भविष्य महा पुराण

रत्नाचल और रौप्यारचलदानका माहात्म्य

भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं-राजन्! अब मैं श्रेष्ठ रत्नाचलदान-विधिका वर्णन कर रहा हूँ। इससे दाता सप्तर्षिलोक प्राप्त करता है। एक हजार मुक्ताफल (मोतियों)-द्वारा बना हुआ पर्वत उत्तम, पाँच सौसे बना हुआ मध्यम और तीन सौसे बना हुआ अधम (साधारण) माना गया है। अल्पवित्त व्यक्ति सौ मुक्ताफलोंसे रत्नाचलका दान करे। कल्पित पर्वतके चतुर्थाशसे उसके चारों दिशाओं में विष्कम्भपर्वतोंको स्थापित करना चाहिये। विद्वानोंको पूर्व दिशामें हीरा और गोमेदसे मन्दराचलको, दक्षिणमें पुष्पराग (पुखराज) और इन्द्रनील (नौलम) मणिके संयोगसे गन्धमादनकी, पश्चिममें वैदूर्य और मुंगेके सम्मिश्रणसे विपुलाचलको और उत्तरमें गारुत्मत मणिसहित पद्यराण (माणिक्य) मणिसे सुपा पर्वतकी स्थापना करनी चाहिये। इस दान में भी धान्यपर्वतकी तरह सारे उपकरणोंको कल्पना करे। उसी प्रकार स्वर्णमय देवताओं, चनों और वृक्षों का स्थापन एवं आवाहन करे तथा पुष्प, गन्ध आदिसे उनका पूजन करे। प्रातः काल मत्सररहित होकर वह सारा सामान गुरु और ऋत्विजोंको दान कर दे। उस समय इन मन्त्रोंका उच्चारण करे-

यथा देवगणाः सर्वे सर्वरत्वेष्ववस्थिताः।

त्वं च रत्नमयो नित्यमतः पाहि महाचल॥

यस्माद्रत्नप्रदानेन तुष्टिमेति जनार्दनः ।

पूजारनप्रदानेन तस्मानः पाहि सर्वदा॥

(उत्तरपर्व २०२।८-९)

अचल! जब सभी देवगण सम्पूर्ण रनोंमें निवास करते हैं, तब तुम तो नित्य रत्नमय ही हो, अत: महाचल। हमारी रक्षा करो। पर्वत! चूँकि सदा रत्नका दान करनेसे श्रीहरि संतुष्ट हो जाते हैं, अत: तुम हमारी रक्षा करो।'

जो मनुष्य उपर्युक्त विधिसे रत्नमय पर्वतका दान करता है, वह इन्द्रसे सत्कृत हो विष्णु- सालोक्यको प्राप्त करता है और वहाँ सौ कल्पोंसे भी अधिक कालतक निवास करता है। पुनः इस लोकमें जन्म लेनेपर वह सौन्दर्य, नीरोगता और सद्गुणासे युक्त होकर सातो द्वीपों का अधीश्वर

होता है। साथ ही उसके द्वारा इहलोक अथवा परलोकमें जो कुछ भी ब्रह्महत्या आदि पाप किये गये होते हैं, वे सभी उसी प्रकार नष्ट हो जाते हैं, जैसे वनद्वारा प्रहार किया गया हुआ पर्वत। नरोत्तम! इसके बाद मैं सर्वश्रेष्ठ रजतशैलका वर्णन कर रहा हूँ, जिसके दानसे मनुष्य सर्वश्रेष्ठ चन्द्रलोकको प्राप्त करता है। दस हजार पल चाँदीसे बना हुआ रजवाचल उत्तम, पाँच हजार पलसे बना हुआ मध्यम और ढाई हजार पलसे बना हुआ अधम कहा गया है। यदि दाता ऐसा करने में असमर्थ हो तो उसे अपनी शक्तिके अनुसार बीस पलसे कुछ अधिक चाँदीद्वारा पर्वतका निर्माण कराना चाहिये। उसी प्रकार प्रधान पर्वतके चतुर्थांशसे विष्कम्भपर्वतोंकी भी रचना करे। पहलेकी तरह चाँदीके द्वारा मन्दर आदि पर्वतोंका निर्माण कर उनके नितम्बभागको सोनेसे सुशोभित कर दे। उनपर लोकपालोंकी स्वर्णमयी मूर्ति स्थापित कर उन्हें ब्रह्मा, विष्णु और सूर्यकी मूर्तियोंसे भी संयुक्त कर दे। तत्पशात् बुद्धिमान् दाता इन सबकी विधिपूर्वक अर्चना करे। सारांश यह है कि अन्य पर्वतोंमें जो उपकरण चाँदीके होते हैं, वे सभी इसमें सुवर्णके होने चाहिये। शेष हवन, जागरण आदि सारे कार्य धान्यपर्वतकी भाँति ही करे। तत्पश्चात् प्रातःकाल वस्त्र और आभूषण आदिके द्वारा गुरु और ऋत्विजोंका पूजन कर रजताचल गुरुको और विष्कम्भपर्वत ऋत्विजोंको दान कर दे। उस समय मत्सररहित हो हाथमें कुश लेकर इस मन्त्रका पाठ करे-

पितॄणां वल्लभं यस्माद्धरीन्द्राणां शंकरस्य च।

रजत पाहि तस्मान्नो घोरात् संसारसागरात् ।

(उत्तरपर्व २०३।८)

'रजताचल ! तुम पितरोंको तथा श्रीहरि, सूर्य, इन्द्र और शिवको परम प्रिय हो, इसलिये शोकरूपी संसारसागरसे मेरी रक्षा करो।' जो मानव इस प्रकार निवेदन कर श्रेष्ठ रजताचलका दान करता है, वह दस हजार गो-दानका फल प्राप्त करता है। वह विद्वान् चन्द्रलोकमें गन्धर्वो, किन्नरों और अप्सराओंके समूहोंसे पूजित होकर प्रलयकालतक निवास करता है। (अध्याय २०२-२०३)