भगवान् शंकर कहते हैं-
स्कन्द ! पूर्वोक्त मार्गसे विद्याकलाका शान्तिकलाके साथ विधिपूर्वक संधान करे। उसके लिये मन्त्र है- 'ॐ हां हूं हां।' शान्तिकलामें दो तत्त्व लीन हैं। वे दोनों हैं— ईश्वर और सदाशिव हकार और क्षकार ये दो वर्ण कहे गये हैं। अब भुवनोंके साथ उन्हींके समान नामवाले रुद्रोंका परिचय दिया जा रहा है। उनकी नामावली इस प्रकार है- प्रभव, समय, क्षुद्र, विमल, शिव, घन, निरञ्जन, अङ्गार, सुशिरा, दीप्तकारण, त्रिदशेश्वर, कालदेव, सूक्ष्म और अम्बुजेश्वर (या भुजेश्वर) – ये चौदह रुद्र शान्तिकलामें प्रतिष्ठित हैं। व्योमव्यापिने, व्योमरूपाय, सर्वव्यापिने, शिवाय, अनन्ताय, अनाथाय, अनाश्रिताय, ध्रुवाय, शाश्वताय, योगपीठसंस्थिताय, नित्ययोगिने, ध्यानाहराय ये बारह पद हैं ॥ १-५॥
पुरुष और कवच - ये दो मन्त्र हैं; बिन्दु - और जकार- ये दो बीज हैं; अलम्बुषा और यशा- ये दो नाड़ियाँ हैं; कृकर और कूर्म-ये दो प्राणवायु हैं; त्वचा और हाथ- ये दो इन्द्रियाँ हैं; शान्तिकलाका विषय स्पर्श माना गया है; स्पर्श और शब्द- ये दो गुण हैं और एक ही कारण हैं – ईश्वर इसकी तुर्यावस्था है। इस प्रकार - भुवन आदि समस्त तत्त्वोंकी शान्तिकलामें स्थितिका चिन्तन करके पूर्ववत् ताड़न, छेदन, हृदय प्रवेश, चैतन्यका वियोजन, आकर्षण और ग्रहण करे। फिर शान्तिके मुखसूत्रसे चैतन्यका आत्मामें आरोपण करके कलाका ग्रहण कर उसे कुण्डमें स्थापित कर दे। तदनन्तर ईशसे इस प्रकार प्रार्थना करे 'हे ईश! मैं इस मुमुक्षुको तुम्हारे अधिकारमें दीक्षित कर रहा हूँ। तुम्हें इसके अनुकूल रहना
चाहिये' ॥६- १०॥
फिर माता-पिताका आवाहन आदि और शिष्यका ताड़न आदि करके चैतन्यको लेकर विधिवत् आत्मामें योजित करे। तत्पश्चात् पूर्ववत् माता-पिताके संयोगकी भावना करके उद्भवा नाड़ीद्वारा उस चैतन्यका हृदय मन्त्रसे सम्पुटित आत्मबीजके उच्चारणपूर्वक देवीके गर्भमें नियोजन करे। देहोत्पत्तिके लिये हृदय मन्त्रसे, जन्मके हेतु शिरोमन्त्रसे, अधिकार सिद्धि के लिये शिखा मन्त्रसे, भोगके निमित्त कवच मन्त्रसे, लयके लिये शस्त्र मन्त्रसे, स्रोतःशुद्धिके लिये शिव - मन्त्रसे तथा तत्त्वशोधनके लिये हृदय मन्त्रसे पाँच-पाँच आहुतियाँ दे। इसी तरह पूर्ववत् गर्भाधान आदि संस्कार भी करे। कवच-मन्त्र से पाशकी शिथिलता एवं निष्कृतिके लिये सौ आहुतियाँ दे मलशक्ति-तिरोधानके उद्देश्यसे शस्त्र मन्त्रद्वारा पाँच आहुतियोंका हवन करे । इसी तरह पाश वियोगके निमित्त भी पाँच - आहुतियाँ देनी चाहिये। तदनन्तर अस्त्र मन्त्रका सात बार जप करके बीजयुक्त अस्त्र मन्त्ररूपी कटारसे पाशका छेदन करे। उसके लिये मन्त्र इस प्रकार है- 'ॐ हौं शान्तिकलापाशाय नमः हः हूं फट् ।' ॥ ११-१७॥
इसके बाद पाशका विमर्दन तथा वर्तुलीकरण पूर्ववत् अस्त्र मन्त्रसे करके उसे घृतसे भरे हुए - स्रुवेमें रख दे और कला सम्बन्धी अस्त्र मन्त्रद्वारा उसका हवन करे। फिर पाशाङ्कुरकी निवृत्तिके लिये अस्त्र-मन्त्रसे पाँच आहुतियाँ दे और प्रायश्चित्त-निवारणके लिये आठ आहुतियोंका हवन करे। मन्त्र इस प्रकार है- 'ॐ हः अस्त्राय हूं फट् ।' फिर हृदय मन्त्रसे ईश्वरका आवाहन करके पूजन-तर्पण करनेके पश्चात् उन्हें विधिपूर्वक शुल्क समर्पण करे । मन्त्र इस प्रकार है- 'ॐ हां ईश्वर बुद्धयहंकारौ शुल्कं गृहाण स्वाहा।' इसके बाद ईश्वरको शिवकी यह आज्ञा सुनावे – 'ईश्वर! इस पशुके सारे पाश दग्ध हो गये हैं। अब तुम्हें इसके लिये बन्धनकारक होकर नहीं रहना चाहिये' ॥ १८-२३ ॥
–यों कहकर ईश्वर देवका विसर्जन करे और रौद्रीशक्तिसे आत्माको नियोजित करे। जैसे ईशने चन्द्रमाको अपने मस्तकपर आश्रय दे रखा है, उसी प्रकार शिष्यके जीवात्माको गुरु अपने आत्मामें नियोजित करे। फिर शुद्धा उद्भव मुद्राके द्वारा इसकी सूत्रमें संयोजना करे और मूल मन्त्रसे शिष्यके मस्तकपर अमरबिन्दुस्वरूप उस चैतन्यसूत्रको रखे; तदनन्तर पुष्प आदिसे पूजित अग्निके पिता माताका विसर्जन करके विधिज्ञ पुरुष समस्त विधिकी पूर्ति करनेवाली पूर्णाहुति प्रदान करे। इसमें भी पूर्ववत् ताड़न आदि करना चाहिये। विशेषतः कला सम्बन्धी अपने बीजका प्रयोग होना - चाहिये। इस प्रकार शान्तिकलाकी शुद्धि बतायी गयी ॥ २४-२७ ॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'निर्वाण-दीक्षाके अन्तर्गत शान्तिकलाका शोधन' नामक सतासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८७ ॥
Summary of chapter 88 of the Agni Mahā Purana is as follows:
This chapter describes the purification of the highest kalā — the śāntyatīta (beyond śānti), the fifth cosmic level associated with the space element and the grace-bestowing function of Sadāśiva. The 8 bhuvana-s of this kalā represent the innermost circle of creation, closest to Śiva's own nature. The presiding deity is Sadāśiva — the eternally auspicious supreme — and the turīyātīta-avasthā (the state "beyond the fourth") — pure, unconditioned Śiva-consciousness — is the realization associated with this level. The yoga of seven viṣvara (cosmic breaths) — from prāṇa-saṃyoga through to śaktyatīta — is described as the guru's method for leading the śiṣya's consciousness from the gross breath to the transcendent level. The chapter climaxes with the śikhā-chedana (the symbolic cutting of the śiṣya's top-knot), the conferring of the ṣaḍguṇa-prāpti (attainment of six divine qualities), and the final śivakalaśa-abhiṣeka bathing the newly liberated śiṣya with waters from the Śiva kalaśa.