अग्निदेव कहते हैं-
मुनिवर ! अब मैं सामान्यतः नामलिङ्गोंका वर्णन करूँगा (इस प्रकरणमें आये हुए शब्द प्रायः ऐसे होंगे, जो अपने विशेष्यके अनुसार तीनों लिङ्गोंमें प्रयुक्त हो सकते हैं), आप उन्हें ध्यान देकर सुनें। सुकृति, पुण्यवान् और धन्य- ये शब्द पुण्यात्मा और सौभाग्यशाली पुरुषके लिये आते हैं। जिनकी अभिलाषा, आशय या अभिप्राय महान् हो, उन्हें महेच्छ और महाशय कहते हैं। (जिनके हृदय शुद्ध, सरल, कोमल, दयालु एवं भावुक हों, वे हृदयालु, सहृदय और सुहृदय कहलाते हैं।) प्रवीण, निपुण, अभिज्ञ, विज्ञ, निष्णात और शिक्षित - सुयोग्य एवं कुशलके अर्थमें आते हैं। वदान्य, स्थूललक्ष, दानशौण्ड और बहुप्रद- ये अधिक दान करनेवालेके वाचक हैं। कृती, कृतज्ञ और कुशल- ये भी प्रवीण, चतुर एवं दक्षके ही अर्थमें आते हैं। आसक्त, उद्युक्त और उत्सुक ये उद्योगी एवं कार्यपरायण पुरुषके लिये प्रयुक्त होते हैं। अधिक धनवान्को इभ्य और आढ्य कहते हैं। परिवृढ, अधिभू, नायक और अधिप – ये स्वामीके वाचक हैं। लक्ष्मीवान्, लक्ष्मण तथा श्रील- ये शोभा और श्रीसे सम्पन्न पुरुषके अर्थमें आते हैं। स्वतन्त्र, स्वैरी और अपावृत शब्द स्वाधीन अर्थके बोधक हैं। खलपू और बहुकर - खलिहान या मैदान साफ करनेवाले पुरुषके अर्थमें आते हैं। दीर्घसूत्र और चिरक्रिय - ये आलसी तथा बहुत विलम्बसे काम पूरा करनेवाले पुरुषके बोधक हैं। बिना विचारे काम करनेवालेको जाल्म और असमीक्ष्यकारी कहते हैं। जो कार्य करनेमें ढीला हो, वह कुण्ठ कहलाता है। कर्मशूर और कर्मठ-ये उत्साहपूर्वक कर्म करनेवालेके वाचक हैं। खानेवालेको भक्षक, घस्मर और अद्यर कहते हैं। लोलुप, गर्धन और गृध्नु- ये लोभीके पर्याय हैं। विनीत और प्रश्रित ये विनययुक्त पुरुषका बोध करानेवाले हैं। धृष्णु और वियात ये धृष्टके लिये प्रयुक्त - होते हैं। प्रतिभाशाली पुरुषके अर्थमें निभृत और प्रगल्भ शब्दका प्रयोग होता है। भीरुक और भीरु- डरपोकके, बन्दारु और अभिवादक प्रणाम करनेवालेके, भूष्णु, भविष्णु और भविता होनेवालेके तथा ज्ञाता, विदुर और विन्दुक - ये जानकारके वाचक हैं। मत्त, शौण्ड, उत्कट और क्षीब- ये मतवालेके अर्थमें आते हैं (क्षीब शब्द नान्त भी होता है, इसके क्षीबा, क्षीबाणौ, क्षीबाणः इत्यादि रूप होते हैं)। चण्ड और अत्यन्त कोपन- ये अधिक क्रोध करनेवाले पुरुषके बोधक हैं। देवताओंका अनुसरण करनेवालेको देवद्र्यङ् और सब ओर जानेवालेको विष्वद्र्यङ् कहते हैं। इसी प्रकार साथ चलनेवाला सध्यङ् और तिरछा चलनेवाला तिर्यङ् कहलाता है। वाचोयुक्ति पटु, वाग्मी और वावदूक – ये कुशल - वक्ताके अर्थमें प्रयुक्त होते हैं। बहुत अनाप शनाप बकनेवालेको जल्पाक, वाचाल, वाचाट और बहुगर्ह्यवाक् कहते हैं। अपध्वस्त और धिकृत – ये धिक्कारे हुए पुरुषके वाचक हैं। - कीलित और संयत शब्द बद्ध (बँधे हुए) का - बोध करानेवाले हैं ॥ १-१०॥
रवण और शब्दन- ये आवाज करनेवाले के अर्थमें आते हैं। (नाटक आदिके आरम्भमें जो मङ्गलके लिये आशीर्वादयुक्त स्तुतिका पाठ किया जाता है, उसका नाम नान्दी है।) नान्दीपाठ करनेवालेको नान्दीवादी और नान्दीकर कहते हैं। व्यसनार्त और उपरक्त- ये पीड़ितके अर्थ में आते हैं। विहस्त और व्याकुल- ये शोकाकुल पुरुषका बोध करानेवाले हैं। नृशंस, क्रूर, घातक और पाप ये दूसरोंसे द्रोह करनेवाले निर्दय मनुष्यके वाचक हैं। ठगको धूर्त और वञ्चक कहते हैं। वैदेह (वैधेय) और वालिश - ये मूर्खके वाचक हैं। कृपण और क्षुद्र- ये कदर्य (कंजूस) के अर्थमें प्रयुक्त होते हैं। मार्गण, - याचक और अर्थी- ये याचना करनेवाले के अर्थमें आते हैं। अहंकारीको अहंकारवान् और अहंयु तथा शुभके भागीको शुभान्वित और शुभंयु कहते हैं। कान्त, मनोरम और रुच्य – ये सुन्दर अर्थके वाचक हैं हृद्य, अभीष्ट और अभीप्सित ये प्रियके समानार्थक शब्द हैं। असार, फल्गु तथा शून्य- ये निस्सार अर्थका बोध करानेवाले हैं। मुख्य वर्य, वरेण्यक, श्रेयान्, श्रेष्ठ और पुष्कल- ये श्रेष्ठके वाचक हैं। प्राप्य, अग्रय, अग्रीय तथा अग्रिय शब्द भी इसी अर्थमें आते हैं। वडू, उरु और विपुल- ये विशाल अर्थके बोधक हैं। पीन, पीवन, स्थूल और पीवर- ये स्थूल या मोटे अर्थका बोध करानेवाले हैं। स्तोक, अल्प, क्षुल्लक, सूक्ष्म, श्लक्ष्ण, दभ्र, कृश, तनु, मात्रा, त्रुटि, लव और कण ये स्वल्प या सूक्ष्म अर्थके वाचक हैं। भूयिष्ठ, पुरुह और पुरु- ये अधिक अर्थके बोधक हैं। अखण्ड, पूर्ण और सकल- ये समग्रके वाचक हैं। उपकण्ठ, अन्तिक, अभितः, संनिधि और अभ्याश- ये समीपके अर्थमें आते हैं। अत्यन्त निकटको नेदिष्ठ कहते हैं। बहुत दूरके अर्थमें दविष्ठ शब्दका प्रयोग होता है। वृत्त, निस्तल और वर्तुल- ये गोलाकारके वाचक हैं। उच्च प्रांशु, उन्नत और उदग्र ये ऊँचाके - अर्थमें आते हैं। ध्रुव, नित्य और सनातन- ये नित्य अर्थके बोधक हैं। आविद्ध, कुटिल भुग्न, वेल्लित और वक्र— ये टेढ़ेका बोध करानेवाले हैं। चञ्चल और तरल- ये चपलके अर्थमें आते हैं। कठोर, जरठ और दृढ़-ये समानार्थक शब्द हैं। प्रत्यग्र, अभिनव, नव्य, नवीन, नूतन और नव-ये नयेके अर्थमें आते हैं। एकतान और अनन्यवृत्ति – ये एकाग्रचित्तवाले पुरुषके बोधक - हैं। उच्चण्ड और अविलम्बित – ये फुर्तीके - वाचक हैं। उच्चावच और नैकभेद- ये अनेक प्रकारके अर्थमें आते हैं। सम्बाध और कलित ये संकीर्ण एवं गहनके बोधक हैं। तिमित, स्तिमित और क्लिन्न - ये आर्द्र या भीगे हुए अर्थमें आते हैं। अभियोग और अभिग्रह - ये दूसरेपर किये हुए दोषारोपणके नाम हैं। स्फाति शब्द वृद्धिके और प्रथा शब्द ख्यातिके अर्थमें आता है। समाहार और समुच्चय- ये समूहके वाचक हैं। अपहार और अपचय - ये ह्रासका बोध करानेवाले हैं। विहार और परिक्रम- ये घूमनेके अर्थमें आते हैं। प्रत्याहार और उपादान ये इन्द्रियोंको विषयोंसे हटानेके अर्थमें प्रयुक्त होते हैं। निर्हार तथा अभ्यवकर्षण- ये शरीरमें धँसे हुए शस्त्रादिको युक्तिपूर्वक निकालनेके अर्थमें आते हैं। विघ्न, अन्तराय और प्रत्यूह - ये विघ्नका बोध करानेवाले हैं। आस्या आसना और स्थिति – ये बैठनेकी क्रियाके बोधक हैं। - संनिधि और संनिकर्ष- ये समीप रहनेके अर्थमें प्रयुक्त होते हैं। किलेमें प्रवेश करनेकी क्रियाको संक्रम और दुर्गसंचर कहते हैं। उपलम्भ और अनुभव- ये अनुभूतिके नाम हैं। प्रत्यादेश और निराकृति- ये दूसरेके मतका खण्डन करनेके अर्थमें आते हैं। परिरम्भ, परिष्वङ्ग, संश्लेष और उपगूहन- ये आलिङ्गनके अर्थमें प्रयुक्त होते हैं। पक्ष (जहाँ साध्यका संदेह हो अर्थात् जहाँ किसी वस्तुको सिद्ध करनेकी चेष्टा की जा रही हो उसको 'पक्ष' कहते हैं तथा साध्यको - सिद्ध करनेके लिये जो युक्ति दी जाती है, उसे 'हेतु' कहते हैं। जैसे 'पर्वतो वह्निमान् धूमवत्वात्' (पर्वतपर आग है; क्योंकि वहाँ धुँआ उठता है)। यहाँ वह्नि साध्य, पर्वत पक्ष और धूम हेतु है।) और हेतु आदिके द्वारा निश्चित होनेवाले ज्ञानका नाम अनुमा या अनुमान है। बिना हथियारकी लड़ाई तथा भयभीत होनेपर किये हुए शब्दका नाम डिम्ब, भ्रमर (या डमर) तथा विप्लव है। शब्दके द्वारा जो परोक्ष अर्थका ज्ञान होता है, उसे शाब्दज्ञान कहते हैं। समानता देखकर जो उसके तुल्यवस्तुका बोध होता है, उसका नाम उपमान है। जहाँ कोई कार्य देखकर कारणका निश्चय किया जाय, अर्थात् अमुक कारणके बिना यह कार्य नहीं हो सकता - इस प्रकार विचार करके जो दूसरी वस्तु अर्थात् कारणका ज्ञान प्राप्त किया जाय, उसे अर्थापत्ति कहते हैं। प्रतियोगीका ग्रहण न होनेपर जो ऐसा कहा जाता है कि 'अमुक वस्तु पृथ्वीपर नहीं है, उसका नाम अभाव है। इस प्रकार मनुष्योंका ज्ञान बढ़ानेके लिये मैंने नाम और लिङ्ग-स्वरूप श्रीहरिका वर्णन किया है ॥ ११ - २८ ॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'कोशगत सामान्य नामलिङ्गोंका कथन' नामक तीन सौ सड़सठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३६७ ॥
Summary of chapter 369 of the Agni Mahā Purana is as follows:
The ātyantika pralaya — final liberation through jñāna — is described: the jñānī whose ignorance is dissolved ceases the cycle of rebirth permanently. The chapter then turns to the suffering that makes liberation desirable: the three types of sorrow — ādhyātmika (arising from one's own body and mind), ādhidaivika (arising from divine causes such as weather and epidemic), and ādhibhautika (arising from other beings). The formation of the embryo (garbha) in the womb is detailed, with the stages of development from the union of śukra and śoṇita through the appearance of the five senses. The three constitutional types (vāta, pitta, kapha), the seven dhātus (rasa, rakta, māṃsa, meda, asthi, majjā, śukra), the six skin layers, the seven kalās (membranes), and the total counts of bones, joints, veins, and muscles are enumerated, showing the elaborate precision of Āyurvedic embryology.