अग्निदेव कहते हैं-
अब मैं सब तीर्थोंका माहात्म्य बताऊँगा, जो भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाला है। जिसके हाथ, पैर और मन भलीभाँति संयममें रहें तथा जिसमें विद्या, तपस्या और उत्तम कीर्ति हो, वही तीर्थके पूर्ण फलका भागी होता है। जो प्रतिग्रह छोड़ चुका है, नियमित भोजन करता और इन्द्रियोंको काबू में रखता है, वह पापरहित तीर्थयात्री सब यज्ञोंका फल पाता है। जिसने कभी तीन राततक उपवास नहीं किया; तीर्थोकी यात्रा नहीं की और सुवर्ण एवं गौका दान नहीं किया, वह दरिद्र होता है। यज्ञसे जिस फलकी प्राप्ति होती है, वही तीर्थ - सेवनसे भी मिलता है ( ...........। यस्य हस्तौ च पादौ च मनश्चैव सुसंयतम् ॥ विद्या तपश्च कीर्तिश्च स तीर्थफलमनुते । प्रतिग्रहादुपावृत्तो लघ्वाहारो जितेन्द्रियः।निष्पापस्तीर्थयात्री तु सर्वयज्ञफलं लभेत् । अनुपोष्य त्रिरात्राणि तीर्थान्यनभिगम्य च ॥ अदत्त्वा काञ्चनं गाश्च दरिद्रो नाम जायते । तीर्थाभिगमने तत्स्याद्यद्यज्ञेनाऽऽष्यते फलम् ॥ (अग्नि० १०९।१-४) ॥ १-४॥)
ब्रह्मन् ! पुष्कर श्रेष्ठ तीर्थ है। वहाँ तीनों संध्याओंके समय दस हजार कोटि तीर्थोका निवास रहता है। पुष्करमें सम्पूर्ण देवताओंके साथ ब्रह्माजी निवास करते हैं। सब कुछ चाहनेवाले मुनि और देवता वहाँ स्नान करके सिद्धि प्राप्त कर चुके हैं। पुष्करमें देवताओं और पितरोंकी पूजा करनेवाले मनुष्य अश्वमेधयज्ञका फल प्राप्त करके ब्रह्मलोकमें जाते हैं। जो कार्तिककी पूर्णिमाको वहाँ अन्नदान करता है, वह शुद्धचित्त होकर ब्रह्मलोकका भागी होता है। पुष्करमें जाना दुष्कर है, पुष्करमें तपस्याका सुयोग मिलना दुष्कर है, पुष्करमें दानका अवसर प्राप्त होना भी दुष्कर है और वहाँ निवासका सौभाग्य होना तो अत्यन्त ही दुष्कर है। वहाँ निवास, जप और श्राद्ध करनेसे मनुष्य अपनी सौ पीढ़ियोंका उद्धार करता है। वहीं जम्बूमार्ग तथा तण्डुलिकाश्रम तीर्थ भी हैं ॥ ५ - ९॥
(अब अन्य तीर्थोके विषयमें सुनो - ) कण्वाश्रम, कोटितीर्थ, नर्मदा और अर्बुद (आबू) भी उत्तम तीर्थ हैं। चर्मण्वती (चम्बल), सिन्धु, सोमनाथ, प्रभास, सरस्वती समुद्र-संगम तथा सागर भी श्रेष्ठ तीर्थ हैं। पिण्डारक क्षेत्र, द्वारका और गोमती- ये सब प्रकारकी सिद्धि देनेवाले तीर्थ हैं। भूमितीर्थ, ब्रह्मतुङ्गतीर्थ और पञ्चनद (सतलज आदि पाँचों नदियाँ) भी उत्तम हैं। भीमतीर्थ, गिरीन्द्रतीर्थ, पापनाशिनी देविका नदी, पवित्र विनशनतीर्थ (कुरुक्षेत्र), नागोद्भेद, अघार्दन तथा कुमारकोटि तीर्थ- ये सब कुछ देनेवाले बताये गये हैं। 'मैं कुरुक्षेत्र जाऊँगा, कुरुक्षेत्र में निवास करूँगा' जो सदा ऐसा कहता है, वह शुद्ध हो जाता है और उसे स्वर्गलोककी प्राप्ति होती है। वहाँ विष्णु आदि देवता रहते हैं। वहाँ निवास करनेसे मनुष्य श्रीहरिके धाममें जाता है। कुरुक्षेत्र में समीप ही सरस्वती बहती हैं। उसमें स्नान करनेवाला मनुष्य ब्रह्मलोकका भागी होता है। कुरुक्षेत्रकी धूलि भी परम गतिकी प्राप्ति कराती है। धर्मतीर्थ, सुवर्णतीर्थ, परम उत्तम गङ्गाद्वार (हरिद्वार), पवित्र तीर्थ कनखल, भद्रकर्ण-हद, गङ्गा-सरस्वती-संगम | और ब्रह्मावर्त—ये पापनाशक तीर्थ हैं ॥ १०- १७॥
भृगुतुङ्ग, कुब्जाम्र तथा गङ्गोद्भेद- ये भी पापोंको दूर करनेवाले हैं। वाराणसी (काशी) सर्वोत्तम तीर्थ है। उसे श्रेष्ठ अविमुक्त क्षेत्र भी कहते हैं। कपालमोचनतीर्थ भी उत्तम है, प्रयाग तो सब तीर्थोका राजा ही है। गोमती और गङ्गाका संगम भी पावन तीर्थ है। गङ्गाजी कहीं भी क्यों न हों, सर्वत्र स्वर्गलोककी प्राप्ति करानेवाली हैं। राजगृह पवित्र तीर्थ है। शालग्राम तीर्थ पापोंका नाश करनेवाला है। वटेश वामन तथा कालिका संगम तीर्थ भी उत्तम हैं ॥ १८-२० ।।
लौहित्य-तीर्थ, करतोया नदी, शोणभद्र तथा ऋषभतीर्थ भी श्रेष्ठ हैं। श्रीपर्वत, कोलाचल, सह्यगिरि, मलयगिरि, गोदावरी, तुङ्गभद्रा, वरदायिनी कावेरी नदी, तापी, पयोष्णी, रेवा (नर्मदा) और दण्डकारण्य भी उत्तम तीर्थ हैं। कालंजर, मुझवट, शूर्पारक, मन्दाकिनी, चित्रकूट और शृङ्गवेरपुर श्रेष्ठ तीर्थ हैं। अवन्ती भी उत्तम तीर्थ है। अयोध्या सब पापोंका नाश करनेवाली है। नैमिषारण्य परम पवित्र तीर्थ है। वह भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाला है ॥ २१ - २४ ॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'तीर्थमाहात्म्य वर्णन' नामक एक सौ नौवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १०९ ॥
Summary of chapter 110 of the Agni Mahā Purana is as follows:
Propitiatory rites for the nine grahas (Sūrya through Ketu) are detailed to counteract adverse planetary periods (daśā, antarā). Each graha receives worship with characteristic colours, flowers, grains, and samidhs: Sūrya with red flowers and arka-samidh, Candra with white lotus and palāśa, Maṅgala with red khadira, and so forth. The mantra-counts for each graha-japa and the prescribed dāna items (cow, horse, black goat) are given in sequence. Regular graha-śānti removes disease, debt, and premature death.