अग्निदेव कहते हैं-
वसिष्ठ ! अब मैं सामान्य व्रतों और दानोंके विषय में संक्षेपपूर्वक कहता हूँ। प्रतिपदा आदि तिथियों, सूर्य आदि वारों, कृत्तिका आदि नक्षत्रों, विष्कुम्भ आदि योगों, मेष आदि राशियों और ग्रहण आदिके समय उस कालमें जो व्रत, दान एवं तत्सम्बन्धी द्रव्य एवं नियमादि आवश्यक हैं, उनका भी वर्णन करूँगा। व्रतदानोपयोगी द्रव्य और काल सबके अधिष्ठातृ देवता भगवान् श्रीविष्णु हैं। सूर्य, शिव, ब्रह्मा, लक्ष्मी आदि सभी देव-देवियाँ श्रीहरिकी ही विभूति हैं। इसलिये उनके उद्देश्यसे किया गया व्रत, दान और पूजन आदि सब कुछ देनेवाला होता है ॥ १-३॥
श्रीविष्णु पूजन- मन्त्र
जगत्पते समागच्छ आसनं पाद्यमघ्र्यकम् ॥
मधुपर्क तथाऽऽचामं स्त्रानं वस्त्रं च गन्धकम् ।
पुष्पं धूपं च दीपं च नैवेद्यादि नमोऽस्तु ते ॥
जगत्पते! आपको नमस्कार है। आइये और आसन, पाद्य, अर्घ्य, मधुपर्क, आचमन, स्नान, वस्त्र, गन्ध, पुष्प, धूप, दीप एवं नैवेद्य ग्रहण कीजिये ॥ ४-५ ॥
पूजा, व्रत और दानमें उपर्युक्त मन्त्रसे श्रीविष्णुकी अर्चना करनी चाहिये। अब दानका सामान्य संकल्प भी सुनो- 'आज मैं अमुक गोत्रवाले अमुक शर्मा आप ब्राह्मण देवताको समस्त पापोंकी शान्ति, आयु और आरोग्यक वृद्धि, सौभाग्यके उदय, गोत्र और संततिके विस्तार, विजय एवं धनकी प्राप्ति, धर्म, अर्थ और कामके सम्पादन तथा पापनाशपूर्वक संसार मोक्ष पानेके लिये विष्णुदेवता सम्बन्धी इस - द्रव्यका दान करता हूँ। मैं इस दानकी प्रतिष्ठा (स्थिरता) के लिये आपको यह अतिरिक्त - सुवर्णादि द्रव्य समर्पित करता हूँ। मेरे इस दानसे सर्वलोकेश्वर भगवान् श्रीहरि सदा प्रसन्न हों। यज्ञ, दान और व्रतोंके स्वामी! मुझे विद्या तथा यश आदि प्रदान कीजिये। मुझे धर्म, अर्थ, काम और मोक्षरूप चारों पुरुषार्थ तथा मनोऽभिलषित वस्तुसे सम्पन्न कीजिये ॥ ६ – १०३ ॥
जो मनुष्य प्रतिदिन इस व्रत दान- समुच्चयका अथवा श्रवण करता है, वह अभीष्ट पठन वस्तुसे युक्त एवं पापरहित होकर भोग और मोक्ष दोनोंको प्राप्त करता है। इस प्रकार भगवान् वासुदेव आदिसे सम्बन्धित नियम और पूजनसे अनेक प्रकारके तिथि, वार, नक्षत्र, संक्रान्ति, योग और मन्वादिसम्बन्धी व्रतोंका अनुष्ठान सिद्ध होता है ॥ ११-१२ ॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'व्रतदानसमुच्चयका वर्णन' नामक दो सौ आठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २०८ ॥
Summary of chapter 210 of the Agni Mahā Purana is as follows:
This chapter elaborates on how mantras attain siddhi through sustained japa. Agni explains the hierarchy of japa types: vācika (spoken aloud), upāṃśu (whispered), and mānasa (mental), the last being the most potent. The importance of choosing the correct devatā, ṛṣi, chandas, and bīja for each mantra is underscored. The chapter also discusses kavacha, kilaka, and hṛdaya as necessary aṅgas for the mantra to yield fruit.