अग्निदेव कहते है-
मुने! अब मैं पवित्रारोपर्णकी विधि बताऊँगा। वर्षमें एक बार किया गया पवित्रारोपण सम्पूर्ण वर्षभर की हुई श्रीहरिकी पूजाका फल देनेवाला है। आषाढ़ ( की शुक्ला एकादशी) से लेकर कार्तिक (-की शुक्ला एकादशी) तकके बीचके कालमें ही 'पवित्रारोपण' किया जाता है। प्रतिपदा धनद तिथि है। द्वितीया आदि तिथियाँ क्रमशः लक्ष्मी आदि देवताओंकी हैं। यथा- लक्ष्मीकी द्वितीया, गौरीकी तृतीया, गणेशकी चतुर्थी, सरस्वती (तथा नाग देवताओं) की पञ्चमी, स्वामी कार्तिकेयकी षष्ठी, सूर्यकी सप्तमी, मातृकाओंकी अष्टमी, दुर्गाकी नवमी, नागों (या यमराज) की दशमी, ऋषियों तथा भगवान् विष्णुकी एकादशी, श्रीहरिकी द्वादशी, कामदेवकी त्रयोदशी, शिवकी चतुर्दशी तथा ब्रह्माकी पौर्णमासी एवं अमावस्या तिथि है। जो मनुष्य जिस देवताका भक्त है, उसके लिये वही तिथि पवित्र है ॥ १-३॥
पवित्रारोपणकी विधि सब देवताओंके लिये समान है; केवल मन्त्र आदि प्रत्येक देवताके लिये पृथक्-पृथक् बोले। पवित्रक बनानेके लिये सोने-चाँदी और ताँबेके तार तथा कपास आदिके सूत होने चाहिये ॥ ४ ॥
ब्राह्मणीके हाथका काता हुआ सूत सर्वोत्तम है। वह न मिले तो किसी भी सूतको उसका संस्कार करके उपयोगमें लेना चाहिये। सूतको तिगुना करके, उसे पुनः तिगुना करे और उसीसे, अर्थात् नौ तन्तुओंद्वारा पवित्रक बनाये। एक सौ आठसे लेकर अधिक तन्तुओंद्वारा निर्मित पवित्रक उत्तम आदिकी श्रेणीमें गिना जाता है। (पवित्रारोपणके पूर्व) इष्ट देवतासे इस प्रकार प्रार्थना करे– 'प्रभो क्रियालोपजनित दोषको दूर करनेके लिये आपने जो साधन बताया है, देव! वही मैं कर रहा हूँ। जहाँ जैसा पवित्रक आवश्यक है, वहाँके लिये वैसा ही पवित्रक अर्पित होगा। नाथ! आपकी कृपासे इस कार्यमें कोई विघ्न-बाधा न आवे अविनाशी परमेश्वर ! आपकी जय हो' ॥५-७॥
इस प्रकार प्रार्थना करके मनुष्य पहले इष्टदेवके मण्डलके लिये गायत्री मन्त्रसे पवित्रक बाँधे । इष्टदेव नारायणके लिये गायत्री मन्त्र इस प्रकार है— ॐ नमो नारायणाय विद्महे, वासुदेवाय धीमहि, तन्नो विष्णुः प्रचोदयात्।" इष्टदेवताके नामके अनुरूप ही यह गायत्री है। देव प्रतिमाओंपर अर्पित करनेके लिये अनेक प्रकारका पवित्रक होता है। एक तो विग्रहकी नाभितक पहुँचता है, दूसरा जाँघोंतक और तीसरा घुटनोंतक पहुँचता है। (ये क्रमशः कनिष्ठ, मध्यम तथा उत्तम श्रेणीमें परिगणित हैं।) एक चौथा प्रकार भी है, जो पैरोंतक लटकता है। यह पैरॉतक लटकनेवाला पवित्रक 'वनमाला' कहा जाता है। वह एक हजार आठ तन्तुओंसे तैयार किया जाता है। (इसका माहात्म्य सबसे अधिक है।) साधारण माला अपनी शक्तिके अनुसार बनायी जाती है। अथवा वह सोलह अङ्गुलसे दुगुनी बड़ी होनी चाहिये। कर्णिका, केसर और दल आदिसे युक्त जो यन्त्र या चक्र आदि मण्डल है, उस मण्डलको जो नीचेसे ऊपरतक ढक ले, ऐसा पवित्रक उसके ऊपर चढ़ाना चाहिये। एकचक्र और एकाब्ज आदि मण्डल (चक्र) में, उस मण्डलका मान जितने अङ्गुलका हो, उतने अङ्गुल मानवाला पवित्रक अर्पित करना चाहिये। वेदीपर अपने सत्ताईस अङ्गुलके मापका पवित्रक अर्पित करे ॥ ८-१२॥
आचार्योंके लिये, पिता-माता आदिके लिये तथा पुस्तकपर चढ़ानेके लिये (या स्वयं धारण करनेके लिये) जो पवित्रक बनावे, वह नाभितक ही लंबा होना चाहिये। उसमें बारह गाँठें लगी हों तथा उस पवित्रकपर गन्ध ( चन्दन, रोली या केसर) लगाया गया हो। (वह उसीमें रँगा गया हो'।) ब्रह्मन् ! वनमालामें दो-दो अङ्गुलकी दूरीपर क्रमश: एक सौ आठ गाँठें रही चाहिये। अथवा कनिष्ठ मध्यम तथा उत्तम पवित्रकमें क्रमश: बारह, चौबीस तथा छत्तीस गाँठें रखनी चाहिये। मन्द, मध्यम और उत्तम मालार्थी पुरुषोंको अनामिका, मध्यमा और अङ्गुष्ठसे ही पवित्रक-माला ग्रहण करनी चाहिये। अथवा कनिष्ठ आदि नामवाले पवित्रकमें समानरूपसे बारह बारह ही गाँठें रहनी चाहिये। (केवल तन्तुओंकी संख्यामें और लंबाईमें भेद होने से उनकी भिन्न संज्ञाएँ मानी जाती हैं।) सूर्य, कलश तथा अग्नि आदिके लिये भी यथासम्भव विष्णु भगवान्के तुल्य ही पवित्रक अर्पित करना उत्तम माना गया है। पीठके लिये पीठकी लंबाई के अनुसार तथा कुण्डके लिये भी मेखलापर्यन्त लंबा पवित्रक होना चाहिये। विष्णु पार्षदोंके लिये यथाशक्ति सूत्र ग्रन्थि देनी चाहिये अथवा बिना ग्रन्थिके ही सत्रह सूत्र चढ़ावे और भद्र नामक पार्षदको त्रिसूत्र (तिरसुत) अर्पित करे ॥ १३ - १७ ॥
पवित्रकको रोचना, अगुरु-कर्पूर-मिश्रित हल्दी एवं कुङ्कुमके रंगसे रँग देना चाहिये। भक्त पुरुष एकादशीको स्नान, संध्या आदि करके पूजागृहमें जाकर भगवान् श्रीहरिका यजन करे। उनके समस्त परिवारको बलि देकर उसकी अर्चना करे। द्वारके अन्तमें क्षं क्षेत्रपालाय नमः ।'– बोलकर क्षेत्रपालकी पूजा करे। द्वारके ऊपर 'श्रियै नमः ।' कहकर श्रीदेवीकी पूजा करे। द्वारके दक्षिण देशमें 'धात्रे नमः ।', 'गङ्गायै नमः। इन मन्त्रों का उच्चारण करते हुए 'धाता' तथा 'गङ्गा' जीकी अर्चना करे और वाम देशमें 'विधात्रे नमः', 'यमुनायै नमः। बोलकर विधाता एवं यमुनाजीकी पूजा करे। इसी द्वारके दक्षिण-वाम देशमें तरह क्रमशः शङ्खनिधये नमः ।' 'पद्मनिधये नमः । बोलकर शङ्खनिधि एवं पद्मनिधिको पूजा करे (फिर मण्डपके भीतर दाहिने पैरके पाणिभागको तीन बार पटककर विघ्नोंका अपसारण करे।) तदनन्तर 'सारङ्गाय नमः' बोलकर विघ्नकारी भूतोंको दूर भगावे (इसके बाद 'ॐ हां वास्त्वधिपतये ब्रह्मणे नमः।' इस मन्त्रका उच्चारण करके ब्रह्माके स्थानमें पुष्प चढ़ावे) फिर आसनपर बैठकर भूतशुद्धि ( अग्निपुराणमें भूतशुद्धिके लिये केवल उठात-मन्त्र दिये गये हैं। सामान्य पाठकको भूतशुद्धिका सम्यक् परिचय कराने के लिये यहाँ 'मन्त्र महार्णव' में दिया हुआ प्रकार प्रस्तुत किया जाता है।
भूतशुद्धि
पहले ―ओम सूर्यः सोमो यमः कालः संध्या भूतानि पक्षच एते शुभाशुभस्येह कर्मणो मम साक्षिणः ॥
भी देव प्राकृतं चित्तं पापाक्रान्तमभूमम तनि:सार चित्तान्मे पाएं तेऽस्तु नमो नमः ॥
―ये दोनों मन्त्र पड़कर प्रार्थना करे तदनन्तर अपने दक्षिण भागमै―"श्रीगुरुभ्यो नमः' बोलकर श्रीगुरुजनोंको तथा वामभाग ॐ गणेशाय नमः।-बोलका श्रीगणेशजीको प्रणाम करे। तत्पश्चात् कुम्भक प्राणायाम करते हुए मूलाधार चक्रसे कमलनाल सी प्रतीत होनेवाली परम-देवता कुण्डलिनीको उठाकर यह भावना करे कि यह कुण्डलिनी यहाँसे ऊपर की ओर उठती हुई ब्रह्मरन्धत जा पहुंची है। प्रदीप कलिकाके आकारवाले हृदयस्थ जीवको साथ ले, सुषुम्नानाडीके पथसे ब्रह्मरन्धमें जाकर स्थित हो गयी है ।
उस अवस्था में हं सः सोऽहम्।' इस मन्त्रसे जीवको परब्रह्म परमात्मा से संयुक्त कर दे तदनन्तर अपने शरीरके पैरोंसे लेकर घुटनोंतकके भागमें चौकोर आकृतिवाले वज्रलाञ्छित धूमण्डलका चिन्तन करे, उसकी कान्ति सुवर्णके समान है तथा वह 'ॐ लम्' इस भू-बीजसे युक्त है। फिर घुटनोंसे लेकर नाभितकके भागमें अर्धचन्द्राकार, जलके स्थानभूत सोममण्डलको भावना करे। वह दो कमलोंसे अङ्कित, श्वेत वर्णवाला तथा वम्' इस वरुण बोजसे विभूषित है। इसके बाद नाभिसे लेकर हृदयतकके भागमें त्रिकोणाकार, स्वस्तिक चिहसे अङ्कित, रक्तवर्ण अग्निमण्डलका चिन्तन करे, जो 'ॐ रम्'– इस अग्निबीजसे युक्त है।
तत्पश्चात् हृदयसे लेकर घूमध्यतकके भागमें गोलाकार, पबिन्दु-विलसित, धूम्रवर्ण वायुमण्डलको भावना करे, जो ॐ यम्' इस योजसे युक्त है। तदनन्तर भूमध्यसे लेकर ब्रह्मरन्ध्रपर्यन्त भागमें गोलाकार, स्वच्छ, मनोहर आकाशमण्डलका चिन्तन करे, जो 3 हम्'– इस आकाशबीजसे युक्त है। इस प्रकार भूतगणकी भावना करके पूर्वोक्त भूमण्डलमें पादेन्द्रिय, गमन, घ्राण, गन्ध, ब्रह्मा, निवृत्तिकला, समान वायु तथा गन्तव्य देश-इन आठ पदार्थोंका चिन्तन करे। (सोम या) जल-मण्डलमें हस्तेन्द्रिय, ग्रहण, ग्राह्य, रसना, रस, विष्णु, प्रतिष्ठाकला तथा उदानवायुका ध्यान करे तेजोमण्डलमें पायु- इन्द्रिय, विसर्ग, विसर्जनीय, नेत्र, रूप, शिव, विद्याकला तथा व्यानवायु – ध्येय हैं। वायुमण्डलमें उपस्थ, आनन्द, स्त्री, स्पर्शन, स्पर्श, ईशान, शान्तिकला तथा अपानवायु- ये आठ पदार्थ चिन्तनीय हैं। इसी तरह आकाशमण्डलमें वागू, वक्तव्य, वदन, श्रोत्र, शब्द, सदाशिव, शान्त्यतीता कला तथा प्राणवायु वस्तुओं का चिन्तन करना चाहिये। इन आठ वस्तुओं का चिंतन करना चहिये।
इस तरह भूतोंका चिन्तन करके पूर्व-पूर्व कार्यका उत्तरोत्तर कारणमें ब्रह्मपर्यन्त विलीन करे। उसका क्रम इस प्रकार है – 'ॐ लं फट्।' बोलकर 'पाँच गुणवाली पृथिवीका जलमें उपसंहार करता हूँ। इस भावना के साथ भूमिका जलमें लय करे। फिर 'ॐ वं हूं फट्।'—यह बोलकर 'चार गुणवाले जल तत्त्वका अग्निमें उपसंहार करता हूँ इस भावना के साथ जलका अग्निमें लय करे। तदनन्तर 'ॐ रं हुं फट्।' बोलकर 'तीन गुणों से युक्त तेजका वायुतत्त्वमें उपसंहार करता हूँ'- इस भावना के साथ अग्निका वायुमें लय करे। फिर 'ॐ यं हुं फट्।' यह बोलकर 'दो गुणवाले वायुतत्त्वका आकाशतत्त्वमें उपसंहार करता हूँ'- इस भावना के साथ वायुका आकाशमें लय करे। इसके बाद 'ॐ हं हुं फट् ।' ऐसा बोलकर 'एक गुणवाले आकाशका अहंकारमें उपसंहार करता हूँ'- इस संकल्पके साथ आकाशका अहंकारमें लय करे। इसी क्रमसे अहंकारका महत्त्वमें, महत्वका प्रकृतिमें और प्रकृति या मायाका आत्मामें लय करे। इस प्रकार शुद्ध सच्चिन्मय होकर पापपुरुषका चिन्तन करे- 'वासनामय पाप बाय कुक्षिमें स्थित है। उसका रंग काला है। वह अँगूठेके बराबर है। ब्रह्महत्या उसका सिर, सुवर्णको चोरी बाँह, मदिरापान हृदय, गुरुतल्पगमन कटिप्रदेश तथा इन सबके साथ संसर्ग ही उसके दोनों पैर हैं। उपपातक-राशि उसका मस्तक है। उसके हाथमें ढाल और तलवार है। उस दुष्ट पापपुरुषका मुँह नोचेकी ओर है। वह अत्यन्त दुःसह है। ऐसे पापपुरुषका चिन्तन करके पूरक प्राणायाममें ॐ यं इस वायुबीजका बत्तीस या सोलह बार जप करके उत्पादित वायुद्वारा उसका शोषण करे। तत्पश्चात् कुम्भक प्राणायाममें चौसठ बार जपे गये 'ॐ रम्' इस अग्निबीजद्वारा उत्थापित आगकी ज्वालामें अपने शरीरसहित उस पापपुरुषको जलाकर भस्म कर दे। तदनन्तर रेचक प्राणायाममें 'ॐ यम्'– इस वायुवीजका सोलह या बत्तौस बार जप करके उत्थापित वायुद्वारा दक्षिणनाडीके मार्गसे उस भस्मको बाहर निकाले। इसके बाद देहगत भस्मको 'ॐ नम्' इस प्रकार उच्चारित अमृतबीजके द्वारा आप्लावित करके 'ॐ लम्' इस भूबीजके द्वारा उस भस्मको घनीभूत पिण्डके आकारमें परिणत कर दे और भावनामें हो देखे कि वह सोनेके अण्डेके समान जान पड़ता है। तदनन्तर 'ॐ हम इस आकाशबीजका जप करते हुए, उस पिण्डके दर्पणको भाँति स्वच्छ होनेको भावना करे और उसके द्वारा मस्तकसे लेकर चरण-नखपर्यन्त अवयवोंकी मनके द्वारा रचना करे। इसके बाद पुनः सृष्टिमार्गका आश्रय ले, ब्रह्मसे प्रकृति, प्रकृतिसे महत्त्व, महत्त्वसे अहंकार, अहंकारसे आकाश, आकाश वायु, वायुसे अग्नि, अग्निसे जल, जलसे पृथ्वी, पृथ्वीसे ओषधि, औषधिसे अन्न, अनसे वीर्य और वीर्यसे पुरुष शरीरको उत्पत्ति 'ॐ हं सः सोऽहम्।' इस मन्त्रद्वारा ब्रह्मके साथ संयुक्त हो, एकीभूत हुए जीवको अपने हृदय-कमलमें स्थापित करे। तदनन्तर कुण्डलिनीको पुनः मूलाधारगत हुई देखे। फिर इस प्रकार प्राणशक्तिका ध्यान करे रक्ताम्भोधिस्थपोतोल्लसदरुणसरोजाधिरूढा कराब्णैः पाशं कोदण्डमिक्षूद्भवगुणमथ चाप्यङ्कुश पञ्च बाणान् ।विधाणा सकपालं त्रिनयनलसिता पीनवक्षोरुहाळ्या देवी बालार्कवर्णा भवतु सुखकरी प्राणशक्तिः परा नः ॥ 'जो लालसागरमें स्थित एक पोतपर प्रफुल्ल अरुण कमलके आसनपर विराजमान हैं, अपने कर-कमलों में पाश, इक्षुमयी प्रत्यक्षासे युक्त कोदण्ड, अङ्कुश तथा पाँच बाण लिये रहती हैं, जिन्होंने खूनसे भरा खप्पर भी ले रखा है, तीन नेत्र जिनके मुखमण्डलकी शोभा बढ़ाते हैं, जो उभरे हुए पीन उरोजोंसे सुशोभित हैं तथा बाल-रविके समान जिनकी अरुण-पीत कान्ति है, वे प्राणशक्तिस्वरूपा परा देवी हमारे लिये सुखकी सृष्टि करनेवाली हों।'
)करे ॥ १८-२१॥
उसकी विधि यों है -
ॐ हूं हः फट् हूं गन्धतन्मात्रं संहरामि नमः ।
ॐ हं हः फट् हूं रसतन्मात्रं संहरामि नमः ।
ॐ हूं हः फट् हूं रूपतन्मात्रं संहरामि नमः ।
ॐ हूं हः फट् हूं स्पर्शतन्मात्रं संहरामि नमः ।
ॐ हं हः फट् हे शब्दतन्मात्रं संहरामि नमः ।
-इस प्रकार पाँच उद्घात-वाक्योंका उच्चारण करके गन्धतन्मात्रस्वरूप भूमिमण्डलको, वज्रचिह्नित सुवर्णमय चतुरस्र पीठको तथा इन्द्रादि देवताओंको। अपने युगल चरणोंमें स्थित देखते हुए उनका चिन्तन करे। इस प्रकार शुद्ध हुए गन्धतन्मात्रको रसतन्मात्रमें लीन करके उपासक इसी क्रमसे रसतन्मात्रका रूपतन्मात्रमें संहार करे। 'ॐ हूं हः
फट् हूं रसतन्मात्रं संहरामि नमः ।', 'ॐ हूं हः
फट् हूं रूपतन्मात्रं संहरामि नमः ।', 'ॐ हूं हः
फट् हूं स्पर्शतन्मात्रं संहरामि नमः ।', 'ॐ हूं हः
फट् हूं शब्दतन्मात्रं संहरामि नमः ।' इन चार उद्घात वाक्योंका उच्चारण करके जानुसे लेकर नाभितकके भागको श्वेत कमलसे चिह्नित, शुक्लवर्ण एवं अर्धचन्द्राकार देखे ध्यानद्वारा यह चिन्तन करे कि 'इस जलीय भागके देवता वरुण हैं।' उक्त चार उद्धातोंके उच्चारणसे रसतन्मात्राकी शुद्धि होती है। इसके बाद इस रसतन्मात्राका रूपतन्मात्रामें लय कर दे ॥ २२ - ३० ॥ 'ॐ हूं हः फट् हूं रूपतन्मात्रं संहरामि नमः ।'
'ॐ हूं हः फट् हूं रूपतन्मात्रं संहरामि नमः ।'
'ॐ ह्रूं हः फट् हूं स्पर्शतन्मात्रं संहरामि नमः ।'
ॐ हूं हः फट् हूं शब्दतन्मात्रं संहरामि नमः ।'
- इन तीन उद्घातवाक्योंका उच्चारण करके नाभिसे लेकर कण्ठतकके भागमें त्रिकोणाकार अग्निमण्डलका चिन्तन करे। 'उसका रंग लाल है; वह स्वस्तिकाकार चिह्नसे चिह्नित है। उसके अधिदेवता अग्नि हैं। इस प्रकार ध्यान करके शुद्ध किये हुए रूपतन्मात्रको स्पर्शतन्मात्रमें लीन करे। तत्पश्चात् 'ॐ ह्रूं हः फट् हूं स्पर्शतन्मात्रं संहरामि नमः ।', 'ॐ हूं हः फट् हूं शब्दतन्मात्रं संहरामि नमः ।' – इन दो उद्घातवाक्योंके उच्चारणपूर्वक कण्ठसे लेकर नासिकाके बीचके भागमें गोलाकार वायुमण्डलका चिन्तन करे 'उसका रंग धूमके समान है। वह निष्कलङ्क चन्द्रमासे चिह्नित है। इस तरह शुद्ध हुए। स्पर्श तन्मात्रका ध्यानद्वारा ही शब्दतन्मात्रमें लय कर दे। इसके बाद 'ॐ ह्रूं हः फट् हूं शब्दतन्मात्रं संहरामि नमः । इस एक उद्घातवाक्यसे शुद्ध स्फटिकके समान आकाशका नासिकासे लेकर शिखातकके भागमें चिन्तन करे। फिर उस शुद्ध हुए आकाशका (अहंकारमें) उपसंहार करे ॥ ३१-३७॥
तत्पश्चात् क्रमशः शोषण आदिके द्वारा देहकी शुद्धि करे। ध्यानमें यह देखे कि 'यं' बीजरूप वायुके द्वारा पैरोंसे लेकर शिखातकका सम्पूर्ण शरीर सूख गया है। फिर 'रं' बीज द्वारा अग्निको प्रकट करके देखे कि सारा शरीर अग्निकी ज्वालाओंमें आ गया और जलकर भस्म हो गया। इसके बाद 'वं' बीजका उच्चारण करके भावना करे कि ब्रह्मरन्ध्रसे अमृतका बिन्दु प्रकट हुआ है। उससे जो अमृतकी धारा प्रकट हुई है, उसने शरीरके उस भस्मको आप्लावित कर दिया है। तदनन्तर 'लं' बीजका उच्चारण करते हुए यह चिन्तन करे कि उस भस्मसे दिव्य देहका प्रादुर्भाव हो गया है। इस प्रकार दिव्य देहकी उद्भावना करके करन्यास और अङ्गन्यास करे। इसके बाद मानस-यागका अनुष्ठान करे। हृदय कमलमें मानसिक पुष्प आदि उपचारोंद्वारा मूल मन्त्रसे अङ्गोंसहित देवेश्वर भगवान् विष्णुका पूजन करे। वे भगवान् भोग और मोक्ष देनेवाले हैं। भगवान्से मानसिक पूजा स्वीकार करनेके लिये इस प्रकार प्रार्थना करनी चाहिये – 'देव! देवेश्वर केशव! आपका स्वागत है। मेरे निकट पधारिये और यथार्थरूपसे भावनाद्वारा प्रस्तुत इस मानसिक पूजाको ग्रहण कीजिये।' योगपीठको धारण करनेवाली आधारशक्ति कूर्म, अनन्त (शेषनाग) तथा पृथ्वीका पीठके मध्यभागमें पूजन करना चाहिये। तदनन्तर अग्निकोण आदि चारों कोणोंमें क्रमशः धर्म, ज्ञान, वैराग्य तथा ऐश्वर्यका पूजन करे। पूर्व आदि मुख्य दिशाओं में अधर्म, अज्ञान, अवैराग्य तथा अनैश्वर्यकी अर्चना करे। पीठके मध्य भागमें सत्त्वादि गुणोंका, कमलका, माया और अविद्या नामक तत्त्वोंका, कालतत्त्वका, सूर्यादि-मण्डलका तथा पक्षिराज गरुडका पूजन करे। पीठके वायव्यकोणसे ईशान कोणतक गुरुपंक्तिकी पूजा करे ॥ ३८ ४५ ॥
गण, सरस्वती, नारद, नलकूबर, गुरु, गुरुपादुका, परम गुरु और उनकी पादुकाकी पूजा ही गुरुपंक्तिकी पूजा है। पूर्वसिद्ध और परसिद्ध शक्तियोंकी केसरों में पूजा करनी चाहिये। पूर्वसिद्ध शक्तियाँ ये हैं लक्ष्मी, सरस्वती, प्रीति, कीर्ति, शान्ति, कान्ति, पुष्टि तथा तुष्टि। इनकी क्रमशः पूर्व आदि दिशाओंमें पूजा की जानी चाहिये । इसी तरह इन्द्र आदि दस दिक्पालोंका भी उनकी दिशाओं में पूजन आवश्यक है। इन सबके
बीचमें श्रीहरि विराजमान हैं। परसिद्धा शक्तियाँ– धृति, श्री, रति तथा कान्ति आदि हैं। मूल मन्त्रसे भगवान् अच्युतकी स्थापना की जाती है। पूजाके प्रारम्भमें भगवान्से यों प्रार्थना करे – 'हे भगवन् ! आप मेरे सम्मुख हों। (ॐ अभिमुखो भव।) पूर्व दिशामें मेरे समीप स्थित हों।' इस तरह प्रार्थना करके स्थापनाके पश्चात् अर्घ्य पाद्य आदि निवेदन कर गन्ध आदि उपचारोंद्वारा मूल मन्त्र से भगवान् अच्युतकी अर्चना करे। ॐ भीषय भीषय हृदयाय नमः । ॐ त्रासय त्रासय शिरसे नमः । ॐ मर्दय मर्दय शिखायै नमः । ॐ रक्ष रक्ष नेत्रत्रयाय नमः । ॐ प्रध्वंसय प्रध्वंसय कवचाय नमः । ॐ हूं फट् अस्त्राय नमः । इस प्रकार अग्निकोण आदि दिशाओं में क्रमसे मूलबीजद्वारा अङ्गोंका पूजन करे ॥ ४६-५१ ॥
पूर्व, दक्षिण पश्चिम और उत्तर दिशामें मूर्त्यात्मक आवरणकी अर्चना करे। वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध– ये चार मूर्तियाँ हैं। अग्निकोण आदि कोणोंमें क्रमशः श्री, रति, धृति और कान्तिकी पूजा करे। ये भी श्रीहरिकी मूर्तियाँ हैं। अग्नि आदि कोणोंमें क्रमशः शङ्ख, चक्र, गदा और पद्मकी परिचर्या करे। पूर्वादि दिशाओं में शार्ङ्ग, मुशल, खड्ग तथा वनमालाकी अर्चना करे। उसके बाह्यभागमें पूर्वादि दिशाओं में क्रमशः इन्द्र, अग्नि, यम, निरृति, वरुण, वायु, कुबेर तथा ईशानकी पूजा करके नैर्ऋत्य और पश्चिमके बीचमें अनन्तकी तथा पूर्व और ईशानके बीचमें ब्रह्माजीकी अर्चना करे। इनके बाह्यभागमें वज्र आदि अस्त्रमय आवरणोंका पूजन करे । इनके भी बाह्यभागमें दिक्पालोंके वाहनरूप आवरण पूजनीय होते हैं। पूर्वादिके क्रमसे ऐरावत, छाग, भैंसा, वानर, मत्स्य, मृग, शश (खरगोश), वृषभ, कूर्म और हंस- इनकी पूजा करनी चाहिये। इनके भी बाह्यभागमें पृश्निगर्भ और कुमुद आदि द्वारपालोंकी पूजाकी विधि कही गयी है। पूर्वसे लेकर उत्तरतक प्रत्येक द्वारपर दो-दो द्वारपालोंकी पूजा आवश्यक है। तदनन्तर श्रीहरिको नमस्कार करके बाह्यभागमें बलि अर्पण करे । ॐ विष्णुपार्षदेभ्यो नमः ।' बोलकर बलिपीठपर उनके लिये बलि समर्पित करे ॥ ५२ ५७ ॥
ईशानकोणमें ॐ विश्वाय विष्वक्सेनात्मने नमः । इस मन्त्रसे विष्वक्सेनकी अर्चना करे । इसके बाद भगवान्के दाहिने हाथमें रक्षासूत्र बाँधे। उस समय भगवान्से इस प्रकार कहे 'प्रभो! जो एक वर्षतक निरन्तर की हुई आपकी पूजाके सम्पूर्ण फलकी प्राप्तिमें हेतु है, वह पवित्रारोहण (या पवित्रारोपण) कर्म होनेवाला है; उसके लिये यह कौतुक (मङ्गल सूत्र) धारण कीजिये।' 'ॐ नमः । इसके बाद भगवान् के समीप उपवास आदिका नियम ग्रहण करे और इस प्रकार कहे–'मैं उपवासके साथ नियमपूर्वक रहकर इष्टदेवको संतुष्ट करूँगा। देवेश्वर! आजसे लेकर जबतक वैशेषिक (विशेष उत्सव) का दिन न आ जाय, तबतक काम, क्रोध आदि सारे दोष मेरे पास किसी तरह भी न फटकने पावें।' व्रती यजमान यदि उपवास करनेमें असमर्थ हो तो नक्त-व्रत (रातमें भोजन) किया करे । हवन करके भगवान्की स्तुतिके बाद उनका विसर्जन करे। भगवान्का नित्य पूजन लक्ष्मीकी प्राप्ति करानेवाला है। 'ॐ ह्रीं श्रीं श्रीधराय त्रैलोक्यमोहनाय नमः ।'– यह भगवान्की पूजाके लिये मन्त्र है ॥ ५८-६३ ॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'सर्वदेवसाधारणपवित्रारोपण-विधि-कथन' नामक तैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३३ ॥
Summary of chapter 34 of the Agni Mahā Purana is as follows:
The thirty-fourth chapter presents a systematic account of the duties (dharma-s) enjoined upon each of the four varṇa-s (Brāhmaṇa, Kṣatriya, Vaiśya, Śūdra) and the four āśrama-s (Brahmacarya, Gṛhastha, Vānaprastha, Saṃnyāsa). The Purāṇa affirms that varṇāśrama dharma is the very foundation of cosmic order, ordained by Bhagavān himself at the beginning of creation. The brāhmaṇa's duties of study, teaching, performing and officiating at sacrifices, and acceptance of gifts are detailed. The kṣatriya's duty to protect his subjects, govern justly, and sacrifice is described. The vaiśya's dharma of agriculture, cattle-keeping, and trade, and the śūdra's dharma of service to the other three orders are outlined. The āśrama duties — from the celibate student's discipline to the householder's sacrifice and hospitality to the forest-dweller's austerity and the renunciant's non-attachment — are described as successive stages of the soul's purification.