अग्निदेव कहते हैं –
मनु आदि राजर्षि जिन धर्मोंका अनुष्ठान करके भोग और मोक्ष प्राप्त कर चुके हैं, उनका वरुण देवताने पुष्करको उपदेश किया था और पुष्करने श्रीपरशुरामजीसे उनका वर्णन किया था ॥ १ ॥
पुष्करने कहा-
परशुरामजी! मैं वर्ण, आश्रम तथा इनसे भिन्न धर्मोंका आपसे वर्णन करूँगा । वे धर्म सब कामनाओंको देनेवाले हैं। मनु आदि धर्मात्माओंने भी उनका उपदेश किया है तथा वे भगवान् वासुदेव आदिको संतोष प्रदान करनेवाले हैं। भृगु श्रेष्ठ ! अहिंसा, सत्य-भाषण, दया, सम्पूर्ण प्राणियोंपर अनुग्रह, तीर्थोका अनुसरण, दान, ब्रह्मचर्य, मत्सरताका अभाव, देवता, गुरु और ब्राह्मणोंकी सेवा, सब धर्मोका श्रवण, पितरोंका पूजन, मनुष्यों के स्वामी श्रीभगवान्में सदा भक्ति रखना, उत्तम शास्त्रोंका अवलोकन करना, क्रूरताका अभाव, सहनशीलता तथा आस्तिकता (ईश्वर और परलोकपर विश्वास रखना) – ये वर्ण और आश्रम दोनोंके लिये - 'सामान्य धर्म' बताये गये हैं। जो इसके विपरीत है, वही 'अधर्म' है। यज्ञ करना और कराना, दान देना, वेद पढ़ानेका कार्य करना, उत्तम प्रतिग्रह लेना तथा स्वाध्याय करना- ये ब्राह्मणके कर्म हैं। दान देना, वेदोंका अध्ययन करना और विधिपूर्वक यज्ञानुष्ठान करना- ये क्षत्रिय और वैश्यके सामान्य कर्म हैं। प्रजाका पालन करना और दुष्टोंको दण्ड देना- ये क्षत्रियके विशेष धर्म हैं। खेती, गोरक्षा और व्यापार- ये वैश्यके विशेष कर्म बताये गये हैं। ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य — इन द्विजोंकी सेवा तथा सब प्रकार की - शिल्प रचना- ये शूद्रके कर्म हैं ॥ २-९ ॥
मौजी बन्धन ( यज्ञोपवीत संस्कार) होनेसे ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य बालकका द्वितीय - जन्म होता है; इसलिये वे 'द्विज' कहलाते हैं। यदि अनुलोम-क्रमसे वर्णोंकी उत्पत्ति हो तो माताके समान बालककी जाति मानी गयी है ॥ १० ॥
विलोम-क्रमसे अर्थात् शूद्रके वीर्यसे उत्पन्न हुआ ब्राह्मणीका पुत्र 'चाण्डाल' कहलाता है, क्षत्रियके वीर्यसे उत्पन्न होनेवाला ब्राह्मणीका पुत्र 'सूत' कहा गया है और वैश्यके वीर्यसे उत्पन्न होनेपर उसकी 'वैदेहक' संज्ञा होती है। क्षत्रिय जातिकी स्त्रीके पेटसे शूद्रके द्वारा उत्पन्न हुआ विलोमज पुत्र 'पुक्कस' कहलाता है। वैश्य और शूद्रके वीर्यसे उत्पन्न होनेपर क्षत्रियाके पुत्रकी क्रमश: 'मागध' और 'अयोगव' संज्ञा होती है।वैश्य जातिकी स्त्रीके गर्भसे शूद्र एवं विलोमज जातियों द्वारा उत्पन्न विलोमज संतानोंके हजारों भेद हैं। इन सबका परस्पर वैवाहिक सम्बन्ध समान जातिवालोंके साथ ही होना चाहिये; अपनेसे ऊँची और नीची जातिके लोगोंके साथ नहीं ॥ ११-१३ ॥
वधके योग्य प्राणियोंका वध करना- यह चाण्डालका कर्म बताया गया है। स्त्रियोंके उपयोगमें आनेवाली वस्तुओंके निर्माणसे जीविका चलाना तथा स्त्रियोंकी रक्षा करना- यह 'वैदेहक' का कार्य है। सूतोंका कार्य है- घोड़ोंका सारथिपना, 'पुक्कस' व्याध-वृत्तिसे रहते हैं तथा 'मागध' का कार्य है- स्तुति करना, प्रशंसाके गीत गाना । 'अयोगव'का कर्म है– रङ्गभूमिमें उतरना और शिल्पके द्वारा जीविका चलाना। 'चाण्डाल 'को गाँवके बाहर रहना और मुर्देसे उतारे हुए वस्त्रको धारण करना चाहिये। चाण्डालको दूसरे वर्णके लोगोंका स्पर्श नहीं करना चाहिये। ब्राह्मणों तथा गौओंकी रक्षाके लिये प्राण त्यागना अथवा स्त्रियों एवं बालकोंकी रक्षाके लिये देह त्याग करना वर्ण-बाह्य चाण्डाल आदि जातियोंकी सिद्धिका (उनकी आध्यात्मिक उन्नति) का कारण माना गया है। वर्णसंकर व्यक्तियोंकी जाति उनके पिता-माता तथा जातिसिद्ध कर्मोंसे जाननी चाहिये ॥ १४-१८ ॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'वर्णान्तर धर्मोका वर्णन' नामक एक सौ इक्यावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १५१ ॥
Summary of chapter 153 of the Agni Mahā Purana is as follows:
The code of conduct for a student residing in the guru's house (guru-kula) is described in detail. Agni prescribes the brahmacārī's duties: Vedic study (svādhyāya), service to the guru (guru-śuśrūṣā), maintenance of the sacred fire (samidh-āhāra), begging for food (bhaikṣacarya), and strict celibacy. Prohibited behaviors include sleeping on a high bed, self-ornamentation, music, and association with women. The chapter describes how a model brahmacārī accumulates the tejas that will sustain him through the subsequent āśramas and ultimately qualifies him for mokṣa.