अग्निदेव कहते हैं-
समुद्रके उत्तर और हिमालयके दक्षिण जो वर्ष है, उसका नाम 'भारत' है। उसका विस्तार नौ हजार योजन है। स्वर्ग तथा अपवर्ग पानेकी इच्छावाले पुरुषों के लिये यह कर्मभूमि है। महेन्द्र, मलय, सह्य शुक्तिमान् हिमालय, विन्ध्य और पारियात्र – ये सात यहाँके कुल पर्वत हैं। इन्द्रद्वीप, कसेरु, ताम्रवर्ण, गभस्तिमान्, नागद्वीप, सौम्य, गान्धर्व और वारुण- ये आठ द्वीप हैं। समुद्रसे घिरा हुआ भारत नवाँ द्वीप है ॥ १४ ॥
भारतद्वीप उत्तरसे दक्षिणकी ओर हजारों योजन लंबा है। भारतके उपर्युक्त नौ भाग हैं।भारतकी स्थिति मध्यमें है। इसमें पूर्वकी ओर किरात और (पश्चिममें) यवन रहते हैं। मध्यभागमें ब्राह्मण आदि वर्णोंका निवास है। वेद-स्मृति आदि नदियाँ पारियात्र पर्वतसे निकली हैं। विन्ध्याचलसे नर्मदा आदि प्रकट हुई हैं। सह्य पर्वतसे तापी, पयोष्णी, गोदावरी, भीमरथी और कृष्णवेणा आदि नदियोंका प्रादुर्भाव हुआ है ॥ ५ - ७॥
मलयसे कृतमाला आदि और महेन्द्र पर्वतसे त्रिसामा आदि नदियाँ निकली हैं। शुक्तिमान्से कुमारी आदि और हिमालयसे चन्द्रभागा आदिका प्रादुर्भाव हुआ है। भारतके पश्चिमभागमें कुरु, पाञ्चाल और मध्यदेश आदिकी स्थिति है ॥ ८ ॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'भारतवर्षका वर्णन' नामक एक सौ अठारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ११८ ॥
Summary of chapter 119 of the Agni Mahā Purana is as follows:
The canonical procedure for the śrāddha—the periodic ancestral offering—is laid out in systematic detail. Agni describes the two principal forms: pārvaṇa-śrāddha (performed on the new moon) and ekoddiṣṭa-śrāddha (performed for a specific departed soul during the first year). The eligibility and number of brāhmaṇas to be invited, the precise sequence of piṇḍa-dāna, and the mantras of tarpana are specified. Forbidden foods (mṛta-pañca-nakhādi, lavaṇa, masūra) for śrāddha offerings are enumerated, and the accrued benefit to the pitṛ-s and the performer are described.