श्रीभगवान् हयग्रीव कहते हैं-
ब्रह्मन् ! ओंकारस्वरूप केशव अपने हाथों में पद्म शङ्ख, चक्र और गदा धारण करनेवाले हैं ('अस्त्र धारणका यह क्रम दाहिने भागके नीचेवाले हाथसे आरम्भ होकर बायें भागके नीचेवाले हाथतक जाता है। अर्थात् केशव दायें भागके निचले हाथमें पद्म, ऊपरवाले हाथमें शङ्ख बायें भागके ऊपरवाले हाथमें चक्र और नीचेवाले हाथमें गदा धारण करते हैं। ऐसा ही सर्वत्र समझना चाहिये। मतान्तरके अनुसार दाहिने हाथके ऊपरवाले हाथसे भी यह क्रम आरम्भ होता है।') नारायण शङ्ख, पद्म, गदा और चक्र धारण करते हैं, मैं प्रदक्षिणापूर्वक उनके चरणोंमें नतमस्तक होता हूँ। माधव गदा, चक्र, शङ्ख और पद्म धारण करनेवाले हैं, मैं उनको नमस्कार करता हूँ। गोविन्द अपने हाथों में क्रमशः चक्र, गदा, पद्म और शङ्ख धारण करनेवाले तथा बलशाली हैं। श्रीविष्णु गदा, पद्म, शङ्ख एवं चक्र धारण करते हैं, वे मोक्ष देनेवाले हैं। मधुसूदन शङ्ख, चक्र, पद्म और गदा धारण करते हैं। मैं उनके सामने भक्तिभावसे नतमस्तक होता हूँ। त्रिविक्रम क्रमशः पद्म, गदा, चक्र एवं शङ्ख धारण करते हैं। भगवान् वामनके हाथों में शङ्ख, चक्र, गदा एवं पद्म शोभा पाते हैं, वे सदा मेरी रक्षा करें ॥ १४॥
श्रीधर कमल, चक्र, शार्ङ्ग धनुष एवं शङ्ख धारण करते हैं। वे सबको सद्गति प्रदान करनेवाले हैं। हृषीकेश गदा, चक्र, पद्म एवं शङ्ख धारण करते हैं, वे हम सबकी रक्षा करें। वरदायक भगवान् पद्मनाभ शङ्ख, पद्म, चक्र और गदा धारण करते हैं। दामोदरके हाथों में पद्म, शङ्ख, गदा और चक्र शोभा पाते हैं, मैं उन्हें प्रणाम करता हूँ। गदा, शङ्ख, चक्र और पद्म धारण करनेवाले वासुदेवने ही सम्पूर्ण जगत्का विस्तार किया है। गदा, शङ्ख, पद्म और चक्र धारण करनेवाले संकर्षण आपलोगोंकी रक्षा करें ॥ ५-७॥
वाद (युद्ध) कुशल भगवान् प्रद्युम्न चक्र, शङ्ख, गदा और पद्म धारण करते हैं। अनिरुद्ध चक्र, गदा, शङ्ख और पद्म धारण करनेवाले हैं, वे हमलोगोंकी रक्षा करें। सुरेश्वर पुरुषोत्तम चक्र, कमल, शङ्ख और गदा धारण करते हैं, भगवान् अधोक्षज पद्म, गदा, शङ्ख और चक्र धारण करनेवाले हैं। वे आपलोगोंकी रक्षा करें। नृसिंहदेव चक्र, कमल, गदा और शङ्ख धारण करनेवाले हैं, मैं उन्हें नमस्कार करता हूँ। श्रीगदा, पद्म, चक्र और शङ्ख धारण करनेवाले अच्युत आपलोगोंकी रक्षा करें। शङ्ख, गदा, चक्र और पद्म धारण करनेवाले बालवटुरूपधारी वामन, पद्म, चक्र, शङ्ख और गदा धारण करनेवाले जनार्दन शङ्ख, पद्म, चक्र और गदाधारी यज्ञस्वरूप श्रीहरि तथा शङ्ख, गदा, पद्म एवं चक्र धारण करनेवाले श्रीकृष्ण मुझे भोग और मोक्ष देनेवाले हों ॥ ८- १२ ॥
आदिमूर्ति भगवान् वासुदेव हैं। उनसे संकर्षण प्रकट हुए। संकर्षणसे प्रद्युम्न और प्रद्युम्नसे अनिरुद्धका प्रादुर्भाव हुआ। इनमें से एक-एक क्रमशः केशव आदि मूर्तियोंके भेदसे तीन-तीन रूपोंमें अभिव्यक्त हुआ (अतः कुल मिलाकर बारह स्वरूप हुए) (तात्पर्य यह है कि वासुदेवसे केशव, नारायण और माधवकी, संकर्षणसे गोविन्द, विष्णु और मधुसूदनकी प्रद्युम्रसे त्रिविक्रम, वामन और श्रीधरको तथा अनिरुद्धसे हृषीकेश, पद्मनाभ एवं दामोदरकी अभिव्यक्ति हुई)। चौबीस मूर्तियोंकी स्तुतिसे युक्त इस द्वादशाक्षर स्तोत्रका जो पाठ अथवा श्रवण करता है, वह निर्मल होकर सम्पूर्ण मनोरथोंको प्राप्त कर लेता है (इस अध्यायमें बारह श्लोक स्तुतिके हैं। प्रत्येक श्लोकमें भगवान्को दो-दो मूर्तियाँका स्तवन हुआ तथा इन बारहों श्लोकोंक आदिका एक-एक अक्षर जोड़नेसे 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' यह द्वादशाक्षर मन्त्र बनता है। इसीलिये इसे द्वादशाक्षर स्तोत्र एवं चौबीस मूर्तियाँका स्तोत्र कहते हैं। श्रीभगवानुवाच -
ॐरूप: केशवः पद्मशङ्खचक्रगदाधरः । नारायणः शङ्खपद्मगदाचक्री प्रदक्षिणम् ॥ १ ॥
नतो गदी माधवोऽरिशङ्खप नमामि तम् । चक्रकौमोदकीपद्मशङ्खी गोविन्द ऊर्जितः ॥ २ ॥
मोक्षदः श्रीगदी पद्मी शङ्खी विष्णुश्च चक्रधृक् । शङ्खचक्राब्जगदिनं मधुसूदनमानमे ॥ ३ ॥
भक्त्या त्रिविक्रमः पद्मगदी चक्री च शङ्ख्यपि । शङ्खचक्रगदापग्री वामनः पातु मां सदा ॥ ४ ॥
गतिदः श्रीधरः पद्मी चक्रशाङ्ग च शङ्ख्यपि। हृषीकेशो गदी चक्री पद्मी शङ्खी च पातु नः ॥ ५ ॥
वरद: पद्मनाभस्तु शङ्खाब्जारिगदाधरः । दामोदरः पद्मशङ्खगदाचक्री नमामि तम् ॥ ६ ॥
तेने गदी शङ्खचक्री वासुदेवोऽब्जभृज्जगत् । संकर्षणो गदी की पद्मी चक्री च पातु वः ॥ ७ ॥
वादी चक्री शङ्खद प्रद्युम्र: पद्मभृत्प्रभुः । अनिरुद्धचक्रगदी शङ्खी पद्मी च पातु नः ॥ ८ ॥
सुरेशोऽब्जशङ्खादयः श्रीगदी पुरुषोत्तमः । अधोक्षजः पद्मगदी शङ्खचक्री च पातु वः ॥ ९ ॥
देवो नृसिंहश्चक्राब्जगदी शङ्खी नमामि तम्। अच्युतः श्रीगदी पद्मी चक्री शङ्खी च पातु वः ॥ १० ॥
बालरूपी शङ्खगदी उपेन्द्रश्चक्रपद्म्यपि । जनार्दनः पद्मचक्री शङ्खधारी गदाधरः ॥ ११ ॥
यज्ञः शङ्ख पद्मचक्री हरिः कौमोदकीधरः । कृष्णः शङ्खी गदी पद्मी चक्री मे भुक्तिमुक्तिदः ॥ १२ ॥
आदिमूर्तिर्वासुदेवस्तस्मात्संकर्षणोऽभवत् । संकर्षणाच्च प्रद्युम्नः प्रद्युम्नादनिरुद्धकः ॥ १३ ॥
केशवादिप्रभेदेन एकैक: स्यात्रिधा क्रमात् ॥ १४ ॥ द्वादशाक्षरकं स्तोत्रं चतुर्विंशतिमूर्तिमत्। य: पठेच्छृणुयाद्वाऽपि निर्मलः सर्वमाप्नुयात् ॥ १५ ॥) ॥ १३ - १५ ॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'श्रीहरिको चाँबीस मूर्तियोंके स्तोत्रका वर्णन' नामक अड़तालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४८ ॥
Summary of chapter 49 of the Agni Mahā Purana is as follows:
This chapter provides a theological summary of the Āgamic system underlying the preceding ritual chapters. The Āgama is defined as the revealed teaching that descends from Śiva to Pārvatī, from Pārvatī to Skanda, and thence to human teachers (ācārya-s). The four pāda-s (sections) of the Āgama — jñāna (knowledge), yoga (discipline), kriyā (ritual), and caryā (conduct) — are described as the four pillars supporting the entire edifice of Śaiva practice. The hierarchical cosmology of 36 tattva-s (from Śiva-tattva at the summit to the gross earth element at the base), the three categories of souls (vijñānakala, pralayākala, and sakala), and the three bonds (āṇava, māyīya, and kārma mala-s) are introduced. The chapter affirms that Āgamic practice — specifically the consecrated worship of the properly installed image — is the most direct path to liberation in the current age.