अग्निदेव कहते हैं-
वसिष्ठ ! अब मैं 'पृथ्वीदान के विषयमें कहता हूँ। 'पृथ्वी' तीन प्रकारकी मानी गयी है। सौ करोड़ योजन विस्तारवाली सप्तद्वीपवती समुद्रोंसहित जम्बूद्वीपपर्यन्त पृथ्वी उत्तम मानी गयी है। उत्तम पृथ्वीकी पाँच भार सुवर्णसे रचना करे। उसके आधेमें कूर्म एवं कमल बनवाये। यह 'उत्तम पृथ्वी' बतलायी गयी है। इसके आधेमें 'मध्यम पृथ्वी मानी जाती है। इसके तीसरे भागमें निर्मित पृथ्वी 'कनिष्ठ' मानी गयी है। इसके साथ पृथ्वीके तीसरे भागमें कूर्म और कमलका निर्माण करना चाहिये ॥ १-३३॥
एक हजार पल सुवर्णसे मूल, दण्ड, पत्ते, फल, पुष्प और पाँच स्कन्धोंसे युक्त कल्पवृक्षकी कल्पना करे। विद्वान् ब्राह्मण यजमानके द्वारा संकल्प कराके पाँच ब्राह्मणोंको इसका दान करावे। इसका दान करनेवाला ब्रह्मलोकमें पितृगणोंके साथ चिरकालतक आनन्दका उपभोग करता है। पाँच सौ पल सुवर्णसे कामधेनुका निर्माण कराके विष्णुके सम्मुख दान करे। ब्रह्मा, विष्णु एवं शिव आदि समस्त देवता गौमें प्रतिष्ठित हैं। धेनुदान करनेसे अपने-आप समस्त दान हो जाते हैं। यह सम्पूर्ण अभीष्ट कामनाओंको सिद्ध करनेवाला एवं ब्रह्मलोककी प्राप्ति करानेवाला है। श्रीविष्णुके सम्मुख कपिला गौका दान करनेवाला अपने सम्पूर्ण कुलका उद्धार कर देता है। कन्याको अलंकृत करके दान करनेसे अश्वमेध यज्ञके फलकी प्राप्ति होती है। जिसमें सभी प्रकारके सस्य (अनाजोंके पौधे) उपज सकें, ऐसी भूमिका दान देकर मनुष्य सब कुछ प्राप्त कर लेता है। ग्राम, नगर अथवा खेटक (छोटे गाँव) का दान देनेवाला सुखी होता है। कार्तिककी पूर्णिमा 14 आदिमें वृषोत्सर्ग करनेवाला अपने कुलका उद्धार कर देता है ॥ ४–१०॥
इस प्रकार आदि आग्नेय मेहापुराणमें 'पृथ्वीदानका वर्णन' नामक दो सौ तेरहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २१३ ॥
Summary of chapter 215 of the Agni Mahā Purana is as follows:
The worship of Devī in her various forms — Mahākālī, Mahālakṣmī, Mahāsarasvatī — is described according to the Śākta tantra tradition. The Navāvaraṇa pūjā of Śrī Yantra and the recitation of the Devī Māhātmya are prescribed. Agni describes the Kumārī pūjā, in which young girls are honored as living embodiments of the goddess. Offerings of red flowers, saffron, and sindūra are prescribed, and the chapter emphasizes that Devī worship bestows both bhukti and mukti.