अग्निदेव कहते हैं-
वसिष्ठ! 'शब्दार्थालंकार' शब्द और अर्थ दोनोंको समानरूपसे अलंकृत करता है; जैसे एक ही अङ्गमें धारण किया हुआ हार कामिनीके कण्ठ एवं कुचमण्डलकी कान्तिको बढ़ा देता है। 'शब्दार्थालंकार' के छः भेद काव्यमें उपलब्ध होते हैं- प्रशस्ति, कान्ति, औचित्य, संक्षेप, यावदर्थता तथा अभिव्यक्ति दूसरोंके मर्मस्थलको द्रवीभूत करनेवाले वाक्-कौशलको 'प्रशस्ति' कहते हैं। वह प्रशस्ति 'प्रेमोक्ति' एवं 'स्तुति' के भेदसे दो प्रकारकी मानी गयी है। प्रेमोक्ति और स्तुतिके पर्यायवाचक शब्द क्रमशः 'प्रियोक्ति' एवं 'गुण-कीर्तन' हैं। वाच्य वाचककी सर्वसम्मत एवं रुचिकर संगतिको 'कान्ति' कहते हैं। यदि ओज एवं माधुर्ययुक्त संदर्भमें वस्तुके अनुसार रीति एवं वृत्तिके अनुसार रसका प्रयोग हो तो औचित्यका प्रादुर्भाव होता है। अल्पसंख्यक शब्दोंसे अर्थ-बाहुल्यका संग्रह 'संक्षेप' तथा शब्द एवं वस्तुका अन्यूनाधिक्य 'यावदर्थता' कहा जाता है। अर्थ प्राकट्यको अभिव्यक्ति' कहते हैं। उसके दो भेद हैं- ' श्रुति' और 'आक्षेप'।शब्दके द्वारा अपने अर्थका उद्घाटन 'श्रुति' कहा जाता है। श्रुतिके दो भेद हैं- 'नैमित्तिकी' और 'पारिभाषिकी'। 'संकेत' को परिभाषा कहते हैं।परिभाषाके सम्बन्धसे ही वह पारिभाषिकी है।
पारिभाषिकीको मुख्या' और नैमित्तिकीको 'औपचारिकी' कहते हैं। [ये ही क्रमशः 'अभिधा' और 'लक्षणा' हैं।] उस औपचारिकीके भी दो भेद हैं। जिसके द्वारा अभिधेय अर्थसे स्खलित हुआ शब्द किसी निमित्तवश अमुख्य अर्थका बोधक होता है, वह वृत्ति 'औपचारिकी' है। ये ही दोनों भेद नैमित्तिकीके भी होते हैं। वह लक्षणायोगसे 'लाक्षणिकी' और गुणयोगसे 'गौणी' कहलाती है। अभिधेय अर्थके साथ सम्बद्ध रहकर जो अन्यार्थकी प्रतीति होती है, उसको 'लक्षणा' कहते हैं। अभिधेयके साथ सम्बन्ध, सामीप्य, समवाय, वैपरीत्य एवं क्रियायोगसे लक्षणा पाँच प्रकारकी मानी जाती है। गुणोंकी अनन्तता होनेसे उनकी विवक्षाके कारण गौणीके अनन्त भेद हो जाते हैं। लोकसीमाके पालनमें तत्पर कविद्वारा जब अप्रस्तुत वस्तुके धर्म प्रस्तुत वस्तुपर सम्यग्रूपसे आहित- आरोपित किये जाते हैं, तब उसे 'समाधि' (अग्निपुराणमें 'समाधि' का जो लक्षण किया गया है, वह भरतमुनिके निम्नाङ्कित श्लोकपर आधारित है―
अभियुक्तैर्विशेषस्तु योऽर्थस्यैवोपलभ्यते। तेन चार्थेन सम्पन्नः समाधिः परिकीर्त्यते ॥ (नाट्य० १६।१०२) दण्डीने अग्निपुराणोक्त लक्षणको अविकलरूपसे अपने ग्रन्थमें ले लिया है। वामनने आरोहावरोहक्रमरूप 'समाधि'को शब्दगुण स्वीकार किया है, किंतु भोजराजने अग्निपुराण और दण्डीके ही भावको लेकर समाधिः सोऽन्यधर्माणां यदन्यत्राधिरोपणम् । यह लक्षण लिखा है। वाग्भट्टने भी यही बात कही है-'अन्यस्य धर्मो यत्रान्यत्रारोप्यते स समाधिः ।)कहते हैं। जिसके द्वारा श्रुतिसे अनुपलब्ध अर्थ चैतन्ययुक्त होकर भासि होता है, वह 'आक्षेप' (यहाँ आक्षेपको ध्वनिरूप बताया गया है क्योंकि उससे अर्थविशेषका ध्वनन होता है।) कहा जाता है। इसको 'ध्वनि' भी माना गया है; क्योंकि वह ध्वनिसे ही व्यक्त होता है। इसमें ध्वनिके आश्रयसे शब्द और अर्थके द्वारा स्वतः संकलित अर्थ ही व्यञ्जित होता है। अभीष्ट कथनका विशेष विवक्षासे अर्थात् उसमें और भी उत्कर्षकी प्रतीति कराने के लिये जो प्रतिषेध-सा होता है, उसको 'आक्षेप' (यह आक्षेपालंकार'का लक्षण है। आचार्य मम्मटने भी इसी भावका आश्रय लेकर कहा है कि निषेधो वक्कुमिष्टस्य यो विशेषाभिधित्सया वक्ष्यमाणोक्तविषयः स आक्षेपो द्विधा मतः ॥
इस लक्षणमें उक्त विषय और वक्ष्यमाण विषयके भेदसे आक्षेपके दो प्रकार बताये गये हैं।) कहते हैं। अधिकार (प्रकरण) से पृथक्, अर्थात् अप्रकृत या अप्रस्तुत अन्य वस्तुकी जो स्तुति की जाती है, उसे 'अस्तुतस्तोत्र' (इस अस्तुत-स्तोत्रको ही परवर्ती आलंकारिकोंने 'अप्रस्तुतप्रशंसा' नाम दिया है; इसी को 'अन्योक्ति' भी कहते हैं। अग्निपुराणमें जो लक्षण दिया गया है, उसीको भामहने अविकलरूपसे उद्धृत किया है। अन्तर इतना ही है कि वे 'अस्तुतस्तोत्र के स्थानमें 'अप्रस्तुतप्रशंसा लिखते हैं। उनका लक्षण इस प्रकार है अधिकारादपेतस्य वस्तुनोऽन्यस्य या स्तुतिः । अप्रस्तुतप्रशंसेति सा चैवं कथ्यते यथा ॥(३।२९)
दण्डीने इसी भावको संक्षिप्त शब्दों में व्यक्त किया है- अप्रस्तुतप्रशंसा स्यादप्रक्रान्तेषु या स्तुतिः । (२।३४०) वामनने उपमेयकी अनुक्तिमें 'समासोक्ति' और किंचिद् उक्तिमें 'अप्रस्तुतप्रशंसा' मानी है।)
(अप्रस्तुतप्रशंसा) कहते हैं। जहाँ किसी एक वस्तुके कहनेपर उसके समान विशेषणवाले दूसरे अर्थकी प्रतीति हो, उसे विद्वान् पुरुष अर्थकी संक्षिप्तताके कारण 'समासोक्ति' (आचार्य भामहने अपने ग्रन्थमें अग्निपुराणोक्त लक्षणको ज्यों-का-त्यों ले लिया है। अन्तर इतना ही है कि अग्निपुराणमें 'उदिता' है और भामहके ग्रन्थमें 'उद्दिष्टा' वहाँ अन्तमें 'बुधैः' पदका प्रयोग है और यहाँ 'यथा' का दण्डीने इसी भावको कुछ अधिक स्पष्टता के साथ इस प्रकार लिखा है -वस्तु किंचिदभिप्रेत्य तत्तुल्यस्यान्यवस्तुनः । उक्तिः संक्षेपरूपत्वात् सा समासोक्तिरुच्यते ॥
(२।२०५) 'समासोक्ति' की गणना व्यङ्ग्य अलंकारों में होती है, इस दृष्टिसे अग्निपुराणोक्त लक्षणमें 'गम्यते'– इस क्रियापदका प्रयोग अधिक महत्त्वका है। अर्वाचीन आलंकारिक 'समासोक्ति' के लक्षणों में अप्रकृत व्यवहारके समारोपका भी उल्लेख करते हैं।) कहते हैं। वास्तविक पदार्थका अपलाप या निषेध करके किसी अन्य पदार्थको सूचित करना 'अपह्नुति' (काव्यादर्शकार दण्डीने अग्निपुराणोक्त लक्षणकी आनुपूर्वीको ही उद्धृत कर लिया है। अन्तर इतना ही है कि अग्निपुराणमें 'किंचिदन्यार्थसूचनम्' पाठ है और काव्यादर्शमें 'सूचनम्' के स्थानमें 'दर्शनम्' कर दिया गया है। भामहने शब्दान्तरसे इसी भावको प्रकट किया है―
अपह्नुतिरभीष्टा च किंचिदन्तर्गतोपमा भृतार्थापहवादस्याः क्रियते चाभिधा यथा ॥(२।२१)
इस लक्षणमें 'किंचिदन्तर्गतोपमा' यह अंश विशेष है। वामनने तुल्य वस्तुके द्वारा वाक्यार्थक अपलापको अपह्नुति' कहा है 'समानवस्तुनान्यापलापोऽपह्नुतिः ।'(३५) परवर्ती आलंकारिकोंने प्रकृत वस्तुका निषेध करके अन्य वस्तुको स्थापनाको 'अपह्नुति' कहा है।) है। जो अभिधेय दूसरे प्रकारसे कहा जाता है अर्थात् सीधे न कहकर प्रकारान्तरसे घुमा-फिराकर
प्रस्तुत किया जाता है, उसको 'पर्यायोक्ति' (भामहने भी 'पर्यायोक्ति' का यही लक्षण लिखा है।) कहते हैं। इनमें से किसी भी एकका नाम 'ध्वनि' (प्राचीनोंने आक्षेप, अप्रस्तुतप्रशंसा, समासोक्ति तथा पर्यायोक्तिको 'ध्वनि' कहकर जो उसे अलंकारोंमें अन्तर्भूत की है, उसका ध्वन्यालोककार आनन्दवर्धनने बड़ी प्रौढ़िके साथ खण्डन किया है।)
है ॥ १-१८॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'शब्दार्थोभयालंकारोंका कथन' नामक तीन सौ पैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३४५ ॥
Summary of chapter 347 of the Agni Mahā Purana is as follows:
The defects (doṣas) of kāvya are analyzed in nine categories arising from flaws in the speaker (vaktṛ), the word (vācaka), and the meaning (vācya). Specific defects include: asādhu (ungrammatical or non-standard usage), aprayukta (never-occurring in good usage), chāndasa (Vedic forms used in secular kāvya), aviṣpaṣṭa (ambiguity arising not from beauty but from carelessness), and gūḍhārtha (obscure meaning due to incompetence rather than intentional depth). The chapter transitions into a philosophical digression affirming that only Brahman is paramārtha-sat (ultimately real) and that the entire universe of language, poetry, and forms is Brahman's self-expression, grounding the aesthetics section in Vedāntic metaphysics before concluding.