अग्नि महा पुराण

333- अर्धसमवृत्तोंका वर्णन

अग्निदेव कहते हैं―

जिसके प्रथम चरणमें तीन सगण, एक लघु और एक गुरु (कुल ग्यारह अक्षर) हों, दूसरे चरणमें तीन भगण एवं दो गुरु हों तथा पूर्वार्धके समान ही उत्तरार्ध भी हो, वह 'उपचित्रक' नामक छन्द है। जिसके प्रथम पादमें तीन भगण एवं दो गुरु हों और द्वितीय पादमें एक नगण (III), दो जगण एवं एक जगण हो, वह द्रुतमध्या नामक छन्द होता है। [ यहाँ भी प्रथम पादके समान तृतीय पाद और द्वितीय पादके समान चतुर्थ पाद जानना चाहिये। यही बात आगेके छन्दोंमें भी स्मरण रखनेयोग्य है।] जिसके प्रथम चरणमें तीन सगण और एक गुरु तथा द्वितीय चरणमें तीन भगण एवं दो गुरु हों, उस छन्दका नाम 'वेगवती' है। जिसके पहले पादमें तगण , जगण , रगण और एक गुरु तथा दूसरे चरणमें मगण , सगण , जगण एवं दो गुरु हों, वह 'भद्रविराट्' नामक छन्द है। जिसके प्रथम पादमें सगण, जगण, सगण और एक गुरु तथा द्वितीय पादमें भगण, रगण, नगण और दो गुरु हों, उसका नाम 'केतुमती' है। जिसके पहले चरणमें दो तगण, एक जगण और दो गुरु हों तथा दूसरे चरणमें जगण, तगण, जगण एवं दो गुरु हों, उसे 'आख्यानिकी'( भृङ्गावलीमङ्गलगीतनादैर्जनस्य चित्ते मुदमादधाति । आख्यानिकी च स्मरजन्मपाशमहोत्सवस्याश्रवणे क्वणन्ती ॥)कहते हैं। इसके विपरीत यदि प्रथम चरणमें जगण, तगण, जगण एवं दो गुरु हों और द्वितीय चरणमें दो तगण, एक जगण तथा दो गुरु हों तो उसकी 'विपरीताख्यानकी '(अलं तवालीकवचोभिरेभिः स्वार्थ प्रिये साधय कार्यमन्यत् । कथं कथावर्णनकौतुकं स्यादाख्यानिकी चेद् विपरीतवृत्तिः ॥ आख्यानिकीके दोनों भेद उपजातिके अन्तर्गत हैं। यहाँ विशेष संज्ञा-विधानके लिये पढ़े गये हैं।)

संज्ञा होती है। जिसके पहले पादमें तीन सगण, एक लघु और एक गुरु हों तथा दूसरेमें नगण, भगण, भगण एवं रंगण मौजूद हों, उस छन्दका नाम 'हरिणप्लुता' (तव मुञ्ज नराधिप विद्विषां भयविवर्जितकेतुलघीयसाम् । रणभूमिपराङ्मुखवर्त्मनां भवति शीघ्रगतिर्हरिणीप्लुता ॥) है । जिसके प्रथम चरणमें दो नगण, एक रगण, एक लघु और एक गुरु हो तथा दूसरे चरणमें एक नगण, दो जगण और एक रगण हो, वह 'अपरवक्त्र' ('अपरवक्त्र' नामक छन्द 'वैतालीय' छन्दके अन्तर्गत है; फिर भी विशेष संज्ञा-विधानके लिये यहाँ पढ़ा गया है। उदाहरण सकृदपि कृपणेन चक्षुषा नरवर पश्यति यस्तवाननम् । न पुनरपरवक्त्रमीक्षते स हि सुखितोऽर्थिजनस्तथाविधः ॥) नामक छन्द है। जिसके प्रथम पादमें दो नगण, एक रगण और एक यगण हो तथा दूसरेमें एक नगण, दो जगण, एक रगण और एक गुरु हो, उसका नाम 'पुष्पिताग्रा' (यह छन्द औपच्छन्दसक के अन्तर्गत है, तो भी विशेष संज्ञा देनेके लिये इस प्रकरणमें इसका पाठ किया गया है। उदाहरण समसितदशना मृगायताक्षी स्मितसुभगा प्रियवादिनी विदग्धा । अपहरति नृणां मनांसि रामा भ्रमरकुलानि लतेव पुष्पिताग्रा ॥) है। जिसके पहले चरणमें रगण, जगण, रगण, जगण हो तथा दूसरेमें जगण, रगण, जगण, रगण और एक गुरु हो उसे 'यवमती' (पद्मकं तु कोमले करे विभाति प्रशस्तमत्स्यलाञ्छनं च पदे यस्याः। सा यवान्विता भवेद्धनाधिका च समस्तबन्धुपूजिता प्रिया च पत्युः॥)

कहते हैं। जिसके प्रथम और तृतीय चरणोंमें अट्ठाईस लघु और अन्तमें एक गुरु हो तथा दूसरे एवं चौथे चरणोंमें तीस लघु एवं एक गुरु हो तो उसका नाम 'शिखा' (अभिमतबकुलकुसुमघनपरिमलमिलदलिमुखरितहरिति मधौ सहचरमलयपवनरयतरलितसरसिजरजसि शयतरणि वितते । विकसित विविधकुसुमसुलभसुरभिशरमदननिहतसकलजने ज्वलयति मम हृदयमविरतमिह सुतनु तब विरहदहनविषमशिखा ॥) होता है। इसके विपरीत यदि प्रथम ७ और तृतीय चरणोंमें तीस लघु और एक गुरु हो तथा द्वितीय एवं चतुर्थ चरणोंमें अट्ठाईस लघु साथ एक गुरु हो तो उसे 'खञ्जा'('शिखा' छन्दके ही समान 'खझा'का भी उदाहरण होगा। उसका सम इसका विषम होगा और उसका विषम इसका सम होगा।) कहते हैं। अब 'समवृत्त' का दिग्दर्शन कराया जाता है ॥ १-६॥

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'अर्धसमवृत्तका वर्णन' नामक तीन सौ तैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३३३ ॥