अग्नि महा पुराण

47-शालग्राम-विग्रहों की पूजाका वर्णन

भगवान् हयग्रीव कहते हैं-

ब्रह्मन् ! अब मैं तुम्हारे सम्मुख पूर्वोक्त चक्राङ्कित शालग्राम विग्रहोंकी पूजाका वर्णन करता हूँ, जो सिद्धि प्रदान करनेवाली है। श्रीहरिकी पूजा तीन प्रकारकी होती है-काम्या, अकाम्या और उभयात्मिका। मत्स्य आदि पाँच विग्रहोंकी पूजा काम्या अथवा उभयात्मिका हो सकती है। पूर्वोक्त चक्रा सुशोभित वराह, नृसिंह और वामन - इन तीनोंकी पूजा मुक्तिके लिये करनी चाहिये। अब शालग्राम - पूजनके विषयमें सुनो, जो तीन प्रकारकी होती है। इनमें निष्कला पूजा उत्तम, सकला पूजा कनिष्ठ और मूर्तिपूजाको मध्यम माना गया है। चौकोर मण्डलमें स्थित कमलपर पूजाकी विधि इस प्रकार है – हृदयमें प्रणवका न्यास करते हुए षडङ्गन्यास करे। फिर करन्यास और व्यापक न्यास करके तीन मुद्राओंका प्रदर्शन करे। तत्पश्चात् चक्रके बाह्यभागमें पूर्व दिशाकी ओर गुरुदेवका पूजन करे। पश्चिम दिशामें गणका, वायव्यकोणमें धाताका एवं नैर्ऋत्यकोणमें विधाताका पूजन करे। दक्षिण और उत्तर दिशामें क्रमशः कर्ता और हर्ताकी पूजा करे। इसी प्रकार ईशानकोणमें विष्वक्सेन और अग्निकोणमें क्षेत्रपालकी पूजा करे। फिर पूर्वादि दिशाओं में ऋग्वेद आदि चारों वेदोंकी पूजा करके आधारशक्ति, अनन्त, पृथिवी, योगपीठ, पद्म तथा सूर्य, चन्द्र और ब्रह्मात्मक अग्नि-इन तीनोंके मण्डलोंका यजन करे। तदनन्तर द्वादशाक्षर मन्त्रसे आसनपर शिलाकी स्थापना करके पूजन करे। फिर मूल मन्त्रके विभाग करके एवं सम्पूर्ण मन्त्रसे क्रमपूर्वक पूजन करे। फिर प्रणवसे पूजन करनेके पश्चात् तीन मुद्राओंका प्रदर्शन करे ॥ १-९॥

इस प्रकार यह शालग्रामकी प्रथम पूजा निष्कला कही जाती है। पूर्ववत् षोडशदलकमलसे युक्त मण्डलको अङ्कित करे। उसमें शङ्ख, चक्र, गदा और खड्ग – इन आयुधोंकी तथा गुरु आदिकी पहलेकी भाँति पूजा करे। पूर्व और उत्तर दिशाओं में क्रमश: धनुष और बाणकी पूजा करे। प्रणवमन्त्रसे आसन समर्पण करे और द्वादशाक्षर मन्त्रसे शिलाका न्यास करना चाहिये । अब तीसरे प्रकारकी कनिष्ठ पूजाका वर्णन करता हूँ, सुनो। अष्टदलकमल अङ्कित करके उसपर पहलेके समान गुरु आदिकी पूजा करे। फिर अष्टाक्षर मन्त्रसे आसन देकर उसीसे शिलाका न्यास करे ॥ १० - १३३ ॥

 इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'शालग्राम आदिकी पूजाका वर्णन' विषयक सैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४७ ॥