अग्निदेव कहते हैं-
मुने! अब मैं स्तम्भन मोहन, वशीकरण, विद्वेषण तथा उच्चाटन प्रयोग बताता हूँ विषव्याधि, आरोग्य, मारण तथा उसके शमनके प्रयोग भी बता रहा हूँ।
भोजपत्रपर ताड़की कलमसे 'कूर्मचक्र' लिखे। वह छः अङ्गुलके मापका होना चाहिये। तदनन्तर द्विज उसके मुख तथा चारों पैरोंमें मन्त्रका न्यास करे। चारों पैरोंमें 'क्रीं' तथा मुखमें 'ह्रीं' लिखे। गर्भस्थानमें त्वरिता विद्याका उल्लेख करके पृष्ठभागमें साध्य नाम लिखे। फिर मालामन्त्रों से वेष्टित करके उस यन्त्रको ईंटके ऊपर स्थापित करे । तत्पश्चात् उसे ढककर कूर्मपीठगत 'करालमन्त्र' से अभिमन्त्रित करे। महाकूर्मका पूजन करके चरणोदकको शत्रुके उद्देश्यसे फेंके तथा शत्रुका स्मरण करके उसे सात बार बायें पैरसे ताड़ित करे। इससे मुखभागसे शत्रुका स्तम्भन होता है।।१-५।।
भैरवकी मूर्ति लिखकर उसके चारों ओर निम्नाङ्कित मालामन्त्र लिखे -
'ॐ शत्रुमुखस्तम्भनी कामरूपा आलीढकरी । ह्रीं फें फेत्कारिणी मम शत्रूणां देवदत्तानां मुखं स्तम्भय स्तम्भय मम सर्वविद्वेषिणां मुखस्तम्भ कुरु कुरु कुरु ॐ हूं फें फेत्कारिणि स्वाहा।'
इसके बाद 'फट्' और हेतु (प्रयोगका उद्देश्य) लिखकर उक्त मन्त्रका जप करते हुए उस महाबली भैरवके वाम हाथमें 'नग' (पर्वत) या वृक्ष) और दाहिने हाथमें 'शूल' लिखे। तदनन्तर 'अघोरमन्त्र' लिखे। इससे वह संग्राम में शत्रुओंको स्तम्भित कर देता है ॥ ६ - ९ ॥
'ॐ नमो भगवत्यै भगमालिनि विस्फुर विस्फुर, स्पन्द स्पन्द, नित्यक्लिन्ने द्रव द्रव हूं सः क्रींकाराक्षरे स्वाहा।'
- इस मन्त्रका जप करते हुए रोचना आदिसे - तिलक करनेपर मनुष्य सारे जगत्को मोहित कर सकता है ॥ १०-११ ॥
'ॐ फें हुं फट् फेत्कारिणि ह्रीं ज्वल ज्वल, त्रैलोक्यं मोहय मोहय, गुह्यकालिके स्वाहा।'
– इससे तिलक करके मनुष्य राजा आदिको - भी वशमें कर लेता है ॥ १२३ ॥
जहाँ गधा बैठा हो उस स्थानकी धूल, शवके ऊपर चढ़ा हुआ फूल तथा स्त्रीके रजमें संलग्न वस्त्रका टुकड़ा लेकर रातमें शत्रुकी शय्या आदिपर फेंक दे। इससे उसके स्वजनोंमें विद्वेष उत्पन्न हो जाता है। गायका खुर और शृङ्ग, घोड़ेकी टापका कटा हुआ टुकड़ा तथा साँपका सिर– इन सबको कूटकर एकमें मिला दे और द्वेषपात्रके घरोंपर फेंक दे। इससे शत्रुवर्गका उच्चाटन होता है। कनेरकी पीली शिफा (मूल) या जड़) मारणके प्रयोग में संसिद्ध ( सफल ) है। साँप और छछूंदरका रक्त तथा कनेरका बीज भी मारणरूपी प्रयोजनका साधक है। मरे हुए गिरगिट, भ्रमर, केकड़ा और बिच्छूका चूरन बनाकर तेलमें डाल दे। उस तेलको अपने शरीरमें लगानेवाला मनुष्य कोढ़ी हो जायगा ॥ १३ – १६ ॥
'ॐ नवग्रहाय सर्वशत्रून् मम साधय साधय, मारय मारय आं सों मं बुंगुं शुं शं रां के ॐ स्वाहा।' इस मन्त्रको भोजपत्र या नवग्रह प्रतिमापर लिखकर आक (मदार) के सौ फूलोंसे -पूजा करके शत्रु-मारणके उद्देश्यसे उस यन्त्र या प्रतिमाको श्मशानभूमिमें गाड़ दे। इससे समस्त ग्रह साधकके शत्रुको मार डालते हैं ॥ १७-१८॥
ॐ कुञ्जरी ब्रह्माणी, ॐ मञ्जरी माहेश्वरी, 4 ॐ वेताली कौमारी, ॐ काली वैष्णवी, ॐ अघोरा वाराही, ॐ वेतालीन्द्राणी, ॐ उर्वशी चामुण्डा, ॐ वेताली चण्डिका, ॐ जयाली यक्षिणी, नवमातरो हे मम शत्रुं गृह्णत गृह्णत।'
भोजपत्रपर इस मन्त्रको लिखे। 'शत्रु' पदके स्थानमें शत्रुके नामका निर्देश करे। फिर श्मशान भूमिमें उस यन्त्रकी पूजा करे तो शत्रुकी मृत्यु हो जाती है ॥ १९ ॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'स्तम्भन आदिके मन्त्रका कथन' नामक तीन सौ पंद्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३१५ ॥
Summary of chapter 317 of the Agni Mahā Purana is as follows:
Agni resumes teaching Vasiṣṭha with the exposition of jyotiṣa — the science of luminaries. The chapter establishes the cosmological framework: the Earth at center, the seven planetary spheres (graha-maṇḍala) arranged outward in the order Moon, Mercury, Venus, Sun, Mars, Jupiter, and Saturn, and the stellar sphere (nakṣatra-maṇḍala) beyond them. The nature, color, direction, metal, grain, deity, and day of each graha are catalogued. The twenty-seven nakṣatras are listed with their presiding deities (adhidaivata), species, and qualities, providing the framework for all subsequent astrological calculation.