अग्निदेव कहते हैं-
वसिष्ठ! अब मैं दिवस सम्बन्धी व्रतोंका वर्णन करता हूँ। सबसे पहले 'धेनुव्रत' के विषयमें बतलाता हूँ। जो मनुष्य विपुल स्वर्णराशिके साथ उभयमुखी गौका दान करता है और एक दिनतक पयोव्रतका आचरण करता है, वह परमपदको प्राप्त होता है। स्वर्णमय कल्पवृक्षका दान देकर तीन दिनतक 'पयोव्रत' करनेवाला ब्रह्मपदको प्राप्त कर लेता है। इसे 'कल्पवृक्ष-व्रत' कहा गया है। बीस पलसे अधिक स्वर्णकी पृथ्वीका निर्माण कराके दान दे और एक दिन पयोव्रतका अनुष्ठान करे। केवल दिनमें व्रत रखनेसे मनुष्य रुद्रलोकको प्राप्त होता है। जो प्रत्येक पक्षकी तीन रात्रियों में 'एकभुक्त व्रत रखता है, वह दिनमें निराहार रहकर 'त्रिरात्रव्रत' करनेवाला मनुष्य विपुल धन प्राप्त करता है। प्रत्येक मासमें तीन एकभुक्त नक्तव्रत करनेवाला गणपतिके सायुज्यको प्राप्त होता है। जो भगवान् जनार्दनके उद्देश्यसे 'त्रिरात्रव्रत' का अनुष्ठान करता है, वह अपने सौ कुलोंके सा भगवान् श्रीहरिके वैकुण्ठधामको जाता है। व्रतानुरागी मनुष्य मार्गशीर्षके शुक्लपक्षकी नवमीसे विधिपूर्वक त्रिरात्रव्रत प्रारम्भ करे। 'नमो भगवते वासुदेवाय' मन्त्रका सहस्र अथवा सौ बार जप करे। अष्टमीको एकभुक्त (दिनमें एक बार भोजन करना) व्रत और नवमी, दशमी, एकादशीको उपवास करे। द्वादशीको भगवान् श्रीविष्णुका पूजन करे यह व्रत कार्तिकमें करना चाहिये। व्रतकी समाप्तिपर ब्राह्मणों को भोजन कराके, उन्हें वस्त्र, शय्या, आसन, छत्र, यज्ञोपवीत और पात्र दान करे देते समय ब्राह्मणोंसे यह प्रार्थना करे – 'इस दुष्कर व्रतके अनुष्ठानमें मेरे द्वारा जो - त्रुटि हुई हो, आप लोगोंकी आज्ञासे वह परिपूर्ण हो जाय।' यह 'त्रिरात्रव्रत' करनेवाला इस लोकमें भोगोंका उपभोग करके मृत्युके पश्चात् भगवान् श्रीविष्णुके सांनिध्यको प्राप्त करता है ॥ १- ११॥
अब मैं भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाले कार्तिकव्रतके विषयमें कहता हूँ। दशमीको पञ्चगव्यका प्राशन करके एकादशीको उपवास करे । इस व्रतके पालनमें कार्तिक शुक्लपक्षकी द्वादशीको श्रीविष्णुका पूजन करनेवाला मनुष्य विमानचारी देवता होता है। चैत्रमें त्रिरात्रव्रत करके केवल रात्रिके समय भोजन करनेवाला एवं व्रतकी समाप्तिमें पाँच बकरियोंका दान देनेवाला सुखी होता है। कार्तिक शुक्लपक्षकी षष्ठीसे आरम्भ करके तीन दिनतक केवल दुग्ध पीकर रहे। फिर तीन दिनतक उपवास करे। इसे 'माहेन्द्रकृच्छ्र कहा जाता है। कार्तिकके शुक्लपक्षकी एकादशीको आरम्भ करके 'पञ्चरात्रव्रत' करे। प्रथम दिन दुग्धपान करे, दूसरे दिन दधिका आहार करे, फिर तीन दिन उपवास करे। यह अर्थप्रद 'भास्करकृच्छ्र' कहलाता है। शुक्लपक्षकी पञ्चमीसे आरम्भ करके छः दिनतक
क्रमशः यवकी लपसी, शाक, दधि, दुग्ध, घृत और जल- इन वस्तुओंका आहार करे। इसे 'सांतपनकृच्छ्र' कहा गया है ॥ १२ – १६ ॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'दिवस सम्बन्धी व्रतका वर्णन' नामक एक सौ सत्तानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १९७ ॥
Summary of chapter 199 of the Agni Mahā Purana is as follows:
A collection of miscellaneous vratas of varied structure and purpose is presented. Ṛtu-vratas spanning the four seasons—varṣā, śarad, hemanta, śiśira—prescribe indhana-dāna (firewood gift) and mṛta-dhenu-dāna in succession. The Sarasvatī-vrata requires one month of mouna at the sandhyā-times with dāna of mṛta-kumbha, tila, ghaṇṭā, and vastra; it grants eloquence and Sarasvatī's blessing. Pañcāmṛta-snāna combined with go-dāna for one full year confers rājatva. The Makara-saṃkrānti prātaḥ-snāna followed by Keśava-arcana and the gift of thirty-two palas of gold removes all pāpa. The Umā-vrata performed on tṛtīyā and aṣṭamī with Gaurī-Maheśvara pūjā bestows akhaṇḍa-saubhāgya on women; remarkably, women who faithfully perform the Mūla-vrata, Umeśa-vrata, or Sūrya-bhakti are said to attain puruṣatva in their next birth.