अग्निदेव कहते हैं-
मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठ ! अब मैं तुम्हारे सम्मुख सबसे उत्तम मासोपवास - व्रतका वर्णन करता हूँ। वैष्णव-यज्ञका अनुष्ठान करके, आचार्यकी आज्ञा लेकर, कृच्छ्र आदि व्रतोंसे अपनी शक्तिका अनुमान करके मासोपवासव्रत करना चाहिये। वानप्रस्थ, संन्यासी एवं विधवा स्त्री- इनके लिये मासोपवास व्रतका विधान है॥ १-२ ॥
आश्विनके शुक्ल पक्षकी एकादशीको उपवास रखकर तीस दिनोंके लिये निम्नलिखित संकल्प करके मासोपवास व्रत ग्रहण करे– ' श्रीविष्णो ! मैं आजसे लेकर तीस दिनतक आपके उत्थानकालपर्यन्त निराहार रहकर आपका पूजन करूँगा। सर्वव्यापी श्रीहरे! आश्विन शुक्ल एकादशीसे आपके उत्थानकाल कार्तिक शुक्ल एकादशी के मध्यमें यदि मेरी मृत्यु हो जाय तो (आपकी कृपासे) मेरा व्रत भङ्ग न हो (अद्यप्रभृत्य विष्णो यावदुत्थानकं कार्तिकाश्विनयोर्विष्णो यावदुत्थानकं तव । अर्चये त्वामनश्नन् हि यावत्त्रिंशद्दिनानि तु ॥ तव प्रिये यद्यन्तरालेऽहं व्रतभङ्गो न मे भवेत् ॥ (अग्नि० २०४।४-५))। व्रत करनेवाला दिनमें तीन बार स्नान करके सुगन्धित द्रव्य और पुष्पोंद्वारा प्रातः, मध्याह्न एवं सायंकाल श्रीविष्णुका पूजन करे तथा विष्णु सम्बन्धी गान, जप और ध्यान करे। व्रती पुरुष वकवादका परित्याग करे और धनकी इच्छा भी न करे। वह किसी भी व्रतहीन मनुष्यका स्पर्श न करे और शास्त्रनिषिद्ध कर्मोंमें लगे हुए लोगोंका चालक-प्रेरक न बने। उसे तीस दिनतक देवमन्दिरमें ही निवास करना चाहिये। व्रत करनेवाला मनुष्य कार्तिक के शुक्लपक्षकी द्वादशीको भगवान् श्रीविष्णुकी पूजा करके ब्राह्मणों को भोजन करावे। तदनन्तर उन्हें दक्षिणा देकर और स्वयं पारण करके व्रतका विसर्जन करे। इस प्रकार तेरह पूर्ण मासोपवास व्रतोंका अनुष्ठान करनेवाला भोग और मोक्ष दोनोंको प्राप्त कर लेता है ॥ ३ - ९ ॥
(उपर्युक्त विधिसे तेरह मासोपवास व्रतोंका अनुष्ठान करनेके बाद व्रत करनेवाला व्रतका उद्यापन करे।) वह वैष्णवयज्ञ करावे, अर्थात् तेरह ब्राह्मणोंका पूजन करे। तदनन्तर उनसे आज्ञा लेकर किसी ब्राह्मणको तेरह ऊर्ध्ववस्त्र,अधोवस्त्र, पात्र, आसन, छत्र, पवित्री, पादुका,योगपट्ट और यज्ञोपवीतोंका दान करे ॥ १०- १२॥
तत्पश्चात् शय्यापर अपनी और श्रीविष्णुकी स्वर्णमयी प्रतिमाका पूजन करके उसे किसी दूसरे ब्राह्मणको दान करे एवं उस ब्राह्मणका वस्त्र आदिसे सत्कार करे। तदनन्तर व्रत करनेवाला यह कहे– 'मैं सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त होकर ब्राह्मणों और श्रीविष्णुभगवान्के कृपा-प्रसादसे विष्णुलोकको जाऊँगा। अब मैं विष्णुस्वरूप होता हूँ।' इसके उत्तरमें ब्राह्मणोंको कहना चाहिये – 'देवात्मन् ! तुम विष्णुके उस रोग-शोकरहित परमपदको जाओ जाओ और वहाँ विष्णुका स्वरूप धारण करके विमानमें प्रकाशित होते हुए स्थित होओ।' फिर व्रत करनेवाला द्विजोंको प्रणाम करके वह शय्या आचार्यको दान करे। इस विधिसे व्रत करनेवाला अपने सौ कुलोंका उद्धार करके उन्हें विष्णुलोकमें ले जाता है। जिस देशमें मासोपवास व्रत करनेवाला रहता है, वह देश पापरहित हो जाता है। फिर उस सम्पूर्ण कुलकी तो बात ही क्या है, जिसमें मासोपवास व्रतका अनुष्ठान करनेवाला उत्पन्न हुआ होता है। व्रतयुक्त मनुष्यको मूच्छित देखकर उसे घृतमिश्रित दुग्धको पान कराये। निम्नलिखित वस्तुएँ व्रतको नष्ट नहीं करतीं ब्राह्मणकी अनुमतिसे ग्रहण किया हुआ - हविष्य, दुग्ध, आचार्यकी आज्ञासे ली हुई ओषधि, जल, मूल और फल 'इस व्रतमें भगवान् श्रीविष्णु ही महान् ओषधिरूप हैं इसी विश्वाससे व्रत करनेवाला इस व्रतसे उद्धार पाता है ॥ १३ - १८ ॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'मासोपवास व्रतका वर्णन' नामक दो सौ चारवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २०४॥
Summary of chapter 206 of the Agni Mahā Purana is as follows:
This chapter expounds the Stambhana rite, used to immobilize enemies, enemies' weapons, or hostile forces. The mantra employs a specific bīja associated with the earth element. Agni describes how the sādhaka traces the target's name on a silver plate and buries it at a crossroads during an eclipse. Śiva and Kālī are the presiding deities, and the homa is performed with dry wood and black sesame.