श्रीभगवान् हयग्रीव कहते हैं-
ब्रह्मन् ! अब मैं प्रतिमाओंकी पिण्डिकाका लक्षण बता रहा हूँ। पिण्डिका लंबाईमें तो प्रतिमाके बराबर होनी चाहिये और चौड़ाईमें उससे आधी उसकी ऊँचाई भी प्रतिमाकी लंबाईसे आधी हो और उस अर्द्धभागके बराबर ही वह सुविस्तृत हो अथवा उसका विस्तार लंबाईके तृतीयांशके तुल्य हो । उसके एक तिहाई भागको लेकर मेखला बनावे । पानी बहनेके लिये जो खात या गर्त हो, उसका माप भी मेखलाके ही तुल्य रहे। वह खात उत्तर दिशाकी ओर कुछ नीचा होना चाहिये। पिण्डिकाके विस्तारके एक चौथाई भागसे जलके निकलनेका मार्ग ( प्रणाल) बनाना चाहिये। मूल भाग में उसका विस्तार मूलके ही बराबर हो, परंतु आगे जाकर वह आधा हो जाय। पिण्डिका विस्तारके एक तिहाई भागके अथवा पिण्डिकाके आधे भागके बराबर वह जलमार्ग हो। उसकी लंबाई प्रतिमाकी लंबाईके तुल्य ही बतायी गयी है। अथवा प्रतिमा ही उसकी लंबाईके तुल्य हो। इस बातको अच्छी तरह समझकर उसका सूत्रपात करे ॥ १-५॥ प्रतिमाकी ऊँचाई पूर्ववत् सोलह भागकी संख्याके अनुसार करे। छः और दो अर्थात् आठ भागोंको नीचेके आधे अङ्गमें गतार्थ करे। इससे ऊपरके तीन भागको लेकर कण्ठका निर्माण करे। शेष भागोंको एक-एक करके प्रतिष्ठा, निर्गम तथा पट्टिका आदिमें विभाजित करे। यह सामान्य प्रतिमाओंमें पिण्डिकाका लक्षण बताया गया है। प्रासादके द्वारके दैर्घ्य विस्तारके अनुसार - प्रतिमा गृहका भी द्वार कहा गया है। प्रतिमाओं में । हाथी और व्याल (सर्प या व्याघ्र आदि) की मूर्तियोंसे युक्त तत्तत्-देवताविषयक शोभाकी रचना करे ॥ ६ - ८॥
श्रीहरिकी पिण्डिका भी सदा यथोचित शोभासे सम्पन्न बनायी जानी चाहिये। सभी देवताओंकी प्रतिमाओंके लिये वही मान बताया जाता है, जो विष्णु प्रतिमाके लिये कहा गया है तथा सम्पूर्ण देवियोंके लिये भी वही मान बताया जाता है, जो लक्ष्मीजीकी प्रतिमाके लिये कहा गया है ॥ ९-१०॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'पिण्डिकाके लक्षणका वर्णन' नामक पचपनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५५ ॥
Summary of chapter 56 of the Agni Mahā Purana is as follows:
This chapter addresses the examination, purification, and ritual qualification of a newly made divine image before its consecration. The śilpin (sculptor) and the ācārya must together examine the image for defects — incorrect proportions, cracks, improper posture, missing attributes, asymmetrical limbs — and only a flawless image may proceed to installation. Specific tests are described: an image placed in water must float with its face upward; one buried in grain overnight must show auspicious signs upon exhumation. The purification of the image through successive baths in sacred waters, application of herbal pastes, fumigation with specific resins, and the recitation of mantras over it are detailed. The chapter affirms that the purification of the image is simultaneously the purification of the space it will inhabit, and that a properly examined and purified image truly becomes a dwelling of the divine.