अग्नि महा पुराण

61- अवभृथस्नान, द्वारप्रतिष्ठा और ध्वजारोपण आदिकी विधिका वर्णन

श्रीभगवान् हयग्रीव कहते हैं-

ब्रह्मन् ! अब मैं अवभृथस्नानका वर्णन करता हूँ। 'विष्णोर्नु कं ( विष्णोतुं कं वीर्याणि प्रवीचं यः पार्थिवानि विममे रजाइसि। यो अस्कभायदुत्तरः सधस्थं विचक्रमाणले धोरुगायो विष्णवे त्वा ॥

(यजु०५।१८)) वीर्याणि०' इत्यादि मन्त्रसे हवन करे। इक्यासी पदवाले वास्तुमण्डलमें कलश स्थापित करके उनके जलसे श्रीहरिको स्नान करावे। स्नानके पश्चात् गन्ध, पुष्प आदिसे भगवान्की पूजा करे और बलि अर्पित करके गुरुका पूजन करे। अब मैं द्वारप्रतिष्ठाका वर्णन करूँगा। गुरु द्वारके निम्नभागमें सुवर्ण रखे और आठ कलशोंके साथ वहाँ दो गूलरकी शाखाओंको स्थापित करे। फिर गन्ध आदि उपचारों और वैदिक आदि मन्त्रोंसे सम्यक् पूजन करके कुण्डोंमें स्थापित अग्निमें समिधा, घी और तिल आदिकी आहुति दे। तत्पश्चात् शय्या आदिका दान देकर नीचे आधारशक्तिकी स्थापना करे ॥ १-४॥  दोनों शाखाओंके मूलभागमें चण्ड और प्रचण्ड नामक देवताओंकी स्थापना करे। उदुम्बर शाखाओंके ऊपरी भागमें देववृन्दपूजित लक्ष्मीदेवीकी स्थापना करके श्रीसूक्तसे उनका यथोचित पूजन करे।तत्पश्चात् ब्रह्माजीका पूजन करके आचार्य आदिको श्रीफल (नारियल) आदिकी दक्षिणा दे। प्रतिष्ठा द्वारा सिद्ध द्वारपर आचार्य श्रीहरिकी स्थापना करे। मन्दिरकी प्रतिष्ठा 'हत्प्रतिष्ठा०' इत्यादि मन्त्रसे की जाती है। उसका वर्णन सुनो। वेदीके पहले गर्भगृहके शिरोभागमें, जहाँ शुकनासाकी समाप्ति होती है, उस स्थानपर सोने अथवा चाँदीके बने हुए श्वेत निर्मल कलशकी स्थापना करे। उसमें आठ प्रकारके रत्न, ओषधि, धातु, बीज और लोह (सुवर्ण) छोड़ दे। उस सुन्दर कलशके कण्ठभागमें वस्त्र लपेटकर उसमें जल भर दे और मण्डलमें उसका अधिवासन करे । उसमें पल्लव डाल दे। तत्पश्चात् नृसिंह मन्त्रसे अग्निमें घीकी धारा गिराते हुए होम करे। नारायणतत्त्वसे प्राणन्यास करे ॥ ५ - १० ॥

सुरेश्वर! प्रासादके उस कलशका वैराजरूपमें चिन्तन करे। तत्पश्चात् विद्वान् पुरुष सम्पूर्ण प्रासादका ही पुरुषकी भाँति चिन्तन करे। तदनन्तर नीचे सुवर्ण देकर तत्त्वभूत कलशकी स्थापना करे। गुरु आदिको दक्षिणा दे और ब्राह्मण आदिको भोजन करावे। तत्पश्चात् वेदीके चारों ओर सूत या माला लपेटे। उसके ऊपर कण्ठभागमें सब ओर सूत अथवा बन्दनवार बाँधे और उसके भी ऊपर 'विमलामलसार' नामक पुष्पहार या बन्दनवार मन्दिरके चारों ओर बाँधे। उसके ऊपर 'वृकल' तथा उसके भी ऊपर आदि सुदर्शनचक्र बनावे । वहीं भगवान् वासुदेवकी ग्रहगुप्त मूर्ति निवेदित करे। अथवा पहले कलश और उसके ऊपर उत्तम सुदर्शनचक्रकी योजना करे। ब्रह्मन्! वेदीके चारों ओर आठ विघ्नेश्वरोंकी स्थापना करनी चाहिये। अथवा चार दिशाओंमें चार ही विघ्नेश्वर स्थापित किये जाने चाहिये। अब गरुडध्वजारोपणकी विधि बताता हूँ, जिसके होनेसे भूत आदि नष्ट हो जाते हैं ॥ ११- १६॥

प्रासाद बिम्बके द्रव्योंमें जितने परमाणु होते - हैं, उतने सहस्र वर्षोंतक मन्दिर निर्माता पुरुष - विष्णुलोकमें निवास करता है। निष्पाप ब्रह्माजी ! जब वायुसे ध्वज फहराता है और कलश, वेदी तथा प्रासादबिम्बके कण्ठको आवेष्टित कर लेता है, तब प्रासादकर्ताको ध्वजारोपणकी अपेक्षा भी कोटिगुना अधिक फल प्राप्त होता है, ऐसा समझना चाहिये। पताकाको प्रकृति जानो और दण्डको पुरुष साथ ही मुझसे यह भी समझ लो कि प्रासाद (मन्दिर) भगवान् वासुदेवकी मूर्ति है। मन्दिर भगवान्को धारण करता है, यही उसमें धरणीतत्त्व है, ऐसा जानो मन्दिरके भीतर जो शून्य अवकाश है, वही उसमें आकाशतत्त्व

है। उसमें जो तेज या प्रकाश है, वही अग्नितत्त्व है और उसके भीतर जो हवाका स्पर्श होता है, | वही उसमें वायुतत्त्व है ॥ १७ - २० ॥

पाषाण आदिमें ही जो जल है, वह पार्थिव जल है। उसमें पृथ्वीका गुण गन्ध विद्यमान है। प्रतिध्वनिसे जो शब्द प्रकट होता है, वही वहाँका शब्द है। छूनेमें कठोरता आदिका जो अनुभव होता है, वही वहाँका स्पर्श है। शुक्ल आदि वर्ण रूप है। आह्लादका अनुभव करानेवाला रस ही वहाँ रस है। धूप आदिकी गन्ध ही वहाँकी गन्ध है । भेरी आदिमें जो नाद प्रकट होता है, वही मानो वागिन्द्रियका कार्य है। इसलिये वहीं वागिन्द्रियकी स्थिति है। शुकनासामें नासिकाकी स्थिति है। दो भद्रात्मक भुजाएँ कही गयी हैं। शिखरपर जो अण्ड-सा बना रहता है, वही मस्तक कहा गया है और कलशको केश बताया गया है। प्रासादका कण्ठभाग ही उसका कण्ठ जानना चाहिये। वेदीको कंधा कहा गया है। दो नालियाँ गुदा और उपस्थ बतायी गयी हैं। मन्दिरपर जो चूना फेरा गया है, उसीको त्वचा नाम दिया गया है। द्वार उसका मुँह है और प्रतिमाको मन्दिरका जीवात्मा कहा गया है। पिण्डिकाको जीवकी शक्ति समझो और उसकी आकृतिको प्रकृति ॥ २१-२५ ॥

निश्चलता उसका गर्भ है और भगवान् केशव उसके अधिष्ठाता। इस प्रकार ये भगवान् विष्णु ही साक्षात् मन्दिररूपसे खड़े हैं। भगवान् शिव उसकी जंघा हैं, ब्रह्मा स्कन्धभागमें स्थित हैं और ऊर्ध्वभागमें स्वयं विष्णु विराजमान हैं। इस प्रकार स्थित हुए प्रासादकी ध्वजरूपसे जो प्रतिष्ठा की गयी है, उसको मुझसे सुनो। शस्त्रादिचिह्नित ध्वजका आरोपण करके देवताओंने दैत्योंको जीता है। अण्डके ऊपर कलश रखकर उसके ऊपर ध्वजकी स्थापना करे। ध्वजका मान बिम्बके मानका आधा भाग है। ध्वजदण्डकी लंबाईके एक तिहाई भागसे चक्रका निर्माण कराना चाहिये। वह चक्र आठ या बारह अरोंका हो और उसके मध्यभागमें भगवान् नृसिंह अथवा गरुडकी मूर्ति हो। ध्वज दण्ड टूटा-फूटा या छेदवाला न हो। प्रासादकी जो चौड़ाई है, उसीको दण्डकी लंबाईका मान कहा गया है। अथवा शिखरके आधे या एक तिहाई भागसे उसकी लंबाईका अनुमान करना चाहिये। अथवा द्वारकी लंबाईसे दुगुना बड़ा दण्ड बनाना चाहिये। उस ध्वज दण्डको देवमन्दिरपर ईशान या वायव्यकोणकी ओर स्थापित करना चाहिये ॥ २६-३२ ॥

उसकी पताका रेशमी आदि वस्त्रोंसे विचित्र शोभायुक्त बनावे अथवा उसे एक रंगकी ही बनावे । यदि उसे घण्टा, चँवर अथवा छोटी-छोटी घंटियोंसे विभूषित करे तो वह पापोंका नाश करनेवाली होती है। दण्डके अग्रभागसे लेकर भूमितक लंबा जो एक वस्त्र है, उसे 'महाध्वज' कहा गया है। वह सम्पूर्ण मनोरथोंको देनेवाला है। जो उससे एक चौथाई छोटा हो, वह ध्वज पूजित होनेपर सर्वमनोरथोंका पूरक होता है। ध्वजके आधे मानवाले वस्त्रसे बने हुए झंडेको 'पताका' कहते हैं अथवा पताकाका कोई माप नहीं होता। ध्वजका विस्तार बीस अङ्गुलके बराबर होना चाहिये। चक्र, दण्ड और ध्वज - इन सबका अधिवासनकी विधिसे देवताकी ही भाँति सकलीकरण करके मण्डप स्नान (मण्डपमें नहलानेकी क्रिया) आदि सब कार्य करे । 'नेत्रोन्मीलन' को छोड़कर पूर्वोक्त सब कर्मोंका अनुष्ठान करे। आचार्यको चाहिये कि वह इन सबको विधिवत् शय्यापर स्थापित करके इनका अधिवासन करे ॥ ३३-३७ ॥

तदनन्तर विद्वान् पुरुष 'सहस्त्रशीर्षा०' (यजु० अ० ३१) इत्यादि सूक्तका ध्वजाङ्कित चक्र में न्यास करे तथा सुदर्शन मन्त्र एवं 'मनस्तत्त्व 'का न्यास करे। यह 'मन' रूपसे उस चक्रका ही 'सजीवीकरण' कहा गया है। सुरश्रेष्ठ! बारह अरोंमें क्रमशः केशव आदि मूर्तियोंका न्यास करना चाहिये। गुरु चक्रकी नाभि, कमल एवं प्रतिनेमियोंमें तत्त्वों का न्यास करे। कमलमें नृसिंह अथवा विश्वरूपका निवेश करे। दण्डमें जीवसहित सम्पूर्ण सूत्रात्माका न्यास करे। ध्वजमें श्रीहरिका ध्यान करते हुए निष्कल परमात्माका निवेश करे। उनकी बलाबलारूपा व्यापिनी शक्तिका ध्वजके रूपमें ध्यान करे। मण्डपमें उसकी स्थापना और पूजा करके कुण्डोंमें हवन करे। कलशमें सोनेका टुकड़ा और पञ्चरत्न डालकर अस्त्र-मन्त्रसे चक्रकी स्थापना करे। तदनन्तर स्वर्णचक्रको नीचेसे पारेद्वारा सम्प्लावित करके नेत्रपटसे आच्छादित करे। तदनन्तर चक्रका निवेश करे और उसके भीतर श्रीहरिका स्मरण करे ॥ ३८-४४॥

'ॐ क्षौं नृसिंहाय नमः।' – इस मन्त्रसे श्रीहरिकी  स्थापना और पूजा करे। तदनन्तर बन्धु-बान्धवोंसहित यजमान ध्वज लेकर दही-भातसे युक्त पात्रमें ध्वजका अग्रभाग डाले। आदिमें (ॐ) और अन्तमें 'फट्' लगाकर 'ॐ फट्' इस मन्त्रसे ध्वजका पूजन करे। तत्पश्चात् उस पात्रको सिरपर रखकर नारायणका बारंबार स्मरण करते हुए वाद्योंकी ध्वनि और मङ्गलपाठके साथ परिक्रमा करे। तदनन्तर अष्टाक्षर मन्त्रसे ध्वजदण्डकी स्थापना करे। विद्वान् पुरुष 'मुञ्चामि त्वा' (ऋक्० १८ । १६१ । १) इस सूक्तके द्वारा ध्वजको फहरावे। द्विजको चाहिये कि वह आचार्यको पात्र, ध्वज और हाथी आदि दान करे। यह ध्वजारोपणकी साधारण विधि बतायी गयी है ॥ ४५-४९ ॥

जिस देवताका जो चिह्न है, उससे युक्त ध्वजको उसी देवताके मन्त्रसे स्थिरतापूर्वक स्थापित करे। मनुष्य ध्वज-दानके पुण्यसे स्वर्गलोकमें जाता है तथा वह पृथ्वीपर बलवान् राजा होता है ॥ ५० ॥

इस प्रकार आदि आग्रेय महापुराणमें 'अवभृथस्नान, द्वारप्रतिष्ठा और ध्वजारोपण आदिकी विधिका वर्णन' नामक इकसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६१ ॥