113- नर्मदा-माहात्म्य

अग्निदेव कहते हैं-

अब मैं नर्मदा आदिका माहात्म्य बताऊँगा। नर्मदा श्रेष्ठ तीर्थ है। गङ्गाका जल स्पर्श करनेपर मनुष्यको तत्काल पवित्र करता है, किंतु नर्मदाका जल दर्शनमात्र से ही पवित्र कर देता है। नर्मदातीर्थ सौ योजन लंबा और दो योजन चौड़ा है। अमरकण्टक पर्वतके चारों ओर नर्मदा सम्बन्धी साठ करोड़, साठ हजार तीर्थ हैं। कावेरी संगमतीर्थ बहुत पवित्र है। अब श्रीपर्वतका वर्णन सुनो - ॥ १-३॥

एक समय गौरीने श्रीदेवीका रूप धारण करके भारी तपस्या की। इससे प्रसन्न होकर श्रीहरिने उन्हें वरदान देते हुए कहा – “देवि! तुम्हें अध्यात्म ज्ञान प्राप्त होगा और तुम्हारा यह पर्वत श्रीपर्वत के नामसे विख्यात होगा। इसके चारों ओर सौ योजनतकका स्थान अत्यन्त पवित्र होगा।" यहाँ किया हुआ दान, तप, जप तथा श्राद्ध सब अक्षय होता है। यह उत्तम तीर्थ सब कुछ देनेवाला है। यहाँकी मृत्यु शिवलोककी प्राप्ति करानेवाली है। इस पर्वतपर भगवान् शिव सदा पार्वतीदेवीके साथ क्रीड़ा करते हैं तथा हिरण्यकशिपु यहीं तपस्या करके अत्यन्त बलवान् हुआ था। मुनियोंने भी यहाँ तपस्यासे सिद्धि प्राप्त की है ॥ ४–७॥

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'नर्मदा-माहात्म्य वर्णन' नामक एक सौ तेरहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ११३ ॥