अग्नि महा पुराण

336-शिक्षानिरूपण

अग्निदेव कहते हैं-

वसिष्ठ ! अब मैं 'शिक्षा का वर्णन करता हूँ। वर्णोंकी संख्या तिरसठ अथवा चौंसठ भी मानी गयी है। इनमें इक्कीस स्वर (अ, इ, उ, ऋ इन चारों अक्षरोंके हस्व, दीर्घ और प्लुत भेद मिलाकर बारह स्वर होते हैं। ए, ओ, ऐ, औ—इनके दीर्घ और प्लुत भेद मिलकर आठ होते हैं। ये सब मिलकर बीस हुए तथा एक दुःस्पृष्ट 'ल' मिलानेसे कुल इक्कीस स्वर हुए दो स्वरोंके मध्यमवर्ती 'ल'को 'दुःस्पृष्ट' कहते हैं।), पचीस स्पर्श,(कवर्ग, चवर्ग, वर्ग, तवर्ग तथा पवर्गके पचीस वणको 'स्पर्श' कहते हैं।) आठ यादि (य, र, ल, व, श, ष, स, ह ये आठ अक्षर 'यादि' कहे गये हैं।)एवं चार यम (वर्गों में पञ्चम वर्णके परे रहते आदिके चार वर्णों तथा पञ्चमके मध्यमें जो उन्हींके सदृश वर्ण उच्चारित होते हैं, उनको 'यम' कहते हैं। जैसा कि- भट्टोजिदीक्षित लिखते हैं—'वर्णेष्वाद्यानां चतुर्णां पञ्चमे परे मध्ये यमो नाम पूर्वसदृशो वर्णः प्रातिशाख्ये प्रसिद्धः । यथा-पलिक्वनी, चतुः इत्यादि।)माने गये हैं।अनुस्वार, विसर्ग, दो पराश्रित (क, ख तथा प फ परे रहनेपर विसर्गके स्थानमें क्रमशः क ख तथा पफ आदेश होते हैं, अतः ये दोनों 'पराश्रित' हैं। इन्हींको क्रमशः 'जिह्वामूलीय' और 'उपध्मानीय' कहते हैं।) वर्ण– जिह्वामूलीय तथा उपध्मानीय ( क और प) और दुःस्पृष्ट लकार- ये तिरसठ ('लू' का 'ऋ' में ही अन्तर्भाव माननेपर उसकी पृथक गणना न होनेसे वर्णसंख्या ६३ तक हो जाती है।) वर्ण हैं। इनमें प्लुत लृकारको और गिन लिया जाय तो वर्णोंकी संख्या चाँसठ हो जाती है। रङ्ग (नकारके स्थानमें 'रु' होनेपर 'अत्रानुनासिकः पूर्वस्य तु वाइस सूत्रसे जो अनुनासिक किया जाता है, उसीका नाम 'रङ्ग' है।) (अनुनासिक) का उच्चारण 'खे अराँ' की तरह बताया गया है। हकार 'ङ' आदि पञ्चमाक्षरों और य, र, ल, व-इन अन्तःस्थ वर्णोंसे संयुक्त होनेपर 'उरस्य' हो जाता है। इनसे संयुक्त न होनेपर वह 'कण्ठस्थानीय' ही रहता है। आत्मा (अन्तः करणावच्छिन्न चैतन्य) संस्काररूपसे अपने भीतर विद्यमान घट-पटादि पदार्थोंको अपनी बुद्धिवृत्तिसे संयुक्त करके अर्थात् उन्हें एक बुद्धिका विषय बनाकर बोलने या दूसरोंपर प्रकट करनेकी इच्छासे मनको उनसे संयुक्त करता है। संयुक्त हुआ मन कायाग्नि- जठराग्निको आहत करता है। फिर वह जठरानल प्राणवायुको प्रेरित करता है। वह प्राणवायु हृदयदेशमें विचरता हुआ धीमी ध्वनिमें उस प्रसिद्ध स्वरको उत्पन्न करता है, जो प्रातः सवनकर्मके साधनभूत मन्त्रके लिये उपयोगी है तथा जो 'गायत्री' नामक छन्दके आश्रित है। तदनन्तर वह प्राणवायु कण्ठदेशमें भ्रमण करता हुआ 'त्रिष्टुप् छन्दसे युक्त माध्यंदिन सवन कर्मसाधन मन्त्रोपयोगी मध्यम स्वरको उत्पन्न करता है। इसके बाद उक्त प्राणवायु शिरोदेशमें पहुँचकर उच्चध्वनिसे युक्त एवं 'जगती' छन्दके आश्रित सायं-सवन-कर्मसाधन मन्त्रोपयोगी स्वरको प्रकट करता है। इस प्रकार ऊपरकी ओर प्रेरित वह प्राण, मूर्धामें टकराकर अभिघात नामक संयोगका आश्रय बनकर, मुखवर्ती कण्ठादि स्थानों में पहुँचकर वर्णोंको उत्पन्न करता है। उन वर्णोंके पाँच प्रकारसे विभाग माने गये हैं। स्वरसे, कालसे, स्थानसे, आभ्यन्तर प्रयत्नसे तथा वाह्य प्रयत्न से उन वर्णोंमें भेद होता है। वर्णोंके उच्चारण स्थान आठ हैं- हृदय, कण्ठ, मूर्धा, जिह्वामूल, दन्त, नासिका, ओष्ठद्वय तथा तालु। विसर्गका अभाव, विवर्तन (जहाँ सकारका 'रुत्व', 'यत्व' होकर 'लोपः शाकल्यस्य' (पा०सू० ८। ३ । १९) अथवा 'हलि सर्वेषाम् ।' (पा०सू० ८।३।२२) के नियमानुसार वैकल्पिक लोप होता है और उस दशामें संधि नहीं होती, वहाँ उस संधिके अभावको 'विवृत्ति' या 'विवर्तन' कहा गया है। जैसा कि 'याज्ञवल्क्य शिक्षा में वर्णन है -द्वयोस्तु स्वरयोर्मध्ये संधियंत्र न दृश्यते विवृत्तिस्तत्र विज्ञेया य ईशेति निदर्शनम्॥ (श्लो० ९४)), संधिका अभाव, शकारादेश, षकारादेश, सकारादेश, रेफादेश, जिह्वामूलीयत्व और उपध्मानीयत्व – ये 'ऊष्मा' वर्णोंकी आठ प्रकारकी गतियाँ (इन आठोंके उदाहरण क्रमश: इस प्रकार है- शिवो वन्द्यः क ईशः हरिश्शेते, आविष्कृतम्, कस्कः, अहपतिः,क ककरोति, पचति ।) हैं। जिस उत्तरवर्ती पदमें आदि अक्षर 'उकार' हो, वहाँ गुण आदिके द्वारा यदि 'ओ' भावका प्रसंधान (परिज्ञान) हो रहा हो, तो उस 'ओकार' को स्वरान्त अर्थात् स्वर स्थानीय जानना चाहिये। जैसे—'गङ्गोदकम्'। इस पदमें जो 'ओ' भावका प्रसंधान है, वह स्वरस्थानीय है। इससे भिन्न संधिस्थलमें जो 'ओभाव' का परिज्ञान होता है, वह 'ओ' भाव ऊष्माका ही गतिविशेष है, यह बात स्पष्टरूपसे जान लेनी चाहिये । जैसे– 'शिवो वन्द्यः' इसमें जो ओकारका श्रवण होता है, वह ऊष्मस्थानीय ही है। (यह निर्णय किसी अन्य व्याकरणकी रीतिसे किया गया है, ऐसा जान पड़ता है।) जो वेदाध्ययन कुतीर्थसे प्राप्त हुआ है, अर्थात् आचारहीन गुरुसे ग्रहण किया गया है, वह दग्ध-नीरस-सा होता है। उसमें अक्षरोंको खींच तानकर हठात् किसी अर्थतक पहुँचाया गया है। वह भक्षित सा हो गया है, अर्थात् सम्प्रदाय सिद्ध गुरुसे अध्ययन न करनेके कारण वह अभक्ष्य-भक्षणके समान निस्तेज है। इस तरहका उच्चारण या पठन पाप माना गया है। इसके विपरीत जो सम्प्रदायसिद्ध गुरुसे अध्ययन किया जाता है, तदनुसार पठन पाठन शुभ होता है। जो उत्तम तीर्थ-सदाचारी गुरुसे पढ़ा गया है, सुस्पष्ट उच्चारणसे युक्त है,सम्प्रदायशुद्ध है, सुव्यवस्थित है, उदात्त आदि शुद्ध स्वरसे तथा कण्ठ- ताल्वादि शुद्ध स्थान से प्रयुक्त हुआ है, वह वेदाध्ययन शोभित होता है। न तो विकराल आकृतिवाला, न लंबे ओठोंवाला, न अव्यक्त उच्चारण करनेवाला, न नाकसे बोलनेवाला एवं न गद्गद कण्ठ या जिह्वाबन्धसे युक्त मनुष्य ही वर्णोच्चारणमें समर्थ होता है। जैसे व्याघ्री अपने बच्चोंको दाढ़ोंसे पकड़कर एक स्थान दूसरे स्थानपर ले जाती है, किंतु उन्हें पीड़ा नहीं देती, वर्णोंका ठीक इसी तरह प्रयोग करे, जिससे वे वर्ण न तो अव्यक्त (अस्पष्ट) हों और न पीड़ित ही हों। वर्णोंके सम्यक् प्रयोगसे मानव ब्रह्मलोकमें पूजित होता है। 'स्वर' तीन प्रकारके माने गये हैं— उदात्त, अनुदात्त और स्वरित इनके उच्चारणकालके भी तीन नियम हैं- ह्रस्व, दीर्घ तथा प्लुत। अकार एवं हकार कण्ठस्थानीय हैं। इकार, चवर्ग, यकार एवं शकार- ये तालुस्थान उच्चरित होते हैं। उकार और पवर्ग- ये दोनों ओष्ठस्थानसे उच्चरित होनेवाले हैं। ऋकार, टवर्ग, रेफ एवं षकार- ये मूर्धन्य तथा लृकार, तवर्ग, लकार और सकार- ये दन्तस्थानीय होते हैं। कवर्गका स्थान जिह्वामूल है। वकारको विद्वज्जन दन्त और ओष्ठसे उच्चरित होनेवाला बताते हैं । एकार और ऐकार कण्ठ-तालव्य तथा ओकार एवं औकार कण्ठोष्ठज माने गये हैं। एकार, ऐकार तथा ओकार और औकारमें कण्ठस्थानीय वर्ण अकारकी आधी मात्रा या एक मात्रा होती है। 'अयोगवाह' (अनुस्वार, विसर्ग, जिह्वामूलीय, उपध्मानीय और यम- ये 'अयोगवाह' कहलाते हैं। वे जिस स्वरपर आश्रित होते हैं, उसीका स्थान उनका स्थान होता है। जैसे–'राम: 'का विसर्ग कण्ठस्थानीय है और 'हरि: 'का विसर्ग तालुस्थानीय ) आश्रयस्थानके भागी होते हैं, ऐसा जानना चाहिये। अच् (अ, इ, उ, ऋ, ऌ, ए, ओ, ऐ, औ) – ये स्वर स्पर्शाभावरूप 'विवृत' - प्रयत्नवाले हैं। यण् (य, व, र, ल) ' 'ईषत्स्पृष्ट' एवं शल् (श, ष, स, ह) 'अर्धस्पृष्ट' अर्थात् 'ईषद्विवृत' प्रयत्नवाले हैं। शेष 'हल्' अर्थात् क से लेकर म तकके अक्षर 'स्पृष्ट प्रयत्नवाले' माने गये हैं। इनमें बाह्य प्रयत्नके कारण वर्णभेद जानना चाहिये 'ञम्' प्रत्याहारमें स्थित वर्ण (ञ, म, ङ, ण, न) अनुनासिक होते हैं। हकार और रेफ अनुनासिक नहीं होते। 'हकार, झकार तथा षकार 'के 'संवार', 'घोष' और 'नाद' प्रयत्न हैं। 'यण्' और 'जश्' – इनके 'ईषन्नाद' अर्थात् 'अल्पप्राण' प्रयत्न हैं। ख, फ आदिका 'विवार', 'अघोष' और 'श्वास' प्रयत्न हैं। चर् (च, ट, त, क, प, श, ष, स) का 'ईषच्छ्वास' प्रयत्न जानना चाहिये। यह व्याकरणशास्त्र वाणीका धाम कहा जाता है ॥ १ - २२ ॥

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'शिक्षानिरूपण' नामक तीन सौ छत्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३३६ ॥