अग्नि महा पुराण

92-प्रतिष्ठाके अङ्गभूत शिलान्यासकी विधिका वर्णन

भगवान् शिव कहते हैं-

स्कन्द ! अब मैं संक्षेपसे और क्रमशः प्रतिष्ठाका वर्णन करूँगा। पीठ शक्ति है और लिङ्ग शिव इन दोनों (पीठ और लिङ्ग अथवा शक्ति और शिव) के योगमें शिव सम्बन्धी मन्त्रों द्वारा प्रतिष्ठाकी विधि सम्पादित होती है। प्रतिष्ठाके 'प्रतिष्ठा' आदि पाँच भेद' हैं। उनका स्वरूप तुम्हें बता रहा हूँ। जहाँ ब्रह्मशिलाका योग हो, वहाँ विशेषरूपसे की हुई स्थापना 'प्रतिष्ठा' कही गयी है। पीठपर ही यथायोग्य जो अर्चा विग्रहको पधराया जाता है, उसे 'स्थापन' - कहते हैं। प्रतिष्ठा (ब्रह्मशिला) से भिन्नकी स्थापनाको 'स्थिर स्थापन' कहते हैं। लिङ्गके आधारपूर्वक जो स्थापना होती है, उसे 'उत्थापन' कहा गया है। जिस प्रतिष्ठामें लिङ्गको आरोपित करके विद्वानों द्वारा उसका संस्कार किया जाता है, उसकी 'आस्थापन' संज्ञा है। ये शिव

प्रतिष्ठाके पाँच भेद हैं। 'आस्थान' और 'उत्थान' भेदसे विष्णु आदिकी प्रतिष्ठा दो प्रकारकी मानी गयी है। इन सभी प्रतिष्ठाओंमें चैतन्यस्वरूप परमशिवका नियोजन करे। 'पदाध्वा' आदि भेदसे प्रासादोंमें भी पाँच प्रकारकी प्रतिष्ठा बतायी गयी है। प्रासादकी इच्छासे पृथ्वीकी परीक्षा करे। जहाँकी मिट्टीका रंग श्वेत हो और घीकी सुगन्ध आती हो, वह भूमि ब्राह्मणके लिये उत्तम बतायी गयी है। इसी तरह क्रमशः क्षत्रियके लिये लाल तथा रक्तकी-सी गन्धवाली मिट्टी, वैश्य लिये पीली और सुगन्धयुक्त मिट्टीवाली तथा शूद्रके लिये काली एवं सुराकी-सी गन्धवाली मिट्टीसे युक्त भूमि श्रेष्ठ कही गयी है ॥ १-७॥

पूर्व, ईशान, उत्तर अथवा सब ओर नीची और मध्यमें ऊँची भूमि प्रशस्त मानी गयी है। एक हाथ गहराईतक खोदकर निकाली हुई मिट्टी यदि फिर उस गड्ढेमें डाली जानेपर अधिक हो जाय तो वहाँकी भूमिको उत्तम समझे। अथवा जल आदिसे उसकी परीक्षा करे ('समराङ्गणसूत्रधार के अनुसार जलसे परीक्षा करने की विधि इस प्रकार है- गड्डा खोदकर उसकी मिट्टी निकालकर मिट्टीसे ही पूरित करनेके बजाय पानी भरना चाहिये। पानी भरकर सौ कदम (पदशतं व्रजेत्) चलना चाहिये पुनः लौट आनेपर यदि पानी जितना था उतना ही रहे तो श्रेष्ठ, कुछ कम (३) हो जाय तो मध्यम और बहुत कम (३) अथवा और अधिक कम हो जाय तो वर्ज्य – निकृष्ट समझना चाहिये। समराङ्गणकी इस प्रक्रियामें मत्स्यपुराण प्रक्रियाकी छाप है। परंतु मयमुनिने इस प्रक्रियाके - सम्बन्धमें और भी कठोरता दिखायी है। उनके अनुसार गड्ढे में सायंकाल पानी भरा जाय और दूसरे दिन प्रातः उसकी परीक्षा करनी चाहिये। यदि उसमें प्रातः भी कुछ पानीके दर्शन हो जायँ तो उसे अत्युत्कृष्ट भूमि समझना चाहिये। इसके विपरीत गुणवाली भूमि अनिष्टदायिनी तथा वर्ज्य है।)

हड्डी और कोयले आदिसे दूषित भूमिका खोदने, वहाँ गौओंको ठहराने अथवा बारंबार जोतने आदिके द्वारा अच्छी तरह शोधन करे नगर, ग्राम, दुर्ग, गृह और प्रासादका निर्माण करानेके लिये उक्त प्रकारसे भूमि शोधन आवश्यक है। मण्डपमें द्वारपूजासे लेकर मन्त्रतर्पण- पर्यन्त सम्पूर्ण कर्मका सम्पादन करके विधिपूर्वक घोरास्त्र सहस्रयाग करे। बराबर करके लिपी पुती भूमिपर दिशाओंका साधन करे। सुवर्ण, अक्षत और दहीके द्वारा प्रदक्षिणक्रमसे रेखाएँ खींचे। मध्यभागसे ईशानकोष्ठ में स्थित भरे हुए कलशमें शिवका पूजन करे। फिर वास्तुकी पूजा करके उस कलशके जलसे कुदाल आदिको सींचे। मण्डपसे बाहर राक्षसों और ग्रहोंका पूजन करके दिशाओं में विधिपूर्वक बलि दे ॥ ८-१३३ ॥

कलशमें पूजा करके लग्न आनेपर अग्निकोणवर्ती कोष्ठमें पहले जिसका अभिषेक किया गया था, उस मधुलिप्त कुदालसे धरती खुदावे और मिट्टीको नैर्ऋत्यकोणमें फेंके। खोदे गये गड्ढेमें कलशका जल गिरा दे। फिर भूमिका अभिषेक करके कुदाल आदिको नहलाकर उसका पूजन करे। तत्पश्चात् दूसरे कलशको दो वस्त्रोंसे आच्छादित करके ब्राह्मणके कंधेपर रखकर गाजे-बाजे और वेदध्वनिके साथ नगरकी पूर्व सीमाके अन्ततक, जितनी दूर जाना अभीष्ट हो, उतनी दूर ले जाय और वहाँ क्षणभर ठहरकर वहाँसे नगरके चारों ओर प्रदक्षिणक्रमसे चलते हुए ईशानकोणतक उस कलशको घुमावे। साथ ही सीमान्तचिह्नोंका अभिषेक करता रहे ॥ १४-१८ ॥

इस प्रकार रुद्र-कलशको नगरके चारों ओर घुमाकर भूमिका परिग्रह करे। इस क्रियाको 'अर्घ्यदान' कहा गया है। तदनन्तर शल्यदोषका निवारण करनेके लिये भूमिको इतनी गहराईतक खुदवावे, जिससे कंकड़-पत्थर अथवा पानी दिखायी देने लगे। अथवा यदि शल्य (हड्डी आदि) का ज्ञान हो जाय तो उसे विधिपूर्वक खुदवाकर निकाल दे। यदि कोई लग्न कालमें प्रश्न पूछे और उसके मुखसे अ, क, च, ट, त, प, स और ह–इन वर्गोंके अक्षर निकलें तो इनकी दिशाओं में शल्यकी स्थिति सूचित होती है। अथवा द्विज आदि वहाँ गिरें तो ये सब उस स्थानमें शल्य होनेकी सूचना देते हैं। कर्ताक अपने अङ्ग विकारसे उसके ही बराबर शल्य होनेका निश्चय करे। पशु आदिके प्रवेशसे, कीर्तनसे तथा पक्षियोंके कलरवोंसे शल्यकी दिशाका ज्ञान प्राप्त करे ॥ १९ - २२ ॥

किसी पट्टीपर या भूमिपर अकारादि आठ T-वर्णोंको वर्गोंसे युक्त मातृका वर्णोंको लिखे। वर्गके अनुसार क्रमशः पूर्वसे लेकर ईशानतककी दिशाओं में शल्यकी जानकारी प्राप्त करे। 'अ' वर्गमें पूर्व दिशाकी ओर लोहा होनेका अनुमान करे। 'क' वर्गमें अग्निकोणकी ओर कोयला जाने। 'च' वर्गमें दक्षिण दिशाकी ओर भस्म तथा 'ट' वर्गमें

नैर्ऋत्यकोणकी ओर अस्थिका होना समझे। 'त' वर्गमें पश्चिम दिशाकी ओर ईंट, 'प' वर्गमें वायव्यकोणकी ओर खोपड़ी, 'य' वर्गमें उत्तर दिशाकी ओर मुर्दे और कीड़े आदि और 'स' वर्गमें ईशानकोणकी ओर लोहेका होना बतावे । इसी प्रकार 'ह' वर्गमें चाँदी होनेका अनुमान करे। 'क्ष' वर्गयुक्त दिग्भागसे उसी दिशामें अन्य अनर्थकारी वस्तुओंके होनेका अनुमान करे । एक-एक हाथ लंबे नौ शिलाखण्डोंका प्रोक्षण करके, उन्हें आठ-आठ अङ्गुल मिट्टीके भीतर गाड़ दे। फिर वहाँ पानी डालकर उनपर मुद्गरसे आघात करे। जब वे प्रस्तर तीन चौथाई भागतक गड्ढेके भीतर धँस जायँ, तब उस खातको भरकर, लीप पोतकर वहाँकी भूमिको बराबर कर दे। ऐसा करवाकर गुरु सामान्य अर्घ्य हाथमें लिये आगे बताये जानेवाले मण्डल (या मण्डप) की ओर जाय। मण्डपके द्वारपर द्वारपालोंका पूजन (आदर-सत्कार) करके पश्चिम द्वारसे उसके भीतर प्रवेश करे ॥ २३ - २८ ॥

वहाँ आत्मशुद्धि आदि कुण्ड-मण्डपका संस्कार करे। कलश और वार्धानी आदिका स्थापन करके लोकपालों तथा शिवका अर्चन करे। अग्निका जनन और पूजन आदि सब कार्य पूर्ववत् करे। तत्पश्चात् गुरु यजमानके साथ शिलाओंके स्नान-मण्डपमें जाय। वे शिलाएँ प्रासाद लिङ्गके चार पाये हैं। उनके नाम हैं क्रमश: धर्म, ज्ञान, वैराग्य और ऐश्वर्य; अधर्म, अज्ञान, अवैराग्य और अनैश्वर्य आदि उनकी ऊँचाई आठ अङ्गुलकी हो तो अच्छी मानी गयी है। वे चौकोर हों और उनकी लंबाई एक हाथकी हो, इस मापसे प्रस्तरकी शिलाएँ बनवानी चाहिये। ईंटोंकी शिलाओंका माप आधा होना चाहिये। प्रस्तरखण्डसे बने हुए प्रासादमें जो शिलाएँ उपयोग में लायी जायँ अथवा ईंटोंके बने हुए मन्दिरमें जो ईंटें लगें, उनमेंसे नौ शिलाएँ - अथवा ईंटें वज्र आदि चिह्नोंसे अङ्कित हों, अथवा - पाँच शिलाएँ कमलके चिह्नोंसे अङ्कित हों। इन अङ्कित शिलाओंसे ही मन्दिर निर्माणका कार्य - आरम्भ किया जाय ॥ २९ - ३२ ॥

पाँच शिलाओंके नाम इस प्रकार हैं- नन्दा, भद्रा, जया रिक्ता और पूर्णा इन पाँचोंके निधिकुम्भ इस प्रकार हैं- पद्म, महापद्म, शङ्ख, मकर और समुद्र नौ शिलाओंके नाम इस प्रकार हैं - नन्दा, भद्रा, जया, पूर्णा, अजिता, अपराजिता, विजया, मङ्गला और नवमी शिला धरणी है। इन नवोंके निधिकलश क्रमश: इस प्रकार जानने चाहिये सुभद्र, विभद्र, सुनन्द, पुष्पदन्त, जय, विजय, कुम्भ, पूर्व और उत्तर प्रणवमय आसन देकर अस्त्र-मन्त्रसे ताड़न और उल्लेखन करने के पश्चात् इन सब शिलाओंको सामान्य रूपसे कवच-मन्त्रसे अवगुण्ठित करना चाहिये। अस्त्र मन्त्रके अन्तमें 'हूं फट्' लगाकर उसका उच्चारण करते हुए मिट्टी, गोबर, गोमूत्र, कषाय तथा गन्धयुक्त जलसे मलस्नान करावे। तत्पश्चात् विधिपूर्वक पञ्चगव्य और पञ्चामृतसे स्नान कराना चाहिये। इसके बाद गन्धयुक्त जलसे स्नान करानेके अनन्तर अपने नामसे अङ्कित मन्त्रद्वारा फल, रत्न, सुवर्ण तथा गोशृङ्गके जलसे और चन्दनसे शिलाको चर्चित करके उसे वस्त्रोंसे आच्छादित करे ॥ ३३ - ४० ॥

खडत्थ आसन देकर, यागमण्डपकी परिक्रमा करके, उस शिलाको ले जाय और हृदय मन्त्रद्वारा उसे शय्या अथवा कुशके बिस्तरपर सुला दे। वहाँ पूजन करके, बुद्धिसे लेकर पृथिवी-पर्यन्त तत्त्वसमूहोंका न्यास करनेके पश्चात्, त्रिखण्ड-व्यापक तत्त्वत्रयका उन शिलाओंमें क्रमश: न्यास करे। बुद्धिसे लेकर चित्ततक, चित्तके भीतर मातृकातक और तन्मात्रासे लेकर पृथिवी पर्यन्त शिवतत्त्व, विद्यातत्त्व तथा आत्मतत्त्वकी स्थिति है। पुष्पमाला आदिसे चिह्नित स्थानों पर क्रमशः तीनों तत्त्वोंका अपने मन्त्रसे और तत्त्वेशोंका हृदय मन्त्रसे पूजन करे। पूजनके मन्त्र इस प्रकार हैं- 'ॐ हूं शिवतत्त्वाय नमः । ॐ हां शिवतत्त्वाधिपाय रुद्राय नमः । ॐ हां विद्यातत्त्वाय नमः । ॐ हां विद्यातत्त्वाधिपाय विष्णवे नमः । ॐ आत्मतत्त्वाय नमः ।ॐ आत्मतत्त्वाधिपतये ब्रह्मणे नमः ॥ ४१-४६ ॥

प्रत्येक तत्त्व और प्रत्येक शिलामें पृथ्वी, अग्नि, यजमान, सूर्य, जल, वायु, चन्द्रमा और आकाश - इन आठ मूर्तियोंका न्यास करे। फिर क्रमशः शर्व, पशुपति, उग्र, रुद्र, भव, ईश्वर (या ईशान), महादेव तथा भीम - इन मूर्तीश्वरोंका न्यास करे। मूर्तियों तथा मूर्तीश्वरोंके मन्त्र इस प्रकार हैं- 'ॐ धरामूर्तये नमः । ॐ धराधिपतये शर्वाय नमः । इसके बाद अनन्त आदि लोकपालोंका क्रमशः अपने मन्त्रों से न्यास करे। इन्द्र आदि लोकपालोंके बीज आगे बताये जानेवाले क्रमसे यों जानने चाहिये- लूं, रूं, यूं, खूं, श्रृं, खूं, खूं, हूं, क्षूं। यह नौ शिलाओंके पक्षमें बताया गया है। जब पाँच पदकी शिलाएँ हों, तब प्रत्येक तत्त्वमयी शिलामें स्पर्शपूर्वक पृथ्वी आदि पाँच मूर्तियोंका न्यास करे। उक्त मूर्तियोंके पाँच मूर्तीश इस प्रकार हैं- ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, ईश्वर और सदाशिव इन पाँचोंका उक्त पाँचों मूर्तियों में पूर्ववत् पूजन करना चाहिये ॥ ४७-५३ ॥

ॐ पृथिवीमूर्तये नमः ।'ॐ पृथिवीमूर्त्यधिपतये ब्रह्मणे नमः ।' इत्यादि मन्त्र पूजनके लिये जानने चाहिये। क्रमशः पाँच कलशोंका अपने नाम मन्त्रोंसे पूजन करके उन्हें स्थापित करे। मध्यशिलाके क्रमसे विधिपूर्वक न्यास करे। विभूति, कुशा और तिलोंसे अस्त्र मन्त्रद्वारा प्राकारकी कल्पना करे। कुण्डोंमें आधार शक्तिका न्यास और पूजन करके तत्त्वों, तत्त्वाधिपों, मूर्तियों तथा मूर्तीश्वरोंका घृत आदिसे तर्पण करे। तत्पश्चात् ब्रह्मात्म-शुद्धिके लिये मूलके अङ्गभूत ब्रह्म मन्त्रों द्वारा क्रमशः सौ-सौ आहुतियाँ देकर पूर्णाहुति- पर्यन्त होम करनेके पश्चात् शान्ति जलसे शिलाओंका प्रोक्षणपूर्वक पूजन करे । कुशाओंद्वारा स्पर्श करके प्रत्येक तत्त्वमें क्रमशः सांनिध्य और संधान करके फिर शुद्ध न्यास करे। इस प्रकार जा जाकर तीन भागों में कर्म करे । मन्त्र यों हैं- 'ॐ आम् ईम् आत्मतत्त्वविद्यातत्त्वाभ्यां नमः । इति ॥ ५४-६० ॥

कुशके मूल आदिसे क्रमशः तत्त्वेशादि तीनका स्पर्श करे। इसके बाद ह्रस्व-दीर्घके प्रयोगपूर्वक तत्त्वानुसंधान करे। इसके लिये मन्त्र यों है ॐ इं ऊं विद्यातत्त्वशिवतत्त्वाभ्यां नमः । तदनन्तर घी और मधुसे भरे हुए पञ्चरत्नयुक्त और पञ्चगव्यसे अग्रभागमें अभिषिक्त पाँच कलशोंका, जिनके देवता पञ्च लोकपाल हैं, - अपने मन्त्रोंसे पूजन करके उनके निकट होम करे फिर समस्त शिलाओंके अधिदेवताओंका ध्यान करे। 'वे शिलाधिदेवता विद्यास्वरूप हैं, स्नान कर चुके हैं। उनकी अङ्गकान्ति सुवर्णके समान उद्दीप्त होती है। वे उज्ज्वल वस्त्र धारण करते हैं और समस्त आभूषणोंसे सम्पन्न हैं।' न्यूनतादि दोष दूर करनेके लिये तथा वास्तु भूमिकी शुद्धिके लिये अस्त्र मन्त्रद्वारा पूर्णाहुति पर्यन्त सौ-सौ आहुतियाँ दे ॥ ६१ - ६५ ॥

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'प्रतिष्ठाके अङ्गभूत शिलान्यासकी विधिका वर्णन' नामक बानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२ ॥