पुष्कर कहते हैं-
परशुराम ! अब मैं भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाले 'यजुर्विधान' का वर्णन करता हूँ, सुनो। ॐ कार संयुक्त महाव्याहृतियाँ समस्त पापोंका विनाश करनेवाली और सम्पूर्ण कामनाओंको देनेवाली मानी गयी हैं। विद्वान् पुरुष इनके द्वारा एक हजार घृताहुतियाँ देकर देवताओंकी आराधना करे। परशुराम ! इससे मनोवाञ्छित कामनाकी सिद्धि होती है; क्योंकि यह कर्म अभीष्ट मनोरथ देनेवाला है। शान्तिकी इच्छावाला पुरुष प्रणवयुक्त व्याहृति मन्त्रसे जौकी आहुति दे और जो पापोंसे मुक्ति चाहता हो, वह उक्त मन्त्रसे तिलों द्वारा हवन करे। धान्य एवं पीली सरसोंके हवनसे समस्त कामनाओंकी सिद्धि होती है। परधनकी कामनावाले के लिये गूलरकी समिधाओंद्वारा होम प्रशस्त माना गया है। अन्न चाहनेवाले के लिये दधिसे, शान्तिकी इच्छा करनेवाले के लिये दुग्धसे एवं प्रचुर सुवर्णकी कामना करनेवाले के लिये अपामार्गकी समिधाओंसे हवन करना उत्तम माना गया है। कन्या चाहनेवाला एक सूत्रमें ग्रथित दो-दो जातीपुष्पोंको घीमें डुबोकर उनकी आहुति दे। ग्रामाभिलाषी तिल एवं चावलोंका हवन करे वशीकरण कर्ममें शाखोट (सिंहोर), वासा (अडूसा) और अपामार्ग (चिचिड़ा या ऊँगा) की समिधाओंका होम करना चाहिये। - भृगुनन्दन ! रोगका नाश करनेके लिये विष एवं रक्तसे सिक्त समिधाओंका हवन प्रशस्त है। शत्रुओं के वधकी इच्छासे उक्त समिधाओंका क्रोधपूर्वक भलीभाँति हवन करे। द्विज सभी धान्योंसे राजाकी प्रतिमाका निर्माण करे और उसका हजार बार हवन करे। इससे राजा वशमें हो जाता है। वस्त्राभिलाषीको पुष्पोंसे हवन करना चाहिये। दूर्वाका होम व्याधिका विनाश करनेवाला है। ब्रह्मतेजकी इच्छा करनेवाले पुरुषके लिये भगवत्प्रीत्यर्थ वासोग्य (उत्तम वस्त्र) अर्पण करनेका विधान है। विद्वेषण-कर्मके लिये प्रत्यङ्गिराप्रोक्त विधिके अनुसार स्थापित अग्निमें धानकी भूसी, कण्टक और भस्मके साथ काक और उलूकके पंखोंका हवन करे। ब्रह्मन् ! चन्द्रग्रहण के समय कपिला गायके घीसे गायत्री मन्त्रद्वारा आहुति देकर उस घीमें वचाका चूर्ण मिलाकर 'सम्पात' नामक आहुति दे और अवशिष्ट वचाको लेकर उसे गायत्री मन्त्रसे एक सहस्र बार अभिमन्त्रित करे। फिर उस वचाको खानेसे मनुष्य मेधावी होता है। लोहे या खदिर काष्ठकी ग्यारह अङ्गुल लंबी कील 'द्विषतो वधोऽसि०' (१ । २८) आदि मन्त्रका जप करते हुए शत्रुके घरमें गाड़ दे। यह मैंने तुमसे शत्रुओंका नाश और उच्चाटन करनेवाला कर्म बतलाया है। 'चक्षुष्पा०' (२ १६) इत्यादि मन्त्र अथवा चाक्षुषी-जपसे मनुष्य अपनी खोयी हुई नेत्रज्योतिको पुनः पा लेता है। 'उपयुञ्जत०' इत्यादि अनुवाक अन्नकी प्राप्ति करानेवाला है। 'तनूपा अग्नेऽसि०' (३ । १७) इत्यादि मन्त्रद्वारा दूर्वाका होम करनेसे मनुष्यका संकट दूर हो जाता है। 'भेषजमसि०' (३ । ५९) इत्यादि मन्त्रसे दधि एवं घृतका हवन किया जाय तो वह पशुओंपर आनेवाली महामारी रोगोंको दूर कर देता है। 'त्र्यम्बकं यजामहे० ' (३।६० ) – इस मन्त्रसे किया हुआ होम सौभाग्यकी वृद्धि करनेवाला है। कन्याका नाम लेकर अथवा कन्याके उद्देश्यसे यदि उक्त मन्त्रका जप और होम किया जाय तो वह कन्याकी प्राप्ति करानेवाला उत्तम साधन है। भय उपस्थित होनेपर 'त्र्यम्बकं०' (३ । ६०) मन्त्रका नित्य जप करनेवाला पुरुष सब प्रकारके भयोंसे छुटकारा पा जाता है। परशुराम ! घृतसहित धतूरेके फूलकी उक्त मन्त्रसे आहुति देकर साधक अपनी सम्पूर्ण कामनाओंको प्राप्त कर लेता है। जो 'त्र्यम्बक' मन्त्रसे गुग्गुलकी आहुति देता है, वह स्वप्नमें भगवान् शंकरका दर्शन पाता है। 'युञ्जते मनः०' (५।१४) - इस अनुवाकका जप करनेसे दीर्घ आयुकी प्राप्ति होती है। 'विष्णो रराटमसि०' (५ । २१) आदि मन्त्र सम्पूर्ण बाधाओंका निवारण करनेवाला है। यह मन्त्र राक्षसोंका नाशक, कीर्तिवर्द्धक एवं विजयप्रद है। 'अयं नो अग्निः ० ' (५।३७) इत्यादि मन्त्र संग्राममें विजय दिलानेवाला है। स्नानकालमें 'इदमाप: प्रवहत०' इत्यादि (६ | १७) मन्त्रका जप पापनाशक है। दस अङ्ग लंबी लोहेकी सुईको 'विश्वकर्मन् हविषा०' ( १७ । २२ ) – इस मन्त्रसे अभिमन्त्रित करके जिस कन्याके द्वारपर गाड़ दे, वह कन्या दूसरे किसीको नहीं दी जा सकती। 'देव सवितः ०' (११।७) - इस मन्त्रसे होम करनेपर मनुष्य प्रचुर अन्न राशिसे सम्पन्न होता है ॥ १- २२ ॥
धर्मज्ञ जमदग्निनन्दन! बलकी इच्छा रखनेवाला श्रेष्ठ द्विज 'अग्रौ स्वाहा०' मन्त्रसे तिल, यव, 4 अपामार्ग एवं तण्डुलोंसे युक्त हवन सामग्रीद्वारा होम करे। विप्रवर! इसी मन्त्रसे गोरोचनको सहस्र बार अभिमन्त्रित करके उसका तिलक करनेसे मनुष्य लोकप्रिय हो जाता है। रुद्र-मन्त्रों का जप सम्पूर्ण पापोंका विनाश करनेवाला है। उनके द्वारा किया गया होम सम्पूर्ण कर्मोंका साधक और सर्वत्र शान्ति प्रदान करनेवाला है। धर्मज्ञ भृगुनन्दन! बकरी, भेड़, घोड़े, हाथी, गौ, मनुष्य, राजा, बालक, नारी, ग्राम, नगर और देश यदि विविध उपद्रवोंसे पीड़ित एवं रोगग्रस्त हो गये हों, अथवा महामारी या शत्रुओंका भय उपस्थित हो गया हो तो घृतमिश्रित खीरसे रुद्रदेवताके लिये किया गया होम परम शान्तिदायक होता है। रुद्रमन्त्रोंसे कूष्माण्ड एवं घृतका होम सम्पूर्ण पापोंका विनाश करता है। नरश्रेष्ठ ! जो मानव केवल रातमें सत्तू, जौकी लप्सी एवं भिक्षान्न भोजन करते हुए एक मासतक बाहर नदी या जलाशयमें स्नान करता है, वह ब्रह्महत्या के पापसे मुक्त हो जाता है। 'मधुवाता०' (१३ । २७) इत्यादि मन्त्रसे होम आदिका अनुष्ठान करनेपर सब कुछ मिलता है। 'दधिक्राव्णो०' (२३ । ३२) - इस मन्त्रसे हवन करके गृहस्थ पुत्रों को प्राप्त करता है, इसमें संशय नहीं है। इसी प्रकार 'घृतवती भुवनानामभि०' (३४ । ४५ ) – इस मन्त्रसे किया गया घृतका होम आयुको बढ़ानेवाला है। 'स्वस्ति न इन्द्रो० ' ( २५ । १९ ) – यह मन्त्र समस्त बाधाओंका निवारण करनेवाला है। 'इह गावः प्रजायध्वम्०'– यह मन्त्र पुष्टिवर्धक है। इससे घृतकी एक हजार आहुतियाँ देनेपर दरिद्रताका विनाश होता है। 'देवस्य त्वा०' – इस मन्त्र स्स्रुवाद्वारा अपामार्ग और तण्डुलका हवन करनेपर मनुष्य विकृत अभिचारसे शीघ्र छुटकारा पा जाता है, इसमें संशय नहीं है। 'रुद्र यत्ते० ' (१० । २० ) मन्त्रसे पलाशकी समिधाओंका हवन करनेसे सुवर्णकी उपलब्धि होती है। अग्निके उत्पातमें मनुष्य 'शिवो भवः' (११। ४५) मन्त्रसे धान्यकी आहुति दे। 'या सेना:०' (११ । ७७ ) – इस मन्त्र किया गया हवन चोरोंसे प्राप्त होनेवाले भयको दूर करता है। ब्रह्मन् ! जो मनुष्य यो अस्मभ्यमरातीयात्०' (११।८० ) - इस मन्त्रसे काले तिलोंकी एक हजार आहुति देता है, वह विकृत अभिचारसे मुक्त हो जाता है। 'अन्नपते० ' ( ११ ८३ ) – इस मन्त्रसे अन्नका हवन करनेसे मनुष्यको प्रचुर अन्न प्राप्त होता है। ‘हंसः शुचिषत्०' (१०।२४) इत्यादि मन्त्रका जल में किया गया जप समस्त पापोंका नाश करता है। 'चत्वारि शृङ्गा०' (१७ ९१) इत्यादि मन्त्रका जलमें किया गया जप समस्त पापोंका अपहरण करनेवाला है। 'देवा यज्ञमतन्वत०' (१९ । १२) इसका जप करके साधक ब्रह्मलोकमें पूजित होता है। 'वसन्तो स्यासीद्' (३१ । १४) इत्यादि मन्त्रसे घृतकी आहुति देनेपर भगवान् सूर्यसे अभीष्ट वरकी प्राप्ति होती है। 'सुपर्णोऽसि०' (१७ । ७२) इत्यादि मन्त्रसे साध्यकर्म व्याहृति मन्त्रोंसे साध्यकर्म समान ही होता है। 'नमः स्वाहा०' आदि मन्त्रका | तीन बार जप करके मनुष्य बन्धनसे मोक्ष प्राप्त कर लेता है। जलके भीतर 'द्रुपदादिव मुमुचान: ० ' (२०।२०) इत्यादि मन्त्रकी तीन आवृत्तियाँ करके | मनुष्य समस्त पापोंसे मुक्त हो जाता है। 'इह | गावः प्रजायध्वम्० – इस मन्त्रसे घृत, दधि, दुग्ध अथवा खीरका हवन करनेपर बुद्धिकी वृद्धि होती है। 'शं नो देवी:०' (३६। १२) - इस मन्त्रसे पलाशके फलोंकी आहुति देनेसे मनुष्य आरोग्य, लक्ष्मी और दीर्घ जीवन प्राप्त करता है। 'ओषधीः प्रतिमोदध्वम्०' (१२ ७७ ) - इस मन्त्रसे बीज बोने और फसल काटनेके समय होम करनेपर अर्थकी प्राप्ति होती है। 'अश्वावतीर्गोमतीर्न उषासो०' (३४।४०) मन्त्रसे पायसका होम करनेसे शान्तिकी प्राप्ति होती है। 'तस्मा अरं गमाम०' (३६।१६) इत्यादि मन्त्रसे होम करनेपर बन्धनग्रस्त मनुष्य मुक्त हो जाता है। 'युवा सुवासा०' (तै० ब्रा० ३ । ६ । १३) इत्यादि मन्त्रसे हवन करनेपर उत्तम वस्त्रों की प्राप्ति होती है। 'मुञ्चन्तु मा शपथ्यात्०' ( १२ । ९० ) इत्यादि मन्त्रसे हवन करनेपर शाप या शपथ आदि समस्त किल्बिषोंका नाश होता है। 'मा मा हिंसीज्जनिता:० (१२ । १०२) इत्यादि मन्त्रसे घृतमिश्रित तिलोंका होम शत्रुओं का विनाश करनेवाला होता है। 'नमोऽस्तु सर्पेभ्यो०' (१३।६) इत्यादि मन्त्रसे घृतका होम एवं 'कृणुष्व पाजः०' (१३ । ९) इत्यादि मन्त्रसे खीरका होम अभिचारका उपसंहार करनेवाला है। 'काण्डात् काण्डातू॰ ' (१३ २०) इत्यादि मन्त्रसे दूर्वाकाण्डकी दस हजार आहुतियाँ देकर होता ग्राम या जनपदमें फैली हुई महामारीको शान्त करे। इससे रोगपीड़ित मनुष्य रोगसे और दुःखग्रस्त मानव दुःखसे छुटकारा पाता है। परशुराम ! 'मधुमान्नो वनस्पतिः०' (१३ २९) इत्यादि मन्त्रसे उदुम्बरकी एक हजार समिधाओंका हवन करके मनुष्य धन प्राप्त करता है तथा महान् सौभाग्य एवं व्यवहारमें विजय लाभ करता है। 'अपां गम्भन्सीद मा त्वा०' (वा० १३ । ३०) इत्यादि मन्त्रसे हवन करके मनुष्य निश्चय ही पर्जन्यदेवसे वर्षा करवा सकता है। धर्मज्ञ परशुराम! 'अपः पिवन् वौषधी:०' (१४। ८) इत्यादि मन्त्रसे दधि, घृत एवं मधुका हवन करके यजमान तत्काल महावृष्टि करवाता है। 'नमस्ते रुद्र०' (१६ । १) इत्यादि मन्त्रसे आहुति दी जाय तो यह कर्म समस्त उपद्रवोंका नाशक, सर्वशान्तिदायक तथा महापातकोंका निवारक कहा गया है। 'अध्यवोचदधिवक्ता०' (१६ । ५) इत्यादि मन्त्रसे आहुति देनेपर व्याधिग्रस्त मनुष्यकी रक्षा होती है। इस मन्त्रसे किया गया हवन राक्षसोंका नाशक, कीर्तिकारक तथा दीर्घायु एवं पुष्टिका वर्धक है। मार्गमें सफेद सरसों फेंकते हुए इसका जप करनेवाला राहगीर सुखी होता है। धर्मज्ञ भृगुनन्दन! 'असौ यस्ताम्र:०' (१६।६ ) - इसका पाठ करते हुए नित्य प्रातः काल एवं सायंकाल आलस्यरहित होकर भगवान् सूर्यका उपस्थान करे। इससे वह अक्षय अन्न एवं दीर्घ आयु प्राप्त करता है। 'प्रमुञ्च धन्वन्० (१६ । ९-१४) इत्यादि छः मन्त्रोंसे किया गया आयुधोंका अभिमन्त्रण युद्ध में शत्रुओंके लिये भयदायक है, इसमें कोई अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये। 'मा नो महान्तम्०' (१६।१५) इत्यादि मन्त्रका जप एवं होम बालकोंके लिये शान्तिकारक होता है। 'नमो हिरण्यबाहवे.' (१६ १७) इत्यादि सात अनुवाकोंसे कडुए तेलमें मिलायी गयी राईकी आहुति दे तो वह शत्रुओंका नाश करनेवाली होती है। 'नमो वः किरिकेभ्यो० " (१६। ४६) – इस अर्धमन्त्रसे एक लाख कमल पुष्पोंका हवन करके मनुष्य राज्यलक्ष्मी प्राप्त कर लेता है तथा बिल्वफलोंसे उतनी ही आहुतियाँ देनेपर उसे सुवर्णराशिकी उपलब्धि होती है। 'इमा रुद्राय०' (१६ ४८) मन्त्रसे तिलोंका होम करनेपर धनकी प्राप्ति होती है। एवं इसी मन्त्रसे घृतसिक्त दूर्वाका हवन करनेपर मनुष्य समस्त व्याधियोंसे मुक्त होता है। परशुराम! 'आशुः) शिशानः०' (१७ | ३३) - यह मन्त्र आयुधोंकी रक्षा एवं संग्राममें सम्पूर्ण शत्रुओं का विनाश करनेवाला है। धर्मज्ञ द्विज श्रेष्ठ! 'वाजश्च मे० ' (१८ । १५ – १९) इत्यादि पाँच मन्त्रोंसे घृतकी एक हजार आहुतियाँ दे। इससे मनुष्य नेत्ररोगसे मुक्त हो जाता है। 'शं नो वनस्पते० ' (१९ । ३८) इस मन्त्रसे घरमें आहुति देनेपर वास्तुदोषका नाश होता है। 'अग्न आयूंषि०' (१९।३८) इत्यादि मन्त्रसे घृतका हवन करके मनुष्य किसीका द्वेषपात्र नहीं होता। 'अपां फेनेन०' (१९।७१) मन्त्रसे लाजाका होम करके योद्धा विजय प्राप्त करता है। 'भद्रा उत प्रशस्तयो०' (१४।३९) इत्यादि मन्त्रके जपसे इन्द्रियहीन अथवा दुर्बलेन्द्रिय मनुष्य समस्त इन्द्रियोंकी शक्तिसे सम्पन्न हो जाता है। 'अनिश्च पृथिवी च०' (२६ । १) इत्यादि मन्त्र उत्तम वशीकरण है। 'अध्वना०' (५।३३) आदि मन्त्रका जप करनेवाला मनुष्य व्यवहार (मुकदमे) में विजयी होता है। कार्यके आरम्भमें 'ब्रह्म क्षत्रं पवते.' (१९।५) इत्यादि मन्त्रका जप सिद्धि प्रदान करता है। 'संवत्सरोऽसि०' (२७।४५) इत्यादि मन्त्रसे घृतकी एक लाख आहुतियाँ देनेवाला रोगमुक्त हो जाता है। 'केतुं कृण्वन्० ' (२९ । ३७) इत्यादि मन्त्र संग्राममें विजय दिलानेवाला है। 'इन्द्रोऽग्निर्धर्मः' मन्त्र युद्धमें धर्मसंगत विजयकी प्राप्ति कराता है। 'धन्वना गा०' (२९ । ३९) मन्त्रका धनुष ग्रहण करनेके समय जप करना उत्तम माना गया है। 'यजीत०'– यह मन्त्र धनुषकी प्रत्यञ्चाको अभिमन्त्रित करनेके लिये है, ऐसा जानना चाहिये। 'अहिरिव भोगैः ०' (२९ । ५१) मन्त्रका बाणोंको अभिमन्त्रित करने में प्रयोग करे। 'वह्नीनां पिता०' (२९ । ४२) – यह तूणीरको अभिमन्त्रित करनेका मन्त्र बतलाया गया है। 'युञ्जन्त्यस्य ' (२३ ६ ) इत्यादि मन्त्र अश्वोंको रथमें जोतने के लिये उपयोगी बताया गया है। 'आशुः शिशानः०' (१७।३३) – यह मन्त्र यात्रारम्भके समय मङ्गलके रूपमें पठनीय कहा जाता है। 'विष्णोः क्रमोऽसि० (१२।५) मन्त्रका पाठ रथारोहणके समय करना उत्तम है। 'आजङ्घन्ति०' (२९ । ५० ) – इस मन्त्रसे अश्वको प्रेरित करने के लिये प्रथम बार चाबुकसे हाँके । 'या: सेना अभित्वरी:०' (११।७७) इत्यादि मन्त्रका शत्रुसेना के सम्मुख जप करे। 'दुन्दुभ्यः०' इत्यादि मन्त्रसे दुन्दुभि या नगारेको पीटे। इन मन्त्रों से पहले हवन करके तब उपर्युक्त कर्म करनेपर योद्धाको संग्राम में विजय प्राप्त होती है। विद्वान् पुरुष 'यमेन दत्तं० (२९ । १३) - इस मन्त्रसे एक करोड़ आहुतियाँ देकर संग्रामके लिये शीघ्र ही विजयप्रद रथ उत्पन्न कर सकता है। 'आकृष्णेन.' (३४।३१) इत्यादि मन्त्रसे साध्यकर्म व्याहृतियोंके समान ही होता है। 'यज्जाग्रतो०' (३४ १) इत्यादि शिवसंकल्प सम्बन्धी सूक्तोंके जपसे साधकका मन एकाग्र होता है। 'पञ्चनद्यः०' (३४ ११) इत्यादि मन्त्र से पाँच लाख घीकी आहुतियाँ देनेपर लक्ष्मीकी प्राप्ति होती है। 'यदाबघ्नन् दाक्षायणाः०/ (३४।५२) - इस मन्त्रसे हजार बार अभिमन्त्रित करके सुवर्णको धारण करे। यह प्रयोग शत्रुओं का निवारण करनेवाला होता है। 'इमं जीवेभ्यः० (३५ । १५) मन्त्रसे शिला अथवा ढेलेको अभिमन्त्रित करके घरमें चारों ओर फेंक दे। ऐसा करनेवालेको रातमें चोरोंसे भय नहीं होता। 'परीमे गामनेषत्० (३५ । १८)- यह उत्तम वशीकरण मन्त्र है। इस मन्त्रके प्रयोगसे मारनेके लिये आया हुआ मनुष्य भी वशमें हो जाता है। धर्मात्मन् । उक्त मन्त्रसे अभिमन्त्रित भय ताम्बूल, पुष्प आदि किसीको दे दिया जाय तो वह शीघ्र ही देनेवालेके वशीभूत हो जायगा। 'शं नो मित्र:०' (३६ । ९) यह मन्त्र सदैव सभी स्थानोंपर शान्ति प्रदान करनेवाला है। 'गणानां त्वा गणपतिं.' (२३ । १९ ) – इस मन्त्रसे चौराहेपर सप्तधान्यका हवन करके होता सम्पूर्ण जगत्को वशीभूत कर लेता है, इसमें संशय नहीं है। 'हिरण्यवर्णाः शुकय:०'- इस मन्त्रका अभिषेकमें प्रयोग करना चाहिये। 'शं नो देवीरभीष्टये.' (३६ | १२) - यह मन्त्र परम शान्तिकारक है। 'एकचक्र०' इत्यादि मन्त्रसे आज्यभागपूर्वक ग्रहोंके लिये घीकी आहुति देनेपर साधकको शान्ति प्राप्त होती है और निस्संदेह उसे ग्रहोंका कृपाप्रसाद सुलभ हो जाता है। 'गाव उपावतावम्०' (३३ । २९) एवं 'भग प्रणेतः०' (३४ । ३६-३७) इत्यादि दो मन्त्रोंसे घृतका हवन करके मनुष्य गौओंकी प्राप्ति करता है। 'प्रवादां षः सोपत्०' – इस मन्त्रका ग्रहयज्ञ में प्रयोग होता है। 'देवेभ्यो वनस्पते० ' इत्यादि मन्त्रका वृक्षयज्ञमें विनियोग होता है। गायत्रीको विष्णुरूपा जाने समस्त पापोंका प्रशमन एवं समस्त कामनाओंको पूर्ण करनेवाला विष्णुका परमपद भी वही है ॥ २३-८४ ॥
इस प्रकार आदि आग्रेय महापुराणमें 'यजुर्वेद-विधान-कथन' नामक दो सौ साठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २६० ॥
Summary of chapter 262 of the Agni Mahā Purana is as follows:
Agni provides a digest of the essential teachings of Dharmaśāstra, summarizing the rules of conduct (ācāra) for the four varṇas and four āśramas. The duties of the Brāhmaṇa (study, teaching, sacrifice, priestly service, acceptance of gifts), the Kṣatriya (protection of subjects, warfare, governance), the Vaiśya (agriculture, cattle-keeping, commerce), and the Śūdra (service to the other three) are enumerated. Agni stresses that the performance of one's svadharma — one's own duty — is the foundation of individual and social well-being.