पुष्कर कहते हैं-
जब राजा यह समझ ले कि किसी बलवान् आक्रन्द (अग्निपुराण के दो सौ तैतीसवें और दो सौ चालीसवें अध्यायों में महाभारत शान्तिपर्वमें तथा 'कामन्दक-नीतिसार 'के आठवें संगमें द्वादश राजमण्डलका वर्णन आया है उसमें 'विजिगीषु को बीच में रखकर उसके सम्मुखको दिशामें पाँच राजमण्डलोंका और पीछेकी दिशामें चार राजमण्डलोंका विचार किया गया है। अगल-बगल के दो बड़े राज्य, 'मध्यम' और 'उदासीन मण्डल' कहे गये हैं। यथा
इस चित्र में विजिगीषुके पीछेवाला पाणिग्राह राजाका मण्डल है, जो विजिगीषुका शत्रुराज्य है। आक्रन्द विजिगीषुका मित्र होता है। पुष्कर कहते हैं जब कोई बलवान् आनन्द (मित्र) पाणिग्रह (शत्रु) को उसके राज्यपर चढ़ाई करके दबा दे तो उस शत्रुके दुर्बल पड़ जानेपर विजिगीषु अपने मित्रों के सहयोगसे तथा अपनी प्रबल सेनाद्वारा अपने सामनेवाले शत्रु-राज्यपर चढ़ाई कर सकता है।
(राजा) के द्वारा मेरा पाणिग्राह राजा पराजित कर दिया गया है तो वह सेनाको युद्धके लिये यात्रा करनेकी आज्ञा दे। पहले इस बातको समझ ले कि मेरे सैनिक खूब हृष्ट-पुष्ट हैं, भृत्योंका भलीभाँति भरण-पोषण हुआ है, मेरे पास अधिक सेना मौजूद है तथा मैं मूलकी रक्षा करनेमें पूर्ण समर्थ हूँ; इसके बाद सैनिकोंसे घिरकर शिविरमें जाय। जिस समय शत्रुपर कोई संकट पड़ा हो, दैवी और मानुषी आदि बाधाओंसे उसका नगर पीड़ित हो, तब युद्धके लिये यात्रा करनी चाहिये। जिस दिशामें भूकम्प आया हो, जिसे केतुने अपने प्रभावसे दूषित किया हो, उसी ओर आक्रमण करे। जब सेनामें शत्रुको नष्ट करनेका उत्साह हो, योद्धाओंके मनमें विपक्षियोंके प्रति क्रोधका भाव प्रकट हुआ हो, शुभसूचक अंग फड़क रहे हों, अच्छे स्वप्न दिखायी देते हों तथा उत्तम निमित्त और शकुन हो रहे हों, तब शत्रुके नगरपर चढ़ाई करनी चाहिये। यदि वर्षाकाल में यात्रा करनी हो तो जिसमें पैदल और हाथियों की संख्या अधिक हो, ऐसी सेनाको कूच करनेकी आज्ञा दे । हेमन्त और शिशिर ऋतुमें ऐसी सेना - ले जाय, जिसमें रथ और घोड़ोंकी संख्या अधिक हो । वसन्त और शरद्के आरम्भमें चतुरंगिणी सेनाको युद्धके लिये नियुक्त करे। जिसमें पैदलोंकी संख्या अधिक हो, वही सेना सदा शत्रुओं पर विजय पाती है। यदि शरीरके दाहिने भागमें कोई अंग फड़क रहा हो तो उत्तम है। बायें अंग, पीठ तथा हृदयका फड़कना अच्छा नहीं है। इस प्रकार शरीरके चिह्नों, फोड़े-फुंसियों तथा फड़कने आदिके शुभाशुभ फलोंको अच्छी तरह समझ लेना चाहिये। स्त्रियोंके लिये इसके विपरीत फल बताया गया है। उनके बायें अंगका फड़कना शुभ होता है ॥ १-८॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'युद्धयात्राका वर्णन' नामक दो सौ अट्ठाईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २२८ ॥
Summary of chapter 230 of the Agni Mahā Purana is as follows:
The glory and supremacy of japa among all spiritual disciplines is expounded. Agni explains that japa performed with awareness of the deity's svarūpa, the mantra's meaning, and the sādhaka's identity with the mantra is a hundred thousand times more powerful than mechanical repetition. The appropriate malas — rudrākṣa for Śiva mantras, tulasī for Viṣṇu mantras, sphaṭika for Devī mantras, and pravāla for Sūrya mantras — are prescribed. The chapter teaches that one hundred thousand japas of a mantra with proper puraścaraṇa completes the mantra's siddhi.