पुष्कर कहते हैं –
परशुराम ! वेदमन्त्र सम्पूर्ण - विश्वपर अनुग्रह करनेवाले तथा चारों पुरुषार्थों के साधक हैं। ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद तथा अथर्ववेद - ये चार वेद हैं। इनके मन्त्रोंकी संख्या एक लाख है। ऋग्वेदकी एक शाखा 'सांख्यायन' और दूसरी शाखा 'आश्वलायन' है। इन दो शाखाओं में एक सहस्र तथा ऋग्वेदीय ब्राह्मणभागमें दो सहस्र मन्त्र हैं। श्रीकृष्णद्वैपायन आदि महर्षियोंने ऋग्वेदको प्रमाण माना है। यजुर्वेदमें उन्नीस सौ | मन्त्र हैं। उसके ब्राह्मण-ग्रन्थोंमें एक हजार मन्त्र हैं और शाखाओं में एक हजार छियासी। यजुर्वेदमें मुख्यतया काण्वी, माध्यन्दिनी, कठी, माध्यकठी, – मैत्रायणी, तैत्तिरीया एवं वैशम्पायनीया – ये शाखाएँ - विद्यमान हैं। सामवेदमें कौथुमी और आथर्वणायनी (राणायनीया) – ये दो शाखाएँ मुख्य हैं। इसमें वेद, आरण्यक, उक्था और ऊह- ये चार गान हैं। सामवेदमें नौ हजार चार सौ पचीस मन्त्र हैं। वे ब्रह्मसे सम्बन्धित हैं। यहाँतक सामवेदका मान बताया गया ॥ १-७॥
अथर्ववेदमें सुमन्तु, जाजलि, श्लोकायनि, शौनक, पिप्पलाद और मुञ्जकेश आदि शाखाप्रवर्तक ऋषि हैं। इसमें सोलह हजार मन्त्र और सौ उपनिषद् हैं। व्यासरूपमें अवतीर्ण होकर भगवान् श्रीविष्णुने ही वेदोंकी शाखाओंका विभाग आदि किया है। वेदोंके शाखाभेद आदि इतिहास और पुराण सम्ब विष्णुस्वरूप हैं। भगवान् व्याससे लोमहर्षण सूतने पुराण आदिका उपदेश पाकर उनका प्रवचन किया। उनके सुमति, अग्निवर्चा, मित्रयु, शिंशपायन, कृतव्रत और सावर्णि- ये छः शिष्य हुए। शिंशपायन आदिने पुराणोंकी संहिताका निर्माण किया। भगवान् श्रीहरि ही 'ब्राह्म' आदि अठारह पुराणों एवं अष्टादश विद्याओंके रूपमें स्थित हैं। वे सप्रपञ्च निष्प्रपञ्च तथा मूर्त-अमूर्त स्वरूप धारण करनेवाले विद्यारूपी श्रीविष्णु 'आग्रेय महापुराण में स्थित हैं। उनको जानकर उनकी अर्चना एवं स्तुति करके मानव भोग और मोक्ष-दोनोंको प्राप्त कर लेता है। भगवान् विष्णु विजयशील, प्रभावसम्पन्न तथा अग्नि-सूर्य आदिके रूपमें स्थित हैं। वे भगवान् विष्णु ही अग्निरूपसे देवता आदिके मुख हैं। वे ही सबकी परमगति हैं। वे वेदों तथा पुराणोंमें 'यज्ञमूर्ति' के नामसे गाये जाते हैं। यह 'अग्रिपुराण' श्रीविष्णुका ही विरारूप है। इस अग्नि आग्रेय पुराणके निर्माता और श्रोता श्रीजनार्दन ही हैं। इसलिये यह महापुराण सर्ववेदमय, सर्वविद्यामय तथा सर्वज्ञानमय है। यह उत्तम एवं पवित्र पुराण पठन और श्रवण करनेवाले मनुष्यों के लिये सर्वात्मा श्रीहरिस्वरूप है। यह 'आग्नेय महापुराण' विद्यार्थियोंके लिये विद्याप्रद, अर्थार्थियोंके लिये लक्ष्मी और धन-सम्पत्ति देनेवाला, राज्यार्थियोंके लिये राज्यदाता, धर्मार्थियोंके लिये धर्मदाता, स्वर्गार्थियोंके लिये स्वर्गप्रद और पुत्रार्थियोंके लिये पुत्रदायक है। गोधन चाहनेवालेको गोधन और ग्रामाभिलाषियोंको ग्राम देनेवाला है। यह कामार्थी मनुष्योंको काम, सम्पूर्ण सौभाग्य, गुण तथा कीर्त्ति प्रदान करनेवाला है। विजयाभिलाषी पुरुषोंको विजय देता है, सब कुछ चाहनेवालोंको सब कुछ देता है, मोक्षकामियोंको मोक्ष देता है और पापियोंके पापोंका नाश कर देता है ॥ ८ – २२ ॥
इस प्रकार आदि आग्रेय महापुराणमें 'वेदोंकी शाखा आदिका वर्णन' नामक दो सौ इकहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २७१ ॥
Summary of chapter 273 of the Agni Mahā Purana is as follows:
The Solar dynasty is traced from its cosmic origin: Viṣṇu → Brahmā → Marīci → Kaśyapa → Vivasvān (Sūrya). Vivasvān's three wives — Saṃjñā, Rājñī, and Chāyā — give birth to Manu, Yama, Yamunā, Śani, the twin Aśvins, and Revanta. From Vaivasvata Manu descend the ten sons: Ikṣvāku, Nābhāga, Dhṛṣṭa, Śaryāti, and others who found the great Solar kingdoms. The lineage is traced through the Ikṣvāku line, passing through Hariścandra, Sagara, the sixty-thousand sons of Sagara, Bhagīratha (who brought Gaṅgā to earth), and ultimately to Rāma and his descendants Kuśa and Lava, ending at Śrutāyus. Agni narrates this to Vasiṣṭha.