श्रीभगवान् कहते हैं-
अब मैं सामूहिक रूपसे देवता आदिकी प्रतिष्ठाका तुमसे वर्णन करता हूँ। पहले लक्ष्मीकी, फिर अन्य देवियों के समुदायकी स्थापनाका वर्णन करूँगा। पूर्ववर्ती अध्यायोंमें जैसा बताया गया है, उसके अनुसार मण्डप अभिषेक आदि सारा कार्य करे। तत्पश्चात् भद्रपीठपर लक्ष्मीकी स्थापना करके आठ दिशाओं में आठ कलश स्थापित करे। देवीकी प्रतिमाका घीसे अभ्यञ्जन करके मूल मन्त्रद्वारा पञ्चगव्यसे उसको स्नान करावे। फिर 'हिरण्यवर्णां हरिणीम्° । इत्यादि मन्त्रसे लक्ष्मीजीके दोनों नेत्रोंका उन्मीलन करे। 'तां म आ वह ०' इत्यादि मन्त्र पढ़कर देवीके लिये मधु, घी और चीनी अर्पित करे । तत्पश्चात् 'अश्वपूर्वाम् ०' इत्यादि मन्त्रसे पूर्ववर्ती कलशके जलद्वारा श्रीदेवीका अभिषेक करे । 'कां सोऽस्मिताम् ०' इस मन्त्रको पढ़कर दक्षिण कलशसे 'चन्द्रां प्रभासाम्' इत्यादि मन्त्रका उच्चारण करके पश्चिम करके पश्चिम कलशसे तथा 'आदित्यवर्णे०' इत्यादि मन्त्र बोलकर उत्तरवर्ती कलशसे देवीका अभिषेक करे ॥ १-५॥
'उपैतु माम्' इत्यादि मन्त्रका उच्चारण करके आग्नेय कोणके कलशसे, 'क्षुत्पिपासामलाम्- " इत्यादि मन्त्र बोलकर नैर्ऋत्यकोणके कलशसे 'गन्धद्वारां दुराधर्षाम् ०९' इत्यादि मन्त्रको पढ़कर वायव्यकोणके कलशसे तथा 'मनसः काममाकूतिम् – १०' इत्यादि मन्त्र कहकर 201 ईशानकोणवर्ती कलशसे लक्ष्मीदेवीका अभिषेक करे। 'कर्दमेन प्रजा भूता०' इत्यादि मन्त्र सुवर्णमय कलशके जलसे देवीके मस्तकका अभिषेक करे। तदनन्तर आप: सृजन्तु०१२' इत्यादि मन्त्रसे इक्यासी कलशोंद्वारा श्रीदेवीकी प्रतिमाको स्नान करावे ॥ ६-७॥
तत्पश्चात् (श्री प्रतिमाको शुद्ध वस्त्रसे पोंछकर सिंहासनपर विराजमान करे और वस्त्र आदि समर्पित करनेके बाद) 'आर्द्रा पुष्करिणीम्० ' इस मन्त्रसे गन्ध अर्पित करे। 'आर्द्रा यः करिणीम्०' आदिसे पुष्प और माला चढ़ाकर पूजा करे। इसके बाद 'तां म आ वह जातवेदो०' इत्यादि मन्त्रसे और 'आनन्द०" इत्यादि श्लोकसे अखिल उपचार अर्पित करे ॥ ८ ॥
'श्रायन्ती०' आदि मन्त्रसे श्री प्रतिमाको शय्यापर शयन करावे। फिर श्रीसूक्तसे संनिधीकरण करे और लक्ष्मी (श्री) बीज ( श्रीं) से चित् शक्तिका विन्यास करके पुनः अर्चना करे। इसके बाद श्रीसूक्तसे मण्डपस्थ कुण्डोंमें कमलों अथवा करवीर पुष्पोंका हवन करे। होमसंख्या एक हजार या एक सौ होनी चाहिये। गृहोपकरण आदि समस्त पूजन सामग्री आदितः श्रीसूक्तके मन्त्रोंसे ही समर्पित करे। फिर पूर्ववत् पूर्णरूपसे प्रासाद संस्कार सम्पन्न करके माता लक्ष्मीके लिये पिण्डिका निर्माण करे। तदनन्तर उस पिण्डिकापर लक्ष्मीकी प्रतिष्ठा करके श्रीसूक्तसे संनिधीकरण करते हुए, पूर्ववत् उसकी प्रत्येक ऋचाका जप करे ॥ ९ - १२ ॥
मूल मन्त्रसे चित् शक्तिको जाग्रत् करके पुनः संनिधीकरण करे। तदनन्तर आचार्य और ब्रह्मा तथा अन्य ऋत्विज् ब्राह्मणोंको भूमि, सुवर्ण, वस्त्र, गौ एवं अन्नादिका दान करे। इस प्रकार सभी देवियोंकी स्थापना करके मनुष्य राज्य और स्वर्ग आदिका भागी होता है । १३-१४ ॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'लक्ष्मी आदि देवियोंकी प्रतिष्ठा के सामान्य विधानका वर्णन ' नामक बासठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६२ ॥
Summary of chapter 63 of the Agni Mahā Purana is as follows:
This chapter provides installation procedures for Bhagavān's associated divine weapons, forms, and subsidiary deities. The Sudarśana Cakra's own installation as a fierce form of Bhagavān's protective power — circular, blazing with a thousand spokes, attended by six śaktis — is described with its specific pratiṣṭhā mantra sequence. The installation of Garuḍa, the eagle-vehicle, as an independent image in the temple compound, and of Narasiṃha in the Pātāla chamber beneath the sanctum, are also covered, including the powerful Pātāla Narasiṃha mantra given in full. Iconographic and installation procedures for Viṣṇu's twenty-four forms, Śiva, Ardhanārīśvara, Sūrya, and other deities worshipped in subsidiary shrines are described. The chapter concludes with the grantha-pratiṣṭhā — the ritual consecration of scripture manuscripts so that they become worthy objects of worship.