अग्निदेव कहते हैं-
वसिष्ठ ! अब मैं तुम्हारे सम्मुख गोनस आदि जातिके सर्पोंके विष चिकित्साका वर्णन करता हूँ, ध्यान देकर सुनो। 'ॐ ह्रां ह्रीं अमलपक्षि स्वाहा' – इस मन्त्रसे अभिमन्त्रित ताम्बूलके प्रयोगसे मन्त्रवेत्ता मण्डली (गोनस) सर्पके विषका हरण करता है। लहसुन,अङ्कोल, त्रिफला, कूट, वच और त्रिकटु इनका सर्पविषमें पान करे। सर्पविषमें स्नुहीदुग्ध, गोदुग्ध, गोदधि और गोमूत्रमें पकाया हुआ गोघृत पान करना चाहिये। राजिलजातीय सर्पके डँस लेनेपर सैन्धवलवण, पीपल, घृत, मधु, गोमयरस और साहीकी आँतका भक्षण करना चाहिये। सर्पदष्ट मनुष्यको पीपल, शर्करा, दुग्ध, घृत और मधुका पान करना चाहिये। त्रिकटु, मयूरपिच्छ, विडालकी अस्थि और नेवलेका रोम– इन सबको समान भाग लेकर चूर्ण बना ले। फिर भेड़के दूधमें भिगोकर उसकी धूप देनेसे सभी प्रकारके विषोंका विनाश होता है। पाठा, निर्गुण्डी और अङ्कोलके पत्रको समान भागमें लेकर तथा सबके समान लहसुन लेकर बनाया हुआ धूप भी विषनाशक है। अगस्त्यके पत्तोंको काँजीमें पकाकर उसकी भापसे डसे हुए स्थानको सेंका जाय, इससे विष उतर जाता है ॥ १-७॥
मूषक सोलह प्रकारके कहे गये हैं। कपासका रस तेलके साथ पान करनेसे 'मूषक विष' का नाश होता है। फलिनी (फलिहारी) के फूलोंका सोंठ और गुड़के साथ भक्षण करना चाहिये। यह विषरोगनाशक है। लूताएँ (मकड़ी) बीस प्रकारक कही गयी हैं। इनके विषकी सावधानीसे चिकित्सा करनी चाहिये। पद्म पद्माक, काष्ठ, पाटला, कूट, तगर, नेत्रबाला, खस, चन्दन, निर्गुण्डी, सारिवा और शेलु (लिसोडा) – ये लूता विषहारीगण हैं। - गुञ्जा, निर्गुण्डी और अङ्कोलके पत्र, सोंठ, हल्दी, दारुहल्दी, करञ्जकी छाल इनको पकाकर - 'लूताविष' से पीड़ित मनुष्यका पूर्वोक्त ओषधियोंसे युक्त जलके द्वारा सेचन करे ॥ ८-१३ ॥
अब 'वृश्चिक-विष' का अपहरण करनेवाली ओषधियोंको सुनो। मञ्जिष्ठा, चन्दन, त्रिकटु तथा शिरीष, कुमुदके पुष्प – इन चारों योगों को एकत्रित करना चाहिये। ये योग लेप आदि करनेपर वृश्चिक-विषका विनाश करते हैं।
'ॐ नमो भगवते रुद्राय चिवि चिवि च्छिन्द च्छिन्द किरि किरि भिन्द भिन्द खड्गेन च्छेदय च्छेदय शूलेन भेदय भेदय चक्रेण दारय दारय ॐ हूं 'हूं फट् ।' इस मन्त्रसे अभिमन्त्रित अगद (औषध) विषार्त मनुष्यको दे। यह गर्दभ आदिके विषका विनाश करता है। त्रिफला, खस, नागरमोथा, नेत्रबाला, जटामांसी, पद्मक और चन्दन इनको बकरीके दूधके साथ पिलानेपर गर्दभ आदि विषोंका नाश होता है। शिरीषका पञ्चाङ्ग और त्रिकटु गोजरके विषका हरण करता है। स्स्रुही दुग्धके साथ सिरसकी छाल 'उन्दूरज दर्दुर' (मेढक) के विषका शमन करती है। त्रिकटु और तगरमूल घृतके साथ प्रयुक्त होनेपर 'मत्स्यविष' का नाश करते हैं। यवक्षार, त्रिकटु वच, हींग, बायबिडंग, सैन्धवलवण, तगर, पाठा, अतिबला और कूट- ये सभी प्रकारके 'कीट विषों' का विनाश करते हैं। मुलहठी, त्रिकटु, गुड और दुग्धका इनका योग 'पागल कुत्ते के विषका हरण करता है ॥ १४–१७॥
'ॐ सुभद्रायै नमः, ॐ सुप्रभायै नमः' - यह ओषधि उखाड़नेका मन्त्र है। भगवान् ब्रह्माने सुप्रभादेवीको आदेश दे रखा है कि मानवगण जो ओषधियाँ बिना विधि-विधानके ग्रहण करते हैं, तुम उन ओषधियोंका प्रभाव ग्रहण करो । इसलिये पहले सुप्रभादेवीको नमस्कार करके ओषधिके चारों ओर मुट्ठीसे जौ बिखेरकर पूर्वोक्त मन्त्रका दस बार जप करके ओषधि नमस्कार करे और कहे- 'तुम ऊर्ध्वनेत्रा हो; मैं तुम्हें उखाड़ता हूँ।' इस विधिसे ओषधिको उखाड़े और निम्नाङ्कित मन्त्रसे उसका भक्षण करे नमः पुरुषसिंहाय नमो गोपालकाय च। आत्मनैवाभिजानाति रणे कृष्णः पराजयम् । अनेन सत्यवाक्येन अगदो मेऽस्तु सिद्धयतु ॥
'पुरुषसिंह भगवान् गोपालको बारंबार नमस्कार है। युद्धमें अपनी पराजयकी बात श्रीकृष्ण ही जानते हैं- इस सत्य वाक्यके प्रभावसे यह अगद मुझे सिद्धिप्रद हो।'
स्थावर विषकी ओषधि आदिमें निम्नलिखित मन्त्रका प्रयोग करना चाहिये―
'ॐ नमो वैदूर्यमात्रे तत्र रक्ष रक्ष मां सर्वविषेभ्यो गौरि गान्धार चाण्डालि मातङ्गिनि स्वाहा हरिमाये।'
विषका भक्षण कर लेनेपर पहले वमन कराके विषयुक्त मनुष्यका शीतल जलसे सेचन करे। तदनन्तर उसको मधु और घृत पिलाये और उसके बाद विरेचन कराये ॥ १८-२४ ॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'गोनसादि-चिकित्सा-कथन' नामक दो सौ अट्ठानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २९८ ॥
Summary of chapter 299 of the Agni Mahā Purana is as follows:
The complete system for identifying and treating bāla-grahas — supernatural afflictions of children from birth through seventeen years — is presented. Thirteen day-by-day grahas assault the newborn in the first two weeks (Pāpinī on day 1, Bhīṣaṇī on day 2, Ghaṇṭāli on day 3, Kākolī on day 4, Haṃsādikā on day 5, Paṭkāri on day 6, Muktakeśī on day 7, Śrī-caṇḍī on day 8, Ūrdhvagrāhi on day 9, Rodanī on day 10). Twelve monthly grahas afflict the child in successive months (Pūtanā in month 1, Mukaṭā in month 2, Gomukhā in month 3, and so on through Yākṣiṇī in month 14, Muṇḍikā in month 15, Vānarī in month 16, and Gandhavati in month 17). For each graha, the specific symptoms, the offering (bali) of food and flowers, the herbal ointment, and the purificatory fumigation are prescribed. The primary protective mantra "Oṃ namaḥ sarva-mātṛbhyaḥ" and the Cāmuṇḍā mantra are declared universally effective for all bāla-graha conditions. Brahmā, Viṣṇu, Śiva, Skanda, Gaurī, Lakṣmī, and the gaṇas are invoked to protect and release the afflicted child.