अग्निदेव कहते हैं-
'ऐं कुलजे ऐं सरस्वति स्वाहा' — यह ग्यारह अक्षरोंका मन्त्र मुख्य - 'सरस्वतीविद्या' है। जो क्षारलवणसे रहित आहार ग्रहण करते हुए मन्त्रोंकी अक्षरसंख्या के अनुसार उतने लाख मन्त्रका जप करता है, वह बुद्धिमान् होता है। अत्रि (द), अग्नि (र), वाम (ई) तथा बिन्दु (') 'द्रीं' – यह मन्त्र महान् विद्रावणकारी (शत्रुको मार भगानेवाला) है। वज्र और कमल धारण करनेवाले पीत वर्णवाले इन्द्रका आवाहन करके उनकी पूजा करे और घी तथा तिलकी एक लाख आहुतियाँ दे । फिर तिलमिश्रित जलसे इन्द्रदेवताका अभिषेक करे। ऐसा करनेसे राजा आदि अपने छीने गये राज्य आदि तथा राजपुत्र आदि (मनोवाञ्छित वस्तुओं) को पा सकते हैं। हल्लेखा ( ह्रीं) – यह 'शक्तिदेवा' नामसे प्रसिद्ध है। इसका - उद्धार यों है-घोष (ह), अग्नि (र), दण्डी (ई), दण्ड (') 'ह्रीं'। शिवा और शिवका पूजन करके शक्तिमन्त्र (ह्रीं) का जप करे। अष्टमीसे लेकर चतुर्दशीतक आराधनामें संलग्न रहे। हाथोंमें चक्र, पाश, अङ्कुश एवं अभयकी मुद्रा धारण करनेवाली वरदायिनी देवीकी आराधना करके होम आदि करनेपर उपासकको सौभाग्य एवं कवित्वशक्तिकी प्राप्ति होती है तथा वह पुत्रवान् होता है ॥ १-५॥
'ॐ ह्रीं ॐ नमः कामाय सर्वजनहिताय प्रज्वलिताय सर्वजनहृदयं सर्वजनमोहनाय प्रज्वलिताय ममाऽऽत्मगतं कुरु कुरु ॐ ॥' इसके जप आदि - करनेसे यह मन्त्र सम्पूर्ण जगत्को अपने वशमें कर सकता है ॥ ६-७॥
'ॐ ह्रीं चामुण्डे अमुकं दह दह पच पच मम वशमानयानय स्वाहा ॐ। यह चामुण्डाका वशीकरणमन्त्र कहा गया है। स्त्रीको चाहिये कि वशीकरणके प्रयोगकालमें त्रिफलाके ठंडे पानीसे अपनी योनिको धोये। अश्वगन्धा, यवक्षार, हल्दी और कपूर आदिसे भी स्त्री अपनी योनिका प्रक्षालन कर सकती है। पिप्पलीके आठ तन्दुल, कालीमिर्चके बीस दाने और भटकटैयाके रसका योनिमें लेप करनेसे उस स्त्रीका पति आमरण उसके वशमें रहता है। कटीरमूल, त्रिकटु (सोंठ, मिर्च और पीपल) का लेप भी उसी तरह - लाभदायक होता है। हिम, कैथका रस, मागधीपिप्पली, मुलहठी और मधु इनके लेपका प्रयोग दम्पतिके लिये कल्याणकारी होता है। शक्कर मिला हुआ कदम्ब रस और मधु इसका योनिमें लेप करनेसे भी वशीकरण होता है। सहदेई, महालक्ष्मी, पुत्रजीवी, कृताञ्जलि ( लज्जावती ) – इन सबका चूर्ण बनाकर सिर पर डाला जाय तो इहलोकके लिये उत्तम वशीकरणका साधन है। त्रिफला और चन्दनका क्वाथ एक प्रस्थ अलग हो और दो कुडव अलग हो, भँगरैया तथा नागकेसरका रस हो, उतनी ही हल्दी, क्षम्बुक, मधु, घीमें पकायी हुई हल्दी और सूखी हल्दी इन सबका लेप करे तथा बिदारीकंद और जटामांसीके चूर्णमें चीनी मिलाकर उसको खूब मथ दे। फिर दूधके साथ प्रतिदिन पीये। ऐसा करनेवाला पुरुष सैकड़ों स्त्रियोंके साथ सहवासकी शक्ति प्राप्त कर लेता है ॥ ८-१६ ॥
गुप्ता, उड़द, तिल, चावल - इन सबका चूर्ण बनाकर दूध और मिश्री मिलाये। पीपल, बाँस और कुशकी जड़, 'वैष्णवी' और 'श्री' नामक ओषधियोंकी जड़ तथा दूर्वा और अश्वगन्धाका मूल - इन सबको पुत्रकी इच्छा रखनेवाली नारी दूधके साथ पीये। कौन्ती, लक्ष्मी, शिवा और धात्री (आँवलेका बीज), लोध्र और वटके अङ्कुरको स्त्री ऋतुकालमें घी और दूधके साथ पीये। इससे उसको पुत्रकी प्राप्ति होती है । पुत्रार्थिनी नारी 'श्री' नामक ओषधिकी जड़ और वटके अङ्करको दूधके साथ पीये। श्री, वटाङ्कुर और देवी - इनके रसका नस्य ले और पीये भी। 'श्री' और 'कमल'की जड़को, अश्वत्थ और उत्तरके मूलको दूधके साथ पीये। कपासके फल और पल्लवको दूधमें पीसकर तरल बनाकर पीये। अपामार्गके नूतन पुष्पाग्रको भैंसके दूध साथ पीये। उपर्युक्त साढ़े पाँच श्लोकोंमें पुत्रप्राप्ति के चार योग बताये गये हैं ॥ १७ - २१३ ॥
यदि स्त्रीका गर्भ गलित हो जाता हो तो उसे शक्कर, कमलके फूल, कमलगट्टा, लोध, चन्दन और सारिवालता – इनको चावलके पानीमें पीसकर दे या लाजा, यष्टि (मुलहठी), सिता (मिश्री), द्राक्षा, मधु और घी- इन सबका अवलेह बनाकर वह स्त्री चाटे ॥ २२-२३ ॥
आटरूप (अड़सा), कलाङ्गली, काकमाची, शिफा (जटामांसी) - इन सबको नाभिके नीचे पीसकर छाप दे तो स्त्री सुखपूर्वक प्रसव कर सकती है ॥ २४ ॥
लाल और सफेद जवाकुसुम, लाल चीता और हींगपत्री पीये। केसर, भटकटैयाकी जड़,गोपी, षष्ठी (साठीका तृण) और उत्पल – इनको - बकरीके दूधमें पीसकर तैल मिलाकर खाय तो सिरमें बाल उगते हैं। अगर सिरके बाल झड़ रहे हों तो यह उनको रोकनेका उपाय है ।। २५-२६ ॥
आँवला और भँगरैयाका एक सेर तैल, एक आढक दूध, षष्ठी और अञ्जनका एक पल तैल- ये सब सिरके बाल, नेत्र और सिरके लिये हितकारक होते हैं ॥ २७ ॥
हल्दी, राजवृक्षकी छाल, चिञ्चा (इमलीका बीज), नमक, लोध और पीली खारी- ये गौओंके पेट फूलनेकी बीमारीको तत्काल रोक देते हैं ॥ २८ ॥
'ॐ नमो भगवते त्र्यम्बकायोपशमयोपशमय चुलु चुलु मिलि मिलि भिदि भिदि गोमानिनि चक्रिणि हूं फट् । अस्मिन् ग्रामे गोकुलस्य रक्षां कुरु शान्तिं कुरु कुरु कुरु ठ ठ ठ ॥ २९-३०॥
यह गोसमुदायकी रक्षाका मन्त्र है ।'घण्टाकर्ण महासेन वीर बड़े बलवान् कहे गये हैं। वे जगदीश्वर महामारीका नाश करनेवाले हैं, अतः मेरी रक्षा करें। ये दोनों श्लोक और मन्त्र गोरक्षक हैं, इनको लिखकर घरपर टाँग देना चाहिये ॥ ३१ ॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'नाना प्रकारके मन्त्र और औषधोंका कथन' नामक तीन सौ दोवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३०२ ॥
Summary of chapter 303 of the Agni Mahā Purana is as follows:
The therapeutic approach (upakrama) to disease is detailed here: the broad division between saṃśodhana (purificatory) and saṃśamana (palliative) treatments is established. The sixfold upakrama — sweating (sveda), oleation (snehana), emesis (vamana), purgation (virecana), enema (basti), and nasal therapy (nasya) — is enumerated with indications. The season-specific regimens (ṛtucaryā) and the importance of administering treatments at the correct time of day and in the correct sequence are emphasized. The chapter closes with the qualities required of both the physician and the patient for successful treatment.