अग्नि महा पुराण

32-निर्वाणादि-दीक्षाकी सिद्धिके उद्देश्यसे सम्पादनीय संस्कारोंका वर्णन

अग्निदेव कहते हैं-

ब्रह्मन्! बुद्धिमान् पुरुष निर्वाणादि दीक्षाओं में अड़तालीस संस्कार करावे। उन संस्कारोंका वर्णन सुनिये, जिनसे मनुष्य देवतुल्य हो जाता है। सर्वप्रथम योनिमें गर्भाधान, तदनन्तर पुंसवन संस्कार करे फिर सीमन्तोन्नयन, जातकर्म, नामकरण, अन्नप्राशन, चूडाकर्म, चार ब्रह्मचर्यव्रत – वैष्णवी, पार्थी, भौतिकी और श्रौतिकी, गोदान, समावर्तन, सात पाकयज्ञ-अष्टका, अन्वष्टका पार्वण श्राद्ध, श्रावणी, आग्रहायणी, चैत्री एवं आश्वयुजी, सात हविर्यज्ञ- आधान, अग्निहोत्र, दर्श, पौर्णमास, चातुर्मास्य, पशुबन्ध तथा सौत्रामणी, यज्ञश्रेष्ठ अग्निष्टोम, अत्यग्निष्टोम, सात सोमसंस्थाएँ– उक्थ्य, षोडशी, वाजपेय, अतिरात्र एवं आप्तोर्याम; सहस्रेश यज्ञ - हिरण्याङ्घ्रि, हिरण्याक्ष हिरण्यमित्र, हिरण्यपाणि, हेमाक्ष, हेमाङ्ग, हेमसूत्र, हिरण्यास्य, हिरण्याङ्ग, हेमजिह्न, हिरण्यवान् और सब यज्ञोंका स्वामी अश्वमेधयज्ञ तथा आठ गुण सर्वभूतदया, क्षमा, आर्जव, शौच, अनायास, मङ्गल, अकृपणता और अस्पृहा- ये संस्कार करे। इष्टदेवके मूल मन्त्रसे सौ आहुतियाँ दे। सौर, शाक्त, वैष्णव तथा शैव-सभी दीक्षाओंमें ये समान माने गये हैं। इन संस्कारोंसे संस्कृत होकर मनुष्य भोग-मोक्षको प्राप्त करता है। वह सम्पूर्ण रोगादिसे मुक्त होकर देववत् हो जाता है। मनुष्य अपने इष्टदेवताके जप, होम, पूजन तथा ध्यानसे इच्छित वस्तुको प्राप्त करता है ॥ १ - १३ ॥

इस प्रकार आदि आग्रेय महापुराणमें 'निर्वाणादि-दीक्षाकी सिद्धि के उद्देश्यसे सम्पादनीय संस्कारोंका वर्णन ' नामक बत्तीसव अध्याय पूरा हुआ ॥ ३२॥