अग्निदेव कहते हैं-
वसिष्ठ! अब मैं 'पञ्चाङ्ग रुद्र विधान का वर्णन करता हूँ। यह परम उत्तम तथा सब कुछ प्रदान करनेवाला है। 'शिवसंकल्प' इसका हृदय, 'पुरुषसूक्त' शीर्ष, 'अद्भ्यः सम्भृतः०' (यजु० ३१ । १७) आदि सूक्त शिखा और 'आशुः शिशानः' आदि अध्याय इसका कवच है। शतरुद्रिय-संज्ञक रुद्रके ये पाँच अङ्ग हैं।
रुद्रदेवका ध्यान करके इसके पञ्चाङ्गभूत रुद्रोंका क्रमशः जप करे। 'यज्जाग्रतो०' आदि छः ऋचाओंका शिवसंकल्प सूक्त (यजु० ३४ । १ (६) इसका हृदय है। इसके शिवसंकल्प ऋषि और त्रिष्टुप् छन्द कहे गये हैं। 'सहस्त्रशीर्षा०' (यजु० ३१) से प्रारम्भ होनेवाला पुरुषसूक्त इसका शीर्षस्थानीय है। इसके नारायण ऋषि, पुरुष देवता और अनुष्टुप् एवं त्रिष्टुप् छन्द जानने चाहिये। 'अद्भ्यः सम्भृतः०' आदि सूक्तके उत्तरगामी नर ऋषि हैं। इनमें क्रमश: पहले तीन मन्त्रोंका त्रिष्टुप् छन्द, फिर दो मन्त्रोंका अनुष्टुप् छन्द और अन्तिम मन्त्रका त्रिष्टुप् छन्द है तथा पुरुष इसके देवता हैं। 'आशुः शिशानः ० ' (यजु० १७ ३३) आदि सूक्तमें बारह मन्त्रों के इन्द्र देवता और त्रिष्टुप् छन्द हैं। इन सत्रह ऋचाओंके सूक्तके ऋषि 'प्रतिरथ' कहे गये हैं, किंतु देवता भिन्न-भिन्न माने गये हैं। कुछ मन्त्रोंके पुरुवित् देवता हैं। अवशिष्ट देवतासम्बन्धी मन्त्रोंका छन्द अनुष्टुप् कहा गया है। 'असौ यस्ताम्रो०' (यजु० १६ ६ ) मन्त्रके पुरुलिङ्गोक्त देवता और पंक्ति छन्द हैं। 'मर्माणि ते०' (यजु० १७ ४९) मन्त्रका त्रिष्टुप् छन्द और लिङ्गोक्त देवता हैं। सम्पूर्ण रुद्राध्यायके परमेष्ठी ऋषि, 'देवानाम्' इत्यादि मन्त्रोंके प्रजापति ऋषि और तीनों ऋचाओंके कुत्स ऋषि हैं। 'मा नो महान्तमुत मा नो०' (यजुर्वेद १६ । १५) और 'मा नस्तोके० ' (यजु० १६ । १६) आदि दो मन्त्रोंके एकमात्र उमा तथा अन्य मन्त्रोंके रुद्र और रुद्रगण देवता हैं। सोलह ऋचाओंवाले आद्य अनुवाकके रुद्र देवता हैं। प्रथम मन्त्रका छन्द गायत्री, तीन ऋचाओंका अनुष्टुप् तीन ऋचाओंका पंक्ति, सात ऋचाओंका अनुष्टुप् और दो मन्त्रोंका जगती छन्द है। 'नमो हिरण्यबाहवे०' (यजु० १६ । १७) मन्त्रसे लेकर 'नमो वःकिरिकेभ्यः०' (यजु०
१६ । ४६) तक रुद्रगणकी तीन अशीतियाँ हैं। रुद्रानुवाकके पाँच ऋचाओंके रुद्र देवता हैं। बीसवीं ऋचा भी रुद्रदेवता सम्बन्धिनी है। पहली ऋचाका छन्द बृहती, दूसरीका त्रिजगती, तीसरीका त्रिष्टुप् और शेष तीनका अनुष्टुप् छन्द है । श्रेष्ठ आचरणसे युक्त पुरुष इसका ज्ञान पाकर उत्तम सिद्धिका लाभ करता है। 'त्रैलोक्य-मोहन' मन्त्रसे भी विष-व्याधि आदिका विनाश होता है। वह मन्त्र इस प्रकार है- 'इं श्रीं ह्रीं ह्रूं त्रैलोक्यमोहनाय विष्णवे नमः ।' (त्रैलोक्यमोहन विष्णुको नमस्कार है) निम्नाङ्कित आनुष्टुभ नृसिंह मन्त्रसे भी विष - व्याधिका विनाश होता है ॥ १ - १६ ॥
(आनुष्टुभ नृसिंह मन्त्र )
ॐ हं ई उग्रं वीरं महाविष्णुं ज्वलन्तं सर्वतोमुखम् ।
नृसिंहं भीषणं भद्रं मृत्युमृत्युं नमाम्यहम् ॥
'जो उग्र, वीर, सर्वतोमुखी तेजसे प्रज्वलित, भयंकर तथा मृत्युकी भी मृत्यु होते हुए भी भक्तजनोंके लिये कल्याणस्वरूप हैं, उन महाविष्णु नृसिंहका मैं भजन करता हूँ।' हृदयादि पाँच अङ्गोंके न्याससे युक्त यही मन्त्र समस्त अर्थो सिद्ध करनेवाला है। श्रीविष्णुके द्वादशाक्षर और अष्टाक्षर मन्त्र भी विष-व्याधिका नाश करनेवाले हैं। 'कुब्जिका त्रिपुरा गौरी चन्द्रिका विषहारिणी।'— यह प्रसादमन्त्र विषहारक तथा आयु और आरोग्यका वर्धक है। सूर्य और विनायकके मन्त्र भी विषहारी कहे गये हैं। इसी तरह समस्त रुद्रमन्त्र भी विषका नाश करनेवाले हैं ॥ १७-२१॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'पञ्चाङ्ग रुद्रविधान' नामक दो सौ छियानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २९६ ॥
Summary of chapter 297 of the Agni Mahā Purana is as follows:
Mantras and herbs that destroy poison are systematically presented. Multiple Rudra mantras — "Oṃ namo Bhagavate Rudrāya," the Pakṣi-Rudra mantra, and the Pātāla-kṣobha mantra — are given as the primary mantra arsenal against snakebite. The Garuḍa Gāyatrī "Pakṣirājāya vidmahe, Pakṣi-devāya dhīmahi, tanno Garuḍaḥ pracodayāt" is prescribed. Herbal treatments include burning the bite site with coal or flame (kāpotika) immediately after the bite, and the external and internal use of śirīṣa seeds, arka kṣīra, and trikatu. The indraya-ativiṣā-bilva combination, śirīṣa-puṣpa juice with white pepper, and koṣātakī-vacā-hiṅgu-śirīṣa-arka paste are among the formulations given.