भगवान् महेश्वर कहते हैं-
स्कन्द ! ( अब मैं संग्राममें विजय देनेवाले सूर्यदेवके पूजनकी विधि बताता हूँ।) ॐ डे ख ख्यां सूर्याय संग्रामविजयाय नमः । '- यह मन्त्र है। ह्रां ह्रीं हूं हें ह्रीं ह्रः – ये संग्राममें विजय देनेवाले सूर्यदेवकै छः अङ्ग हैं, अर्थात् इनके द्वारा षडङ्गन्यास करना चाहिये। यथा-'ह्रां हृदयाय नमः । ह्रीं शिर स्वाहा हूं शिखायै वषट् । हें कवचाय हुम् । ह्नों नेत्रत्रयाय वौषट् । ह्रः अस्त्राय फट् ॥ १-२॥
'ॐ हं खं खखोल्काय स्वाहा।' यह पूजाके लिये मन्त्र है। 'स्फूं हूं हूं कूं ॐ ह्रीं क्रेम्'– ये छः अङ्गन्यासके बीज मन्त्र हैं। पीठस्थान में प्रभूत, विमल, सार, आराध्य एवं परम सुखका पूजन करे। पीठके पायों तथा बीचकी चार दिशाओं में क्रमशः धर्म, ज्ञान, वैराग्य, ऐश्वर्य, अधर्म, अज्ञान, अवैराग्य तथा अनैश्वर्य – इन आठोंकी पूजा करे। तदनन्तर अनन्तासन, सिंहासन एवं पद्मासनकी पूजा करे। इसके बाद कमलकी कर्णिका एवं केसरोंकी, वहीं सूर्यमण्डल, सोममण्डल तथा अग्निमण्डलकी पूजा करे फिर दीप्ता, सूक्ष्मा, जया, भद्रा, विभूति, विमला, अमोघा, विद्युता तथा नवीं सर्वतोमुखी- इन नौ शक्तियोंका पूजन करे ॥ ३-६ ॥
तत्पश्चात् सत्त्व, रज और तमका, प्रकृति और पुरुषका, आत्मा, अन्तरात्मा और परमात्माका पूजन करे। ये सभी अनुस्वारयुक्त आदि अक्षर युक्त होकर अन्तमें 'नमः' के साथ चतुर्थ्यन्त होनेपर पूजाके मन्त्र हो जाते हैं। यथा— 'सं सत्त्वाय नमः । अं अन्तरात्मने नमः ।' इत्यादि । इसी तरह उषा, प्रभा, संध्या, साया, माया, बला, बिन्दु विष्णु तथा आठ द्वारपालोंकी पूजा करे। इसके बाद गन्ध आदिसे सूर्य, चण्ड और प्रचण्डका पूजन करे। इस प्रकार पूजा तथा जप, होम आदि करनेसे युद्ध आदिमें विजय प्राप्त होती है ॥ ७–९ ॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'संग्राम विजयदायक सूर्यदेवकी पूजाका वर्णन' नामक एक सौ अड़तालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १४८ ॥
Summary of chapter 150 of the Agni Mahā Purana is as follows:
The fourteen Manvantaras—the vast cosmic time-cycles each presided over by a Manu—are described. Agni names each Manu from Svāyaṃbhuva through Bhauma, along with the associated Indra, Saptarṣis, and principal devatā-gaṇas of each period. The current Vaivasvata Manvantara, the seventh, is identified as the present age. The astronomical and cosmological details of each Manvantara's duration (approximately 306 million years) and the divine governance structure are given. The chapter situates the reader within the immense sweep of cosmic time as conceived in Purāṇic cosmology.