श्रीभगवान् हयग्रीव कहते हैं-
ब्रह्मन्! मैं प्रतिष्ठाके पाँच अङ्गोंका वर्णन करूँगा प्रतिमा पुरुषका प्रतीक है तो पिण्डिका प्रकृतिका, अथवा प्रतिमा नारायणका स्वरूप है तो पिण्डिका लक्ष्मीका। उन दोनोंके योगको प्रतिष्ठा' कहते हैं। इसलिये इच्छानुरूप फल चाहनेवाले मनुष्योंद्वारा इष्टदेवताकी प्रतिष्ठा (स्थापना) की जाती है। आचार्यको चाहिये कि वह मन्दिरके सामने गर्भसूत्रको निकालकर आठ, सोलह अथवा बीस हाथका मण्डप तैयार करे। इनमें आठ हाथका मण्डप 'निम्न', सोलह हाथका 'मध्यम' और बीस हाथका 'उत्तम' माना गया है। मण्डपमें देवताके स्नानके लिये, कलश स्थापनके लिये तथा याग सम्बन्धी द्रव्योंको रखनेके लिये आधा स्थान सुरक्षित कर ले। फिर मण्डपके आधे या तिहाई भागमें सुन्दर वेदी बनावे उसे बड़े-बड़े कलशों, छोटे-छोटे घड़ों और चंदोवे आदिसे विभूषित करे। पञ्चगव्यसे मण्डपके भीतर स्थानोंका प्रोक्षण करके वहाँ सब सामग्री रखे। तत्पश्चात् गुरु वस्त्र एवं माला आदिसे अलंकृत हो, भगवान् विष्णुका ध्यान करके उनका पूजन करे ॥ १-५॥
अँगूठी आदि भूषणों तथा प्रार्थना आदिसे मूर्तिपालक विद्वानोंका सत्कार करके कुण्ड कुण्डपर उन्हें बिठावे। वे वेदोंके पारंगत हों। चौकोर अर्धचन्द्र, गोलाकार अथवा कमल सदृश आकारवाले कुण्डोंपर उन विद्वानों को विराजमान करना चाहिये। पूर्व आदि दिशाओं में तोरण (द्वार) के लिये पीपल, गूलर, वट और प्लक्षके वृक्षके काष्ठका उपयोग करना चाहिये। पूर्व दिशाका द्वार 'सुशोभन' नामसे प्रसिद्ध है। दक्षिण दिशाका द्वार 'सुभद्र' कहा गया है, पश्चिमका द्वार 'सुकर्मा' और उत्तरका 'सुहोत्र' नामसे प्रसिद्ध है। ये सभी तोरण स्तम्भ पाँच - हाथ ऊँचे होने चाहिये। इनकी स्थापना करके 'स्योना (पूरा मन्त्र इस प्रकार है- स्योना पृथिवि नो भवारा निवेशन च्छा नः शर्मा पृथिवि नो -* (शु० यजु० ३६ | १३) इस मन्त्रसे पूजन करे। तोरण-स्तम्भके मूलभागमें मङ्गल अङ्कुर ( आम्र पल्लव, यवाङ्कुर आदि) से युक्त कलश स्थापित करे ॥ ६ - ९ ॥
तोरणस्तम्भके ऊपरी भागमें सुदर्शनचक्रकी स्थापना करे। इसके अतिरिक्त विद्वान् पुरुषोंको वहाँ पाँच हाथका ध्वज स्थापित करना चाहिये। उस ध्वजकी चौड़ाई सोलह अङ्गुलकी हो । सुरश्रेष्ठ! उस ध्वजका दण्ड सात हाथ ऊँचा होना चाहिये। अरुणवर्ण, अग्निवर्ण (धूम्रवर्ण), कृष्ण, शुक्ल, पीत, रक्त तथा श्वेत- ये वर्ण क्रमशः पूर्वादि दिशाओं में ध्वजमें होने चाहिये। कुमुद, कुमुदाक्ष, पुण्डरीक, वामन, शकुकर्ण, सर्वनेत्र, सुमुख और सुप्रतिष्ठित ये क्रमशः पूर्व आदि - ध्वजोंके पूजनीय देवता हैं। इनमें करोड़ों दिव्य गुण विद्यमान हैं। कलश ऐसे पके हुए हों कि सुपक्व बिम्बफलके समान लाल दिखायी देते हों। वे एक-एक आढक जलसे पूर्णतः भरे हों। उनकी संख्या एक सौ अट्ठाईस हो। उनकी स्थापना ऐसे समय करनी चाहिये, जब कि 'कालदण्ड' नामक योग न हो। उन सभी कलशोंमें सुवर्ण डाला गया हो। उनके कण्ठभागमें वस्त्र लपेटे गये हों। वे जलपर्ण कलश तोरणसे बाहर स्थापित किये जायँ ॥ १० - १५ ॥
वेदीके पूर्व आदि दिशाओं तथा कोणोंमें भी कलश स्थापित करने चाहिये। पहले पूर्वादि चारों दिशाओं में चार कलश स्थापित करे। उस समय 'आजिघ्र (आजिघ्र कलश मह्या त्वा विशन्त्विन्दवः। पुनरुर्जा निवर्तस्व सा नः सहस्रं धुश्वोरुधारा पयस्वती पुनर्माविशताद्रयिः ॥ (यजु० ८।४२)) कलशम्' आदि मन्त्रका पाठ करना चाहिये। उन कलशोंमें पूर्वादि दिशाओंके क्रमसे इन्द्र आदि दिक्पालोंका आवाहनपूर्वक पूजन करे। इन्द्रका आवाहन करते समय इस प्रकार कहे- 'ऐरावत हाथीपर बैठे और हाथमें वज्र धारण किये देवराज इन्द्र ! यहाँ आइये और अन्य देवताओंके साथ मेरे पूर्व द्वारकी रक्षा कीजिये। देवताओंसहित आपको नमस्कार है। इस तरह आवाहन करके विद्वान् पुरुष 'त्रातारमिन्द्रम्० (त्रातारमिन्द्रमवितारमिन्द्रः हवे हवे सुहवः शूरमिन्द्रम्।ह्मयामि शक्रं पुरुहूतमिन्द्रः स्वस्ति नो मघवा धात्विन्द्रः ।। (यजु २०५०)) - इत्यादि मन्त्रसे उनकी अर्चना एवं आराधना करे ॥ १६-१८॥
इसके बाद निम्नाङ्कितरूपसे अग्निदेवका आवाहन करे– 'बकरेपर आरूढ शक्तिधारी एवं बलशाली अग्निदेव! आइये और देवताओंके साथ अग्निकोणकी रक्षा कीजिये। यह पूजा ग्रहण कीजिये। आपको नमस्कार है।' तदनन्तर 'अग्निर्मूर्द्धा०(अग्निर्मूर्द्धा दिवः ककुत्पतिः पृथिव्या अयम् । अपार रेतासि जिन्वति ॥ (यजु० ३।१२))' इत्यादिसे अथवा 'अग्नये नमः । - इस मन्त्रसे अग्निकी पूजा करे। यमराजका आवाहन-'महिषपर आरूढ, दण्डधारी, महाबली सूर्यपुत्र यम! आप यहाँ पधारिये और दक्षिण द्वारकी रक्षा कीजिये। आपको नमस्कार है।' इस प्रकार आवाहन करके 'वैवस्वतं सङ्गमनम्०' इत्यादि मन्त्रसे यमराजकी पूजा करे। निरृतिका आवाहन – 'बल और -वाहनसे सम्पन्न खड्गधारी निऋति! आइये आपके लिये यह अर्घ्य है, यह पाद्य है। आप नैर्ऋत्य दिशाकी रक्षा कीजिये। इस तरह आवाहन करके 'एष( एष ते निर्ऋते भागस्तं जुषस्व स्वाहा (यजु० ९३५)) ते निर्ऋते०' इत्यादिसे मनुष्य अर्घ्य आदि उपचारोंद्वारा निर्ऋतिकी पूजा करे ॥ १९ – २२३ ॥
वरुणका आवाहन – 'मकरपर आरूढ पाशधारी - महाबली वरुणदेव! आइये और पश्चिम द्वारकी रक्षा कीजिये आपको नमस्कार है। इस प्रकार आवाहन करके, 'उरुं (उरुर हि राजा वरुणश्चकार सूर्याय पन्यामन्येतवा उ अपदे पादा प्रतिधातवेऽकरतापवक्ता हृदयाविधचित्। (ऋ० मं० १ सू०२४१८)) हि राजा वरुणः०' इत्यादि मन्त्रों द्वारा आचार्य वरुणदेवताका अर्घ्य आदिसे पूजन करे। वायुदेवताका आवाहन - अपने वाहनपर आरूढ ध्वजधारी महाबली वायुदेव! आइये और देवताओं तथा मरुद्गणोंके साथ वायव्यकोणकी रक्षा कीजिये आपको नमस्कार है।' 'वात (वात आवातु भेषजं शम्भुमयो भु नो इदे प्रण आयूंषि तारिषत् ॥ (ऋ० मं० १० सू० १८६ १)) आवातु०' इत्यादि वैदिक मन्त्रसे अथवा 'ॐ नमो वायवे०।' इस मन्त्रसे वायुकी पूजा करे ॥ २३- २५ ॥
सोमका आवाहन – 'बल और वाहनसे सम्पन्न - गदाधारी सोम! आप यहाँ पधारिये और उत्तर द्वारकी रक्षा कीजिये। कुबेरसहित आपको नमस्कार है।' इस प्रकार आवाहन करके, 'सोमं (सौमद राजानमवसेऽग्निं गीर्भिर्हवामहे आदित्यान् विष्णु सूर्यं ब्रह्माणं च बृहस्पतिम् (ऋ० मं० १० सू० १४१३ तथा यजु० ९।२६)) राजानम्०' इत्यादिसे अथवा 'सोमाय नमः ।' इस मन्त्रसे सोमकी पूजा करे। ईशानका आवाहन – 'वृषभपर आरूढ़ महाबलशाली शूलधारी ईशान! पधारिये और यज्ञ-मण्डपकी ईशान दिशाका संरक्षण कीजिये। आपको नमस्कार है। इस प्रकार आवाहन करके 'ईशानमस्य०' इत्यादिसे अथवा 'ईशानाय नमः।: इस मन्त्रसे ईशानदेवताका पूजन करे। ब्रह्माका आवाहन – 'हाथके अग्रभागमें नुक् और स्रुवा लेकर हंसपर आरूढ हुए अजन्मा ब्रह्माजी ! आइये और लोकसहित यज्ञमण्डपकी ऊर्ध्व दिशाकी रक्षा कीजिये आपको नमस्कार है।' इस प्रकार आवाहन करके 'हिरण्यगर्भः ०(हिरण्यगर्भः समवर्तताग्रे भूतस्य जातः पतिरेक आसीत्। स दाधार पृथिवीं चामुतेमां कस्मै देवाय हविषा विधेम ॥ (यजु०१३।४)) इत्यादिसे अथवा 'नमस्ते ब्रह्मणे' इस मन्त्रसे ब्रह्माजीकी पूजा करे ॥ २६-३० ॥
अनन्तका आवाहन 'कच्छपकी पीठपर विराजमान, नागगणों के अधिपति, चक्रधारी अनन्त ! आइये और नीचेकी दिशाकी रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये। अनन्तेश्वर! आपको नमस्कार है।' इस प्रकार आवाहन करके 'नमोऽस्तु' (नमोऽस्तु सर्पेभ्यो ये के च पृथिवीमनु। ये अन्तरिक्षे ये दिवि तेभ्य: सर्पेभ्यो नमः ॥ (यजु० १३१६)) सर्पेभ्य: ०' इत्यादिसे अथवा 'अनन्ताय नमः' । इस मन्त्रसे भगवान् अनन्तकी पूजा करे ॥ ३१-३२ ॥ ॥
इस प्रकार आदि आग्रेय महापुराणमें 'दस दिक्पालोंके पूजनका वर्णन' नामक छप्पनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५६ ॥
Summary of chapter 57 of the Agni Mahā Purana is as follows:
The fifty-seventh chapter provides the foundational template for the pratiṣṭhā ceremony — the ritual consecration that transforms a crafted image into a living presence of the deity. The seven-day (or in abbreviated form, one-day) structure of the consecration is outlined: the preliminary rites of puṇyāhavācana and nāndīśrāddha, the maṇḍapa construction and kalaśa installation, the adhivāsana (night-vigil with the deity placed on a decorated bed), the main consecration day procedures (jalādhivāsa, dhānyādhivāsa, śayyādhivāsa), and the final prāṇapratiṣṭhā. The navakalaśa arrangement — nine kalaśa-s filled with the nine sacred waters — and the sūtra-saṃdhāna (connecting the deity to the life-thread) are described. The chapter establishes the theological principle that prāṇapratiṣṭhā does not "create" the deity but "reveals" the omnipresent Bhagavān as specifically dwelling in this consecrated form.