्णन' नामक एक सौ अट्ठानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १९८ ॥
Summary of chapter 200 of the Agni Mahā Purana is as follows:
Agni declares dīpadāna—the gift of a lamp—to be the supreme vrata, surpassing in merit all past, present, and future vratas. Donating a lamp to a temple or to a brāhmaṇa's home every day for one year fulfils all desires; a lamp donated throughout the cāturmāsya period leads to Viṣṇu-loka; a Kārtika lamp donation leads to svarga. The chapter narrates the story of Lalitā, a princess of Vidarbha: in a past life an unknown mouse, fleeing a cat through a temple on Kārtika-pūrṇimā, accidentally raised the wick of a dying lamp in Viṣṇu's sanctuary; through that single unintended act the creature was reborn as Lalitā, the most beloved among the hundred queens of the righteous king Cārudharmarāja. Lalitā donates one thousand lamps to Viṣṇu's temple and explains to her co-wives how her great good fortune arose from that inadvertent lamp-act; they attain svarga merely by hearing her account. The chapter concludes with the warning that stealing a lamp from a temple causes blindness, muteness, and descent into deep naraka, as proclaimed by Yama's messengers to the sinners who arrive at his court.