श्रीभगवान् बोले-
चण्डी बीस भुजाओंसे विभूषित होती है। वह अपने दाहिने हाथों में शूल, खड्ग, शक्ति, चक्र, पाश, खेट, आयुध, अभय, डमरू और शक्ति धारण करती है। बायें हाथों में नागपाश, खेटक, कुठार, अंकुश, पाश, घण्टा, आयुध, गदा, दर्पण और मुगर लिये रही है। अथवा चण्डीकी प्रतिमा दस भुजाओंसे युक्त होनी चाहिये। उसके चरणोंके नीचे कटे हुए मस्तकवाला महिष हो उसका मस्तक अलग गिरा हुआ हो वह हाथोंमें शस्त्र उठाये हो।
उसकी ग्रीवासे एक पुरुष प्रकट हुआ हो, जो अत्यन्त कुपित हो। उसके हाथमें शूल हो, वह मुँहसे रक्त उगल रहा हो उसके गलेकी माला, सिरके बाल और दोनों नेत्र लाल दिखायी देते हों। देवीका वाहन सिंह उसके रक्तका आस्वादन कर रहा हो उस महिषासुरके गलेमें खूब कसकर पाश बाँधा गया हो। देवीका दाहिना पैर सिंहपर और बायाँ पैर नीचे महिषासुरके शरीरपर
हो ॥ १-५ ॥
ये चण्डीदेवी त्रिनेत्रधारिणी हैं तथा शस्त्रोंसे सम्पन्न रहकर शत्रुओंका मर्दन करनेवाली हैं। नवकमलात्मक पीठपर दुर्गाकी प्रतिमामें उनकी पूजा करनी चाहिये। पहले कमलके नौ दलोंमें तथा मध्यवर्तिनी कर्णिकामें इन्द्र आदि दिक्पालोंकी तथा नौ तत्त्वात्मिका शक्तियोंके (इन नौ तत्त्वात्मिका शक्तियोंको नामावली इस प्रकार समझनी चाहिये- अग्निपुराण अध्याय २१ में लक्ष्मी, मेधा, कला, तुष्टि, पुष्टि, गौरी, प्रभा, मति और दुर्गा-ये नाम आये हैं तथा तन्त्रसमुच्चय और मन्त्रमहार्णव के अनुसार इन शक्तियोंके ये नाम हैं ―प्रभा, माया, जया, सूक्ष्मा, विशुद्धा नन्दिनी, सुप्रभा, विजया तथा सर्वसिद्धिदा) साथ दुर्गाकी पूजा करे॥६६॥
दुर्गाजीकी एक प्रतिमा अठारह भुजाओंकी होती है। वह दाहिने भागके हाथों में मुण्ड, खेटक, दर्पण, तर्जनी, धनुष, ध्वज, डमरू, ढाल और पाश धारण करती है तथा वाम भागकी , भुजाओंमें शक्ति, मुद्गर, शूल, वज्र, खड्ग, अंकुश, बाण, चक्र और शलाका लिये रहती है। सोलह बाँहवाली दुर्गाकी प्रतिमा भी इन्हीं आयुधोंसे युक्त होती है। अठारहमेंसे दो भुजाओं तथा डमरू और तर्जनी- इन दो आयुधोंको छोड़कर शेष सोलह हाथ उन पूर्वोक्त आयुधोंसे ही सम्पन्न होते हैं। रुद्रचण्डा आदि नौ दुर्गाएँ इस प्रकार हैं— रुद्रचण्डा, प्रचण्डा, चण्डोग्रा, चण्डनायिका, - चण्डा, चण्डवती, चण्डरूपा और अतिचण्डिका। ये पूर्वादि आठ दिशाओं में पूजित होती हैं तथा नवीं उग्रचण्डा मध्यभागमें स्थापित एवं पूजित होती हैं। रुद्रचण्डा आदि आठ देवियोंकी अङ्गकान्ति क्रमशः गोरोचनाके सदृश पीली, अरुणवर्णा, काली, नीली, शुक्लवर्णा, धूम्रवर्णा, पीतवर्णा और श्वेतवर्णा है। ये सब की सब सिंहवाहिनी हैं। महिषासुरके कण्ठसे प्रकट हुआ जो पुरुष है, वह शस्त्रधारी है और ये पूर्वोक्त देवियाँ अपनी मुट्ठीमें उसका केश पकड़े रहती हैं ॥ ७-१२ ॥ ये नौ दुर्गाएँ 'आलीढा' (वाचस्पत्यकोषमें आलोढका लक्षण इस प्रकार दिया गया है―
भुग्नवामपदं पश्चात्स्तब्धजानूरुदक्षिणम्। वितस्त्यः पञ्च विस्तारे तदालीढं प्रकीर्तितम् ॥
जिसमें मुड़ा हुआ बायाँ पैर तो पीछे हो और तने हुए घुटने तथा ऊरुवाला दाहिना पैर आगेकी ओर हो, दोनोंके बीचका विस्तार पाँच वित्ता हो तो इस प्रकारके आसन या अवस्थानको 'आलीढ' कहा गया है)। आकृतिकी होनी चाहिये। पुत्र-पौत्र आदिकी वृद्धिके लिये इनकी स्थापना ( एवं पूजा करनी उचित है। गौरी ही चण्डिका आदि देवियोंके रूपमें पूजित होती हैं। वे ही हाथोंमें कुण्डी, अक्षमाला, गदा और अग्नि धारण करके 'रम्भा' कहलाती हैं। वे ही वनमें 'सिद्धा' कही गयी हैं। सिद्धावस्थामें वे अग्निसे रहित होती हैं। 'ललिता' भी वे ही हैं। उनका परिचय इस प्रकार है- उनके एक बायें हाथमें | गर्दनसहित मुण्ड है और दूसरेमें दर्पण दाहिने हाथमें फलाञ्जलि है और उससे ऊपरके हाथमें सौभाग्यकी मुद्रा ॥ १३-१४३ ॥
लक्ष्मीके दायें हाथमें कमल और बायें हाथमें श्रीफल होता है। सरस्वतीके दो हाथोंमें पुस्तक और अक्षमाला शोभा पाती है और शेष दो हाथोंमें वे वीणा धारण करती हैं। गङ्गाजीकी अङ्गकान्ति श्वेत है। वे मकरपर आरूढ हैं। उनके एक हाथमें कलश है और दूसरेमें कमल यमुना देवी कछुएपर आरूढ हैं। उनके दोनों हाथों में कलश है और वे श्यामवर्णा हैं। इसी रूपमें इनकी पूजा होती है। तुम्बुरुकी प्रतिमा वीणासहित होनी चाहिये। उनकी अङ्गकान्ति श्वेत है। शूलपाणि शंकर वृषभपर आरूढ हो मातृकाओंके आगे आगे चलते हैं। ब्रह्माजीकी प्रिया सावित्री गौरवर्णा एवं चतुर्मुखी हैं। उनके दाहिने हाथों में अक्षमाला और स्रुक् शोभा पाते हैं और बायें हाथों में वे कुण्ड एवं अक्षपात्र लिये रहती हैं। उनका वाहन हंस है। शंकरप्रिया पार्वती वृषभपर आरूढ होती है। उनके दाहिने हाथोंमें धनुष-बाण और बायें हाथोंमें चक्र धनुष शोभित होते हैं। कौमारी शक्ति मोरपर आरूढ होती है। उसकी अङ्गकान्ति लाल है। उसके दो हाथ हैं और वह अपने हाथों में शक्ति धारण करती है ॥ १५- १९॥
लक्ष्मी (वैष्णवी शक्ति) अपने दायें हाथों में चक्र और शङ्ख धारण करती हैं तथा बायें हाथों में गदा एवं कमल लिये रहती हैं। वाराही शक्ति भैंसेपर आरूढ होती है। उसके हाथ दण्ड, शङ्ख, चक्र और गदासे सुशोभित होते हैं। ऐन्द्री शक्ति ऐरावत हाथीपर आरूढ होती है। उसके सहस्र नेत्र हैं तथा उसके हाथों में वज्र शोभा पाता है। ऐन्द्री देवी पूजित होनेपर सिद्धि प्रदान करनेवाली हैं। चामुण्डाकी आँखें वृक्षके खोखलेकी भाँति गहरी होती हैं। उनका शरीर मांसरहित- कंकाल दिखायी देता है। उनके तीन नेत्र हैं। मांसहीन शरीरमें अस्थिमात्र ही सार है। केश ऊपरकी ओर उठे हुए हैं। पेट सटा हुआ है। वे हाथीका चमड़ा पहनती हैं। उनके बायें हाथोंमें कपाल और पट्टिश है तथा दायें हाथों में शूल और कटार वे शवपर आरूढ होती और हड्डियोंके गहनोंसे अपने शरीरको विभूषित करती हैं ॥ २० – २२३ ॥
विनायक (गणेश) की आकृति मनुष्यके समान है; किंतु उनका पेट बहुत बड़ा है। मुख हाथीके समान है और सूँड़ लंबी है। वे यज्ञोपवीत धारण करते हैं। उनके मुखकी चौड़ाई सात कला है और सूँड़की लंबाई छत्तीस अङ्गुल अङ्गुल। उनकी नाड़ी (गर्दनके ऊपरकी हड्डी) बारह कला विस्तृत और गर्दन डेढ़ कला ऊँची होती है। उनके कण्ठभागकी लंबाई छत्तीस अङ्गुल है और गुह्यभागका घेरा डेढ़ अङ्गुल । नाभि और ऊरुका विस्तार बारह अङ्गल है। जाँघों और पैरोंका भी
यही माप है। वे दाहिने हाथों में गजदन्त और फरसा धारण करते हैं तथा बायें हाथोंमें लड्डू एवं उत्पल लिये रहते हैं ॥ २३ - २६ ॥
स्कन्द स्वामी मयूरपर आरूढ हैं। उनके उभय पार्श्वमें सुमुखी और विडालाक्षी मातृका तथा शाख और विशाख अनुज खड़े हैं। उनके दो भुजाएँ हैं। वे बालरूपधारी हैं। उनके दाहिने हाथमें शक्ति शोभा पाती है और बायें हाथमें कुक्कुट। उनके एक या छः मुख बनाने चाहिये। गाँवमें उनके अर्चाविग्रहको छः अथवा बारह भुजाओंसे युक्त बनाना चाहिये, परंतु वनमें यदि उनकी मूर्ति स्थापित करनी हो तो उसके दो ही भुजाएँ बनानी चाहिये। कौमारी शक्तिकी छहों - दाहिनी भुजाओंमें शक्ति, बाण, पाश, खड्ग, गदा और तर्जनी (मुद्रा)- ये अस्त्र रहने चाहिये और छः बायें हाथों में मोरपंख, धनुष, खेट, पताका, अभयमुद्रा तथा कुक्कुट होने चाहिये। रुद्रचर्चिका देवी हाथीके चर्म धारण करती हैं। उनके मुख और एक पैर ऊपरकी ओर उठे हैं। वे बायें दायें हाथों में क्रमशः कपाल, कर्तरी, शूल और पाश धारण करती हैं। वे ही देवी-'अष्टभुजा 'के रूपमें भी पूजित होती हैं ॥ २७ - ३१ ॥
मुण्डमाला और डमरूसे युक्त होनेपर वे ही 'रुद्रचामुण्डा' कही गयी हैं। वे नृत्य करती हैं, इसलिये 'नाट्येश्वरी' कहलाती हैं। ये ही आसनपर बैठी हुई चतुर्मुखी 'महालक्ष्मी' (की तामसी मूर्ति) कही गयी हैं, जो अपने हाथोंमें पड़े हुए मनुष्यों, घोड़ों, भैंसों और हाथियोंको खा रही हैं। 'सिद्धचामुण्डा' देवीके दस भुजाएँ और तीन नेत्र हैं। ये दाहिने भागके पाँच हाथोंमें शस्त्र, खड्ग तथा तीन डमरू धारण करती हैं और बायें भागके हाथोंमें घण्टा, खेटक, खट्वाङ्ग, त्रिशूल (और ढाल) लिये रहती हैं। 'सिद्धयोगेश्वरी' देवी सम्पूर्ण सिद्धि प्रदान करनेवाली हैं। इन्ही देवीकी स्वरूपभूता एक दूसरी शक्ति हैं, जिनकी
अङ्गकान्ति अरुण है। ये अपने दो हाथोंमें पाश और अंकुश धारण करती हैं तथा 'भैरवी' नामसे विख्यात हैं। 'रूपविद्या देवी' बारह भुजाओंसे युक्त कही गयी हैं। ये सब की सब श्मशानभूमिमें - प्रकट होनेवाली तथा भयंकर हैं। इन आठों देवियोंको 'अम्बाष्टक' ( रुद्रचण्ड, अष्टभुजा (या चामुण्डा), नाट्येश्वरी, चतुर्मुखी महालक्ष्मी सिद्धचामुण्डा, सिद्धयोगेश्वरी, भैरवो तथा रूपविद्या इन आठ देवियोंको ही 'अम्बाष्टक' कहा गया है।) कहते हैं ॥ ३२-३६ ॥
'क्षमादेवी' – शिवाओं (शृगालियों) से आवृत हैं। वे एक बूढ़ी स्त्रीके रूपमें स्थित हैं। उनके दो भुजाएँ हैं। मुँह खुला हुआ है। दाँत निकले हुए हैं तथा ये धरतीपर घुटनों और हाथका सहारा लेकर बैठी हैं। उनके द्वारा उपासकोंका कल्याण होता है। यक्षिणियोंकी आँखें स्तब्ध (एकटक देखनेवाली) और बड़ी होती हैं। शाकिनियाँ वक्रदृष्टिसे देखनेवाली होती हैं। अप्सराएँ सदा ही अत्यन्त रमणीय एवं सुन्दर रूपवाली हुआ करती हैं। इनकी आँखें भूरी होती हैं ।। ३७-३८ ।।
भगवान् शंकरके द्वारपाल नन्दीश्वर एक हाथमें अक्षमाला और दूसरेमें त्रिशूल लिये रहते हैं। महाकालके एक हाथमें तलवार, दूसरेमें कटा हुआ सिर, तीसरेमें शूल और चौथेमें खेट होना चाहिये। भृङ्गीका शरीर कृश होता है। वे नृत्यकी मुद्रामें देखे जाते हैं। उनका मस्तक कूष्माण्डके समान स्थूल और गंजा होता है। वीरभद्र आदि गण हाथी और गायके समान कान और मुखवाले होते हैं। घण्टाकर्णके अठारह भुजाएँ होती हैं। वे पाप और रोगका विनाश करनेवाले हैं। वे बायें भागके आठ हाथोंमें वज्र, खड्ग, दण्ड, चक्र, बाण, मुसल, अंकुश और मुद्गर तथा दायें भाग आठ हाथोंमें तर्जनी, खेट, शक्ति, मुण्ड, पाश, धनुष, घण्टा और कुठार धारण करते हैं। शेष दो हाथोंमें त्रिशूल लिये रहते हैं। घण्टाकी मालासे अलंकृत देव घण्टाकर्ण विस्फोटक ( फोड़े, फुंसी एवं चेचक आदि) का निवारण करनेवाले हैं ॥ ३९-४३ ॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें चण्डी आदि देवी-देवताओंकी प्रतिमाओंके लक्षणोंका निरूपण' नामक पचासवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५० ॥
Summary of chapter 51 of the Agni Mahā Purana is as follows:
This chapter describes the ritual installation of the kalaśa — the sacred pot that serves as a temporary vessel for the deity's presence during festivals, consecrations, and auspicious rites. The selection of the pot (copper, silver, or gold being most auspicious), its filling with pure water mixed with specific substances — five types of earth, five gems, five metals, five leaves, durva grass — and its covering with a full coconut and mango leaves are described. The mantras for invoking the deity into the kalaśa — drawing upon the Puruṣa-sūkta and specific deity bīja-s — are given. The directional placement of eight kalaśa-s in the eight directions around the central kalaśa, each assigned to a specific deity and color, is described. The kalaśa is affirmed as a complete cosmogram, its rounded body symbolizing the cosmos, its water the primordial ocean, its coconut the deity's head.