अग्नि महा पुराण

337- काव्य आदिके लक्षण

अग्निदेव कहते हैं-

वसिष्ठ ! अब मैं 'काव्य' और 'नाटक' आदिके स्वरूप तथा 'अलंकारों का वर्णन करता हूँ। ध्वनि, वर्ण, पद और वाक्य यही सम्पूर्ण वाड्मय माना गया है ('सरस्वती कण्ठाभरण' के रचयिता महाराजाधिराज भोजदेवने अपने ग्रन्थके चरणमें 'ध्वनिवर्णाः पदं वाक्यम्' (१।१) अग्निपुराणकी इस आनुपूर्वीको अविकलरूपसे उद्धृत किया है।)। शास्त्र, इतिहास तथा काव्य - इन तीनोंकी समाप्ति इसी वाङ्मयमें होती है। वेदादि शास्त्रों में शब्दकी प्रधानता है और इतिहास पुराणों में अर्थकी। इन दोनोंमें 'अभिधा-शक्ति' (वाच्यार्थ) की ही मुख्यता होती है; अतः 'काव्य' इन दोनोंसे भिन्न है। [ क्योंकि उसमें व्यङ्ग्य अर्थको प्रधानता दी जाती है (शब्दप्रधान वेदादिकी आज्ञाको भामह आदि आचार्योंने 'प्रभुसम्मित' और अर्थप्रधान इतिहास पुराणोंकी आज्ञाको 'सुहत्सम्मित' नाम दिया है। इसी तरह शब्द और अर्थको गौण करके जहाँ व्यङ्ग्यार्थको प्रधानता दी गयी है, उस काव्यके उपदेशको 'कान्तासम्मित' कहा है। यथा 'प्रभुसम्मितशब्दप्रधानवेदादिशास्त्रेभ्यः, सुहत्सम्मितार्थतात्पर्यवत्पुराणादीतिहासेभ्यश्च शब्दार्थयोर्गुणभावेन रसाङ्गभूतव्यापारप्रवणतया विलक्षणं यत् काव्यं लोकोत्तरवर्णनानिपुणकविकर्म, तत् कान्तेव सरसतापादनेनाभिमुखीकृत्य रामादिवद्वर्तितव्यं न रावणादिवदित्युपदेशं च यथायोगं कवेः सहृदयानां च करोतीति।' (काव्यप्रकाश १ उल्लास) । ] संसारमें मनुष्य जीवन दुर्लभ है; उसमें भी विद्या तो और भी दुर्लभ है। विद्या होनेपर भी कवित्वका गुण आना कठिन है; उसमें भी काव्य-रचनाकी पूर्ण शक्तिका होना अत्यन्त कठिन है। शक्तिके साथ बोध एवं प्रतिभा हो, यह और भी कठिन है; इन सबके होते हुए विवेकका होना तो परम दुर्लभ है। कोई भी शास्त्र क्यों न हो, अविद्वान् पुरुषोंके द्वारा उसका अनुसंधान किया जाय तो उससे कुछ भी सिद्ध नहीं होता'। 'श' आदि वर्ण, अर्थात् 'श ष स ह ' तथा वर्गोंके द्वितीय एवं चतुर्थ अक्षर 'महाप्राण' कहलाते हैं। वर्णोंके समुदायको 'पद' कहते हैं। इसके दो भेद हैं- 'सुबन्त' और 'तिङन्त'। अभीष्ट अर्थसे व्यवच्छिन्न संक्षिप्त पदावलीका नाम 'वाक्य' है ॥ १-६॥

जिसमें अलंकार भासित होता हो, गुण विद्यमान हो तथा दोषका अभाव हो, ऐसे वाक्यको 'काव्य कहते हैं। लोक-व्यवहार तथा वेद (शास्त्र) का ज्ञान - ये काव्यप्रतिभाकी योनि' हैं। सिद्ध किये मन्त्रके प्रभावसे जो काव्य निर्मित होता है, वह अयोनिज है। देवता आदिके लिये संस्कृत भाषाका और मनुष्यों के लिये तीन प्रकारकी प्राकृत भाषाका प्रयोग करना चाहिये। काव्य आदि तीन प्रकारके होते हैं गद्य, पद्य और मिश्र (भामहने काव्यके दो भेद बताये हैं- गद्य और पद्य फिर भाषाकी दृष्टिसे इनके तीन-तीन भेद और होते हैं— संस्कृत, प्राकृत और अपभ्रंश वामनने 'काव्य गद्यं पद्मं च' (३-२१) - इस सूत्रके द्वारा काव्यके गद्य और पद्य दो ही मूलभेद माने हैं। दण्डीने अपने 'काव्यादर्श' में अग्निपुराणकथित गद्य, पद्म और मिश्र तीनों भेदोंको उद्धृत किया है। भाषाकी दृष्टिसे भी उन्होंने काव्यके चार भेद माने - हैं- संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश और मिश्र अग्निपुराणमें जो 'पादसंतानो गद्यम्।' इस प्रकार गद्यका लक्षण किया है, दण्डीने अपने 'काव्यादर्श' में इसे अविकलरूपसे उद्धृत किया है।)

पादविभागसे रहित पदोंका प्रवाह 'गद्य' कहलाता है। वह भी चूर्णक, उत्कलिका और वृत्तगन्धि भेदसे तीन प्रकारका होता है (आचार्य वामनने भी अग्निपुराणोक्त इन्हीं तीन गद्यभेदोंका उल्लेख किया है। यथा-'गद्य वृत्तगन्धि चूर्णमुत्कलिकाप्रार्य च)। छोटी-छोटी कोमल पदावलीसे युक्त और अत्यन्त मृदु संदर्भसे पूर्ण गद्यको 'चूर्णक' कहते हैं। जिसमें बड़े-बड़े समासयुक्त पद हों, उसका नाम 'उत्कलिका' (इसी भावकी छाया लेकर वामनने १३ के २४-२५ सूत्रोंका निर्माण किया है-'अनाविद्धललितपदं चूर्णम् ॥ २४ ॥'विपरीतमुत्कलिकाप्रायम्' ॥ २५)हैं। जो मध्यम श्रेणी के संदर्भसे युक्त हो तथा जिसका विग्रह अत्यन्त कुत्सित (क्लिष्ट) न हो, जिसमें पद्यकी छायाका आभास मिलता हो- जिसकी पदावली किसी पद्य या छन्दके खण्ड-सी जान पड़े, उस गद्यको 'वृत्तगन्धि' कहते हैं। यह सुननेमें अधिक उत्कट नहीं होता (वामनने जिसमें किसी पद्यका भाग प्रतीत होता हो, ऐसे गद्यको 'वृत्तगन्धि' कहा है। यथा-'पद्यभागवदत्तगन्धि' ॥ १।३ । २३ ।। साहित्यदर्पणकारने भी 'वृत्तभागयुतम्' कहकर इसी भावकी पुष्टि की है। वामन और विश्वनाथ दोनों ही स्पष्टतः अग्निपुराणके छायाग्राही हैं।)। गद्य काव्यके पाँच भेद माने जाते - हैं- आख्यायिका, कथा, खण्डकथा, परिकथा एवं 'कथानिका'(विश्वनाथने 'साहित्यदर्पण' के छठे परिच्छेदमें 'कथा' और 'आख्यायिका' की चर्चा की है। उन्होंने गद्य-पद्यमय काव्योंके तीन भेद माने हैं- चम्पू विरुद और करम्भक) । जहाँ गद्यके द्वारा विस्तारपूर्वक ग्रन्थ निर्माता कविके वंशकी प्रशंसा की गयी हो, जिसमें कन्याहरण, संग्राम, विप्रलम्भ (वियोग) और विपत्ति ( मरणादि) प्रसङ्गोंका वर्णन हो, जहाँ वैदर्भी आदि रीतियों तथा भारती आदि वृत्तियों की प्रवृत्तियों पर विशेषरूपसे प्रकाश पड़ता हो, जिसमें 'उच्छास के नामसे परिच्छेद (खण्ड) किये गये हों, जो 'चूर्णक' नामक गद्यशैलीके कारण अधिक उत्कृष्ट जान पड़ती हो, अथवा जिसमें 'वक्त्र' या 'अपरवक्त्र' नामक छन्दका प्रयोग हुआ हो, उसका नाम 'आख्यायिका' है (जैसे 'कादम्बरी' आदि)। जिस काव्यमें कवि श्लोकोंद्वारा संक्षेपसे अपने वंशका गुणगान करता हो, जिसमें मुख्य अर्थको उपस्थित करनेके लिये कथान्तरका संनिवेश किया गया हो, जहाँ परिच्छेद हो ही नहीं, अथवा यदि हो भी तो कहीं लम्बकोंद्वारा ही हो, उसका नाम 'कथा' है (जैसे 'कथा-सरित्सागर' आदि)। उसके मध्यभागमें चतुष्पदी (पद्य) द्वारा बन्ध रचना करे। जिसमें कथा खण्डमात्र हो, उसे 'खण्डकथा' कहते हैं। खण्डकथा और परिकथा - इन दोनों प्रकारकी कथाओंमें मन्त्री, सार्थवाह (वैश्य) अथवा ब्राह्मणको ही नायक मानते हैं। उन दोनोंका ही प्रधान रस 'करुण' जानना चाहिये। उसमें चार प्रकारका 'विप्रलम्भ' (विरह) वर्णित होता है। (प्रवास, शाप, मान एवं करुण-भेदसे विप्रलम्भके चार प्रकार हो जाते हैं।) उन दोनोंमें ही ग्रन्थके भीतर कथाकी समाप्ति नहीं होती। अथवा 'खण्डकथा' कथाशैलीका ही अनुसरण करती है। कथा एवं आख्यायिका दोनोंके लक्षणोंके मेलसे जो कथावस्तु प्रस्तुत होती है, उसे 'परिकथा' नाम दिया गया है। जिसमें आरम्भमें भयानक, मध्यमें करुण तथा अन्तमें अद्भुत रसको प्रकट करनेवाली रचना होती है, वह 'कथानिका' (कहानी) है। उसे उत्तम श्रेणीका काव्य नहीं माना गया है । ७- २०॥

चतुष्पदी नाम है- पद्यका [ चार पादोंसे युक्त होनेसे उसे 'चतुष्पदी' कहते हैं]। उसके दो भेद हैं, 'वृत्त' और 'जाति' जो अक्षरोंकी गणनासे जाना जाय, उसे 'वृत्त' कहते हैं। यह भी दो प्रकारका है – 'उक्थ' (वैदिकस्तोत्र आदि) और 'कृतिशेषज' (लौकिक)। जहाँ मात्राओं द्वारा गणना हो, वह पद्य 'जाति' कहलाता है। यह काश्यपका मत है। वर्णोंकी गणनाके अनुसार व्यवस्थित छन्दको 'वृत्त' कहते हैं। पिङ्गलमुनिने वृत्तके तीन भेद माने हैं, सम, अर्धसम तथा विषम - जो लोग गम्भीर काव्य-समुद्रके पार जाना चाहते हैं, उनके लिये छन्दोविद्या नौकाके समान है। महाकाव्य, कलाप, पर्यायबन्ध, विशेषक, कुलक, मुक्तक तथा कोष- ये सभी पद्योंके समुदाय हैं। अनेक सर्गोंमें रचा हुआ संस्कृतभाषाद्वारा निर्मित काव्य 'महाकाव्य' कहलाता है ॥ २१ - २३ ॥

सर्गबद्ध रचनाको, जो संस्कृत भाषामें अथवा विशुद्ध एवं परिमार्जित भाषामें लिखी गयी हो, 'महाकाव्य' कहते हैं। महाकाव्यके स्वरूपका त्याग न करते हुए उसके समान अन्य रचना भी हो तो वह दूषित नहीं मानी जाती 'महाकाव्य' इतिहासकी कथाको लेकर निर्मित होता है अथवा उसके अतिरिक्त किसी उत्तम आधारको लेकर भी उसकी अवतारणा की जाती है। उसमें यथास्थान गुप्तमन्त्रणा, दूतप्रेषण, अभियान और युद्ध आदिके वर्णनका समावेश होता है। वह अधिक विस्तृत नहीं होता। शक्करी, अतिजगती, अतिशक्करी, त्रिष्टुप् और पुष्पिताग्रा आदि तथा वक्त्र आदि मनोहर एवं समवृत्तवाले छन्दोंमें महाकाव्यकी रचना की जाती है। प्रत्येक सर्गके अन्तमें छन्द बदल देना उचित है। सर्ग अत्यन्त संक्षिप्त नहीं होना चाहिये। 'अतिशक्करी' और 'अष्टि' – इन दो छन्दोंसे एक सर्ग संकीर्ण होना चाहिये तथा दूसरा सर्ग मात्रिक छन्दोंसे संकीर्ण होना चाहिये। अगला सर्ग पूर्वसर्गकी अपेक्षा अधिकाधिक उत्तम होना चाहिये। 'कल्प' अत्यन्त निन्दित माना गया है। उसमें सत्पुरुषोंका विशेष आदर नहीं होता। नगर, समुद्र, पर्वत, ऋतु चन्द्रमा, सूर्य, आश्रम, वृक्ष, उद्यान, जलक्रीड़ा, मधुपान, सुरतोत्सव, दूती वचन-विन्यास तथा कुलटाके चरित्र आदि अद्भुत वर्णनोंसे महाकाव्य पूर्ण होता है। अन्धकार, वायु तथा रतिको व्यक्त करनेवाले अन्य उद्दीपन विभावोंसे भी वह अलंकृत होता है। उसमें सब प्रकारकी वृत्तियोंकी प्रवृत्ति होती है। वह सब प्रकारके भावोंसे प्रभावित होता है तथा सब प्रकारकी रीतियों तथा सभी रसोंसे उसका संस्पर्श होता है। सभी गुणों और अलंकारोंसे भी महाकाव्यको परिपुष्ट किया जाता है। इन सब विशेषताओंके कारण ही उस रचनाको 'महाकाव्य' कहते हैं तथा उसका निर्माता 'महाकवि' कहलाता है ।। २४-३२॥

महाकाव्यमें उक्ति वैचित्र्यकी प्रधानता होते हुए भी रस ही उसका जीवन है। उसकी स्वरूप सिद्धि अपृथग्यत्नसे (अर्थात् सहजभावसे) साध्य वाग्वक्रिमा (वचनवैचित्र्य अथवा वक्रोक्ति) - विषयक रससे होती है। महाकाव्यका फल है चारों पुरुषार्थोकी प्राप्ति। वह नायकके नामसे ही सर्वत्र विख्यात होता है। प्रायः समान छन्दों अथवा वृत्तियोंमें महाकाव्यका निर्वाह किया जाता है। कौशिकी वृत्तिकी प्रधानता होनेसे काव्य-प्रबन्धमें कोमलता आती है। जिसमें प्रवासका वर्णन हो, उस रचनाको 'कलाप' कहते हैं। उसमें 'पूर्वानुराग' नामक शृङ्गाररसकी प्रधानता होती है। संस्कृत अथवा प्राकृतके द्वारा प्राप्ति आदिका वर्णन 'विशेषक' कहलाता है। जहाँ अनेक श्लोकोंका एक साथ अन्वय हो, उसे 'कुलक' कहते हैं। उसीका नाम 'संदानितक' भी है। एक-एक श्लोककी स्वतन्त्र रचनाको 'मुक्तक' कहते हैं। उसे सहृदयोंके हृदयमें चमत्कार उत्पन्न करनेमें समर्थ होना चाहिये । श्रेष्ठ कवियोंकी सुन्दर उक्तियोंसे सम्पन्न ग्रन्थको 'कोष' कहा गया है। वह ब्रह्मकी भाँति अपरिच्छिन्न रससे युक्त होता है तथा सहृदय पुरुषोंको रुचिकर प्रतीत होता है। सर्गमें जो भिन्न-भिन्न छन्दोंकी रचना होती है, वह आभासोपम शक्ति है। उसके दो भेद हैं- 'मिश्र' तथा 'प्रकीर्ण' । जिसमें 'श्रव्य' और 'अभिनेय'– दोनोंके लक्षण हों, वह 'मिश्र' और सकल उक्तियोंसे युक्त काव्य 'प्रकीर्ण' कहलाता है ।। ३३-३९ ।।

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'काव्य आदिके लक्षण' नामक तीन सौ सैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३३७ ॥